Skip to main content

MADHYAMIK STAR PAR ADHIGAM BHAR KI VYAPKATA, SHKAMATA SANVARDHAN KI CHUNOTIYA EANV SAMBHAVNAYE

Page 1

Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2016 = 6.17, www.srjis.com UGC Approved Sr. No.49366, NOV-DEC 2017, VOL- 4/37

माध्यममक स्तर पर अमधगम भार की व्यापकता संभावनाएं

, क्षमता संवधधन की चुनौमतया​ाँ

एवं

रजनीश अग्रहरर पी. एच-डी. शोधाथी, शशक्षा शिद्यापीठ, म.गा​ाँ.अ. शह.शि.शि., िधा​ा , ई-मेल- rajnishedubhu@gmail.com

प्रस्तुत शोध आलेख में माध्यशमक स्तर के शिद्याशथायों पर ितामान समय में उनके अशधगम क्षमता से अशधक सीखने के शलए शदए जा रहे शिशिन्न प्रकार के िार (दबाि) की जाच ां -पड़ताल करने का प्रयास शकया गया है, साथ ही शिद्याशथायों पर पड़ने िाले शिशिन्न प्रकार के अशधगम िार जैसे- शिद्यालय एिां शशक्षण काया से सांबांशधत, माताशपता की आका​ांक्षा से सांबांशधत, पाठ्य सहगामी शियाओ ां एिां गृह काया से सांबांशधत अशधगम िार की व्याख्या करने का प्रयास शकया गया है | इस अशधगम िार का शिद्याशथायों की सृजनात्मकता एिां उनके स्ियां की रुशचयों पर शकस प्रकार प्रिाि डाल रही है तथा शिद्याशथायों के शारीररक, सामाशजक, शैशक्षक, नैशतक, एिां सांिेगात्मक शिकास पर शकतना एिां शकस प्रकार का प्रिाि पड़ रहा है, उसके शिश्लेषण का िी प्रयास शकया गया है| पारिभाषिक शब्द (Key word) - अशधगम, अशधगम िार, माध्यशमक स्तर, माता-शपता की आका​ांक्षा, सामाशजक शिकास, शारीररक शिकास, शैशक्षक शिकास । Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com

प्रस्तावना रचनात्मक पररपेक्ष्य में सीखना ज्ञान ननमा​ाण की एक प्रनिया है, वतामान समय की स्कून गिं पद्धनत ने छात्रों के सीखने की प्रनिया को एक नननित फ्रेमवका में बाधने का प्रयास नकया है, सीखने और अनदु श े न के अनधकतर प्रारूप इस नसद्धािंत पर आधाररत होते है नक छात्रों को नकतना अनधक से अनधक ज्ञान या सचू ना प्रदान कर नदया जाये, नजससे उनका अनधकतम बौनद्धक नवकास हो सके | इस सन्दभा में प्रो. यशपा ने कहा था नक बच्चे पर समझ का बोझ ज्यादा है। नकताब मोटी होने से बोझ नहीं होता। हमें देखना चानहए नक उसका मनस्तष्क नकतना समझ सकता है। अध्यापक को देखना चानहए नक बच्चा नकतना ग्रहण कर पाता है , उसी नहसाब से उसे पढ़ाया जाए | बौनद्धक नवकास को प्रोत्सानहत करने की इस सम्पणू ा प्रनिया में नबना इस पक्ष पर गौर नकये की उनकी ‘अनधगम धारण’ की क्षमता नकतनी है और उन पर समस्त शैनक्षक एविं गैर शैनक्षक प्रनिया का नकतना अनधगम भार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदान नकया जा रहा है, नबना इन महत्वपणू ा तथ्यों पर ध्यान नदए छात्रों का माननसक, बौनद्धक, एविं दैनहक शोषण नकया जा रहा है, नजससे उनका शैनक्षक एविं सामानजक ननष्पादन प्रभानवत हो रहा है| Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Rajnish Agrahari (Pg. 8437-8444) 8438

उपरोक्त नवचारो के सदिं भा में इस शोध अध्ययन के माध्यम से माध्यनमक स्तर के छात्रों की ‘अनधगम धारण’ क्षमता और उन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से डा े जा रहे अनधगम भार की पहचान एविं उनके स्तरों का आक न करना है | औपचाररक अनधगम पद्धनत का मख्ु य उद्देश्य व्यनक्तयों में अन्तननानहत क्षमताओ िं का समनु चत नवकासकरना और उन्हे समाज के एक सनिय सदस्य के रूप में स्थानपत करना है, नवद्या य एविं अन्य शैनक्षक सिंस्थाओ िं को इसी प्रनिया के उत्प्रेरक के रूप में देखा जाता है ेनकन यह एक महत्वपणू ा नचिंता का नवषय है नक बजाय मानव सिंसाधन को नवकनसत करने के नवद्या य नवद्यानथायों के न ए बोझ का पया​ाय बनते जा रहे है | भारत की वतामान नवद्या यी नशक्षा इन नवनभन्न आयामों पर असतिं ष्टु और ननराश करती है, नशक्षा और नशक्षा व्यवस्था से जड़ु े सभी पक्षों जैसे- छात्र, माता-नपता, नशक्षक, नीनत ननमा​ाता, नशक्षा प्रशासक ने समय-समय पर इस सिंदभा में अपनी नचिंता व्यक्त की है, यहा​ाँ तक नक नशक्षा के क्षेत्र में गनित नवनभन्न कमीशन, आयोगों, और शोध ने नशक्षा व्यवस्था की इस महत्वपणू ा समस्या को अपने सस्िं तनु तयों एविं शोध पत्रों में गभिं ीरता के साथ उल् ेख नकया गया है| इस गभिं ीर एविं महत्वपणू ा समस्या को सिंक्षेप में ननम्नन नखत प्रकार से वनणात नकया जा सकता है1. वतामान समय के नवद्या य नशक्षण हेतु एक पवू ा ननधा​ाररत परम्परागत प्रनतमान का प्रयोग करते है नजसमे अनधगमकता​ा काफी हद तक प्राप्त सचू नाओ िं को ग्रहण, प्रत्यास्मरण ( Retain) तथा पनु रुत्पानदत करने तक ही सीनमत रह जाते है | 2. वतामान स्कू ी अभ्यास सृजनात्मकता, नवोन्मेष (Innovation), अन्वेषण (Exploration), प्रयोगों के नवस्तार को प्रोत्सानहत न करके उनसे समझौता कर ेते हैं, अस में वे न के व इसे सीनमत कर रहे है बनल्क अक्सर भावात्मक व अन्य प्रकार के समस्याओ िं का कारण भी बन रहे हैं | 3. प्राथनमक स्तर पर अनधगम और अनदु श े न की अनधकतम रणनीनतया​ाँ सचू नाओ िं के हस्तािंतरण, प्रत्यास्मरण और पनु रुत्पादन की तरफ ही अग्रसर प्रतीत होती है, जो तीव्र बौनद्धक नवकास को बढ़ावा के न ए माना जाता है, ेनकन यह नचिंता का नवषय है नक यह सब नबना अनधगमकता​ा के अनधगम क्षमता को जाने–समझे नकया जा रहा है जो अनधगम भार को बढ़ावा देना वा ा नसद्ध हो रहा है | 4. उपरोक्त वनणात कारकों का एक मख्ु य कारण अनधगम भार के साथ ननम्नन नखत पररणामों का बेमे सबिं धिं भी है:- (A) कक्षागत हस्तािंतरण का नवसिंदनभाकरण (De-contextualized) (B) अनधगमकता​ा के समझ का न्यनू तम स्तर और अनधकतम पनु रुत्पादन (C) सृजनात्मकता हेतु सीनमत प्रयास | अध्ययन का उद्देश्य :1. अनधगम भार के स्वरुप एविं प्रकृ नत की पहचान एविं व्याख्या करना | 2. माध्यनमक स्तर के छात्रों के अनधगम भार (Learning Load ) की व्याख्या करना| 3. माध्यनमक स्तर पर अनधगम भार के कारणों की पहचान एविं पड़ता करना | 4. माध्यनमक स्तर पर अनधगम भार के प्रनत नशक्षको, माता-नपता एविं नवद्यानथायों के अनभवृनि का अध्ययन करना Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Rajnish Agrahari (Pg. 8437-8444) 8439

समस्या की पृष्ठभूमम (Background of Problem):नशक्षा के क्षेत्र में काया करने वा े समस्त नहतधारक (stakeholder) एविं नीनत ननमा​ाता सभी इस तथ्य हेतु प्रयासरत है नक ‚नकस प्रकार स्कू जा रहे नवद्यानथायो की क्षमता को सिंवनधात नकया जाए‛ साथ ही वे नशक्षण व अनधगम को आनिंदपणू ा रूप से नबना नकसी बोझ के ग्रहण कर सकें , तथानप सरकार द्वारा गणु विापणू ा नशक्षा उप ब्ध कराने का क्ष्य अभी तक नशक्षा जगत व आम जनमानस को सिंतष्टु नहीं कर सका है | मौन क अनधकार के रूप में नशक्षा न के व व्यनक्त के व्यनक्तगत अनधकारों को सरु नक्षत करती अनपतु यह गणु विापणू ा नशक्षा की मा​ाँग है, नक सीखने के सिंसाधन और नशक्षको की नशक्षण क्षमता नवद्यानथायो के न ए आनिंदपणू ा अनधगम के साथ ही अथापणू ा अनधगम का वातावरण तैयार करे | भारत के नशक्षा नीनतयों एविं अध्ययनों पर यनद सरसरी समीक्षा नकया जाया तो यह प्राप्त होता है की नशक्षा अपनी इस महत्वपणू ा भनू मका में असफ और नदग्भ्रनमत है | इस हेतु एक सबसे बड़ी और महत्वपणू ा बाधा अनधगम भार है , जोनक सीखने के वातावरण से न या गया है, इस समस्या से सबिं निं धत एक महत्वपणू ा मद्दु ा बढ़ता हुआ या असतिं नु त अनधगम भार है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अनधगमकता​ा के क्षमता सिंवधान एविं कौश नवकास की प्रनिया प्रभानवत कर रहा है | अनधकतर यह पाया जाता है नक नवद्यानथायो पर ननयनमत रूप से अनधगम का भार बढाया जा रहा है अक्सर यह अनधगमकता​ा के ग्रहण करने की क्षमता, प्रनिया, आतिं ररक एविं बाह्य अभ्यास की क्षमता को भी पार कर जाता है | अनधगम भार न नसफा सिंज्ञानात्मक आयामों के पक्ष से बढ़ रहा है अनपतु यह भावात्मक, सामानजक और शारीररक आयामों के पक्ष से भी बढ़ता हुआ नदख रहा है | इस प्रकार समग्र अनधगम की आवश्यकता को प्रनतपानदत करने के बजाय नशक्षण प्रणान या​ाँ नसफा सिंज्ञानात्मक पक्षों को प्रोत्सानहत कर रही है, यह पररणाम अनधगमकता​ा के नवकास को मात्र एक पक्ष तक ही सीनमत कर देता है यहा​ाँ तक की उच्च उप नब्ध प्राप्त व्यनक्त भी सीनमत क्षेत्रो तक ही अच्छे है और अनधगम के बहुत से महत्वपणू ा क्षेत्रो में उनकी उप नब्ध शन्ू य है जो एक अच्छे नागररकों के ननमा​ाण की साथाकता को प्रभानवत कर रही है, नसफा इतना ही नहीं प्रचन त नशक्षा प्रणा ी अनधगमकता​ा में नननहत आतिं ररक क्षमताओ िं का पणू ा रूप से उपयोग कर पा रही है अनपतु बहुत से ऐसे पक्षों को नज़रिंदाज़ कर रही ह जो उनके मनष्तक एविं क्षमता में पह े से मौजदू है | इस नस्थनत को गाडानर (2011) ने अपनी पस्ु तक ‚अनस्कू ड माइडिं ‛ में बहुत ही अच्छे तरीके से वनणात नकया है – “The child has an empty mind, the educator has (one hops|) a well-stocked mind, and the goal of education is to transfer that stock as efficiently and actively as possible from the mind of educator to mind of child”(pp.115) इस माननसकता के साथ सीखना नसफा रटने को प्रोत्सानहत करती है जो नक मनस्तष्क में बहुत कम समय के न ए धारण नकया जा सकता है, तथ्यात्मक सचू नाओ का हस्तानन्तरण अनधगम नहीं हो सकता और चाहे कुछ भी हो |

Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Rajnish Agrahari (Pg. 8437-8444) 8440

अमधगम भारवस्ततु ः अनधगम भार अनधगम से सिंबिंनधत एक महत्वपणू ा सिंप्रत्यय है, नजसका अथा स्कू जा रहे छात्रों के अनधगम प्रनिया में उनकी ‘धारण क्षमता’ को नबना जा​ाँचें-परखे उन्हें उनकी अनधगम क्षमता से अत्यानधक सचू नाए,िं ज्ञान व कौश प्रदान करने के दबाव को अनधगम भार के रूप में पररभानषत नकया जाता है | सामान्यतः अनधगम भार अनधगम से सिंबिंनधत एक महत्वपणू ा सिंप्रत्यय है , नजसका अथा स्कू जा रहे छात्रों के अनधगम प्रनिया में उनकी ‘धारण क्षमता’ को नबना जा​ाँचे - परखे उन्हें उनकी अनधगम क्षमता से अत्यानधक सचू नाएिं व ज्ञान प्रदान करने के दबाव को अनधगम भार के रूप में पररभानषत नकया जाता है | छात्रों की अनधगम प्रनिया में उनकी ‘धारण क्षमता’ ( Carrying Capacity) एक महत्वपणू ा कारक है, जो ‘अवधान अवनध’ ( Attention span ), ‘अवधान शै ी’ ( Attention style) साथ ही अनधगम की आवश्यकता एविं आपनू ता को व्यवनस्थत करने से सिंबिंनधत है | क्षमताओ ं के प्रसंस्करण में वैयमिक मवमभन्नता एवं अमधगम भार (Individual differences in processing of capability and Learning Load) :मनोवैज्ञाननक दृनष्टकोण से यह तथ्य स्वीकार नकया जाता है नक ‚प्रत्येक व्यनक्त अपवू ा है‛ (Every Individual is unique) सामान्यतया अनधगम प्रनियायों में पाि्यिम ननमा​ाण, नशक्षण नवनध व अन्य अनधगम गनतनवनधयों के आयोजन में इस तथ्य को पणू ा रूप से नकार नदया जाता है नक प्रत्येक छात्र की क्षमताएिं अ गअ ग है, वतामान स्कून िंग व्यवस्था में नवद्यानथायों के क्षमता सिंवधान एविं कौश नवकास के मापदडिं सामान्यतः एक सामान ही होते हैं, भारत एविं भारतीय नशक्षण व्यवस्था में यह तथ्य और भी पष्टु हो जाता है नक यहा​ाँ माध्यनमक स्तर के पाि्यिमों में ज्ञानाजान, कौश नवकास एविं वैयनक्तक क्षमता सविं धान हेतु नकसी भी अनदु श े ानात्मक मॉड एविं पाि्यिम का उल् ेख नहीं नम ता है | ऐसी नस्थनत में बड़ा महत्वपणू ा एविं गढ़ू प्रश्न यह है नक ‚क्या स्कूल जा रहे प्रत्येक छात्र एवं छात्राओ ं को मसर्ध एक सावधभौममक ज्ञान या क्षमता मवकास के मलए तैयार मकया जाएगा ? या उनकी व्यमिगत रूमच, अमभक्षमता एवं अमभवृमत का भी कोई मूल्य होगा ? और महत्वपणू ा तथ्य यह भी है की यनद उसकी रूनच और क्षमता नकसी अन्य ज्ञानानश ु ासन या कौश ों में व्याप्त है तो इस प्रकार का अनधगम उसके न ए भार या बोझ नहीं होगा? सामान्यतः होता यही है नक हम छात्रों में अन्तननानहत सृजनात्मकता एविं क्षमता को नबना पता गाए, नबना जा​ाँचे उन्हें एक पवू ा ननधा​ाररत क्षमता या सृजनात्मकता के पैमाने पर मापने का प्रयास करते हैं और ऐसे उनमे नननहत ऐसे अन्तननानहत सृजनात्मकता एविं क्षमता की अनदेखी कर देते हैं जो वास्तव में उनमे मौजदू है और नजसके समनन्वत नवकास से वे सृजनात्मकता का एक नया मापदडिं स्थानपत कर सकते हैं | भारतीय सन्दभा में छात्रों के अनधगम को बोझ रनहत बनाने का व्यवनस्थत प्रयास सन 1992 में प्रो. यशपाल की ररपोर्ध ‘मशक्षा मिना िोझ के ’ से औपचाररक रूप से माना जाता है | इससे पवू ा भारत में स्वतत्रिं ता पवू ा नशक्षा के क्षेत्र में गनित नवनभन्न आयोग व सनमनतयों ने इस नबिंदु पर बहुत अनधक ध्यान नहीं नहीं नदया | प्रो. यशपा ने भी अपनी ररपोटा ‘नशक्षा नबना बोझ के ’ में नवद्या य स्तर के ही अनधगम बोझ (नजसमे पाि्िम, Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Rajnish Agrahari (Pg. 8437-8444) 8441

पाि्यचया​ा, व पाि्यपस्ु तकों सनम्मन त थी) तक ही सीनमत रखा, इसके अनतररक्त अनधगम प्रनिया के अतिं गात स्कू जा रहे छात्रों को अन्य नजन अनधगम बोझ या भार का सामना करना पड़ रहा था, उससे वे भी अननभज्ञ रहे | प्रो. यशपाल कमेर्ी (1993) की ररपोटा मात्र इस नबिंदु पर आधाररत रही नक एक िमबद्ध तौर-तरीकों और अव ोकन में ‚पढाया मकतना गया और सीखा मकतना गया‛ जो अपने ररपोटा के ननष्कषा में इस बात का उल् ेख करता गया है की- ‚That a lot is taught but little is learnt or understood” इसी प्रकार मोहतं ी और शक्ु ला (2003) ने अपने अध्ययन में पाया नक नवम्बर 2003 में नदल् ी के ननजी नवद्या यो में स्कू जा रहे 6-10 वषा के बच्चों के स्कू बैग का औसत वजन 6 नक.ग्रा तथा सरकारी स्कू ों के बच्चों का औसत वजन 4 नक.ग्रा. से ऊपर था | यहा​ाँ तक नक 4 वषा के ननजी नकिंडरगाटान जा रहे बच्चों के बैग का वजन 2.5 नक.ग्रा. से ऊपर था | यहा​ाँ एक महत्वपणू ा प्रश्न यह खड़ा होता है की क्या ‘पाि्यिम का बोझ या स्कू बैग का वजन’ ही वास्तनवक अनधगम भार है? उपरोक्त नवचारों के आ ोक में यनद हम तथ्यों का अध्ययन एविं नवश्ले षण करते है तो स्पष्टतः यह ज्ञात होता है की पाि्यिम का बोझ या स्कू बैग का वजन छात्रों के सिंज्ञानात्मक बोझ का एक नहस्सा मात्र है, यहा​ाँ यह तथ्य भी स्पष्ट करना आवश्यक है नक प्रस्ततु शोध अध्ययन में नसफा सिंज्ञानात्मक बोझ को अनधगम भार का पया​ाय नहीं स्वीकार नकया गया है अनपतु सीखने-नसखाने की सम्पणू ा प्रनिया में हर वह कारक जो छात्रों के अनधगम की प्रनिया को प्रभानवत करता है तथा नजसका वास्तनवक स्तर छात्रों की नवनभन्न ग्रहण करने की क्षमता (नजसमें मख्ु य रूप से शैनक्षक एविं सामनजक क्षमता प्रमख ु है |) से अनधक है, महात्मा गा​ाँधी ने अपने नशक्षा दशान में नशक्षा को मनष्ु य के सवोिम एविं सवा​ांगीण नवकास के साधन के रूप में स्वीकार नकया है, तथा वतामान शैनक्षक पररदृश्य में भी नशक्षा को साध्य और अनधगम को नशक्षा के साधन के रूप में स्वीकार नकया जाता रहा है, जब अनधगम नशक्षा का एक महत्वपणू ा साधन है, तो शैक्षनणक उद्देश्यों में भी हम एस. ब् मू महोदय की शैक्षनणक उद्देश्यों के वगीकरण के नसद्धािंत के अनसु ार बात करे , तो उन्होंने ने भी शैक्षनणक उद्देश्यों को तीन महत्वपणू ा क्षेत्रों (डोमेन) में वगीकृ त नकया है जो ननम्नन नखत है1. सिंज्ञानात्मक क्षेत्र (डोमेन) (cognitive Domain) 2. भावात्मक क्षेत्र (डोमेन) (Affective Domain) 3. मनो-नियात्मक क्षेत्र (डोमेन) (Psycho-Motor Domain) अब यहा​ाँ भी एक महत्वपणू ा प्रश्न उिता है नक छात्रों के अनधगम प्रनिया में ऐसे कौन-कौन से महत्वपणू ा घटक है जो अनधगम प्रनिया को प्रभानवत करते है या हम दसू रे शब्दों में कहे तो नवद्या य, के साथ-साथ घर व समाज में भी ऐसे कौन- कौन से कारक हैं , नजनका प्रभाव छात्रों के सीखने एविं नसखाने की प्रनिया को प्रभानवत करती है ? यनद हम छात्रों के सामानजक एविं सािंस्कृ नतक सन्दभा ( Socio-cultural context) को दृनष्टगत रखते हुए उसे एक सनिय अनधगमकता​ा (an active agent) के रूप में भी स्वीकार करते हैं तो नननित रूप से समाज, सामानजक मान्यताएिं परम्पराएाँ, समाजीकरण, सािंस्कृ नतक नवरासतों का आत्मसातीकरण, सािंस्कृ नतक मान्यतायों एविं परमपराओ िं के सविं धान एविं सविं हन की चनु ौनतया​ाँ भी उसके अनधगम प्रनिया को प्रभानवत करती है और स्कू में पाि्यिम गनतनवनधयों के साथ-साथ इन तमाम सामानजक एविं सािंस्कृ नतक सन्दभा से जड़ु े नवनभन्न अनधगम Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Rajnish Agrahari (Pg. 8437-8444) 8442

प्रनियाओ िं का भी नहस्सा बनाना पड़ता है, जो नननित रूप से उसके अनधगम का ही एक महवपणू ा नहस्सा है, और यह उसके अनधगम भार की तरफ भी इनिं गत करता है | माध्यनमक स्तर के छात्रों को मात्र सिंज्ञानात्मक अनधगम में ही दक्षता नहीं नवकनसत करनी पड़ती है, अनपतु उसे मानवीय सिंवदे ना के नवनभन्न पक्षों से सिंबिंनधत व्यवहार एविं सिंवगे ों को भी पररनस्थनतजन्य तरीकों से सीखना पड़ता है, यनद वह इनके सैद्धानन्तक पक्षों में दक्षता प्राप्त कर ेता है तो पनु ः उसे इनके अनप्रु योग एविं व्यवहाररक पररनस्थनतयों के साथ समायोजन की चनु ौती से भी ननपटना पड़ता है | मवश्ले षण एवं मनष्कषध :वतामान सदी ज्ञान एविं तकनीकी िानिं त की सदी है नजसने नननित रूप से सीखने एविं नसखाने के वातावरण को बहुत हद तक पररवनतात कर नदया है, नजसका मख्ु यतः पररणाम यह रहा रहा है नक, अब ोगो का मख्ु य फोकस सामग्री ( Content) के स्थान पर प्रनिया ( Procedure) पर हो गया है, इस िािंनत ने ननःसिंदहे सचू नाओ िं के बमबारी से सचू नाओ िं का एक समद्रिंु बना नदया है | नजसमें सीखने वा ा प्रत्येक छात्र स्वयिं को परे शान एविं नदग्भ्रनमत महससू कर रहा है, वह इन सब के मध्य यह तय ही नहीं कर पा रहा है नक कौन सी सचू ना या योग्भ्यता में दक्षता उसके न ए ज्ञान ननमा​ाण व कल्याण के न ए सही व उपयोगी नसद्ध होगी और कौन सी नहीं ? उपरोक्त नवचारो के आ ोक में यह ज्ञात होता है नक नवद्या यी अनधगम की प्रनतस्पधा​ा ने समाज में यह माहौ बना नदया है, नक ोग चाहते हैं नक हमारा बच्चा ज्यादा से ज्यादा पढ़े, नदल् ी जैसे शहरों में कक्षा 8 के बाद बच्चे को बोडा की परीक्षा के साथ-साथ कई तरह की प्रनतयोगी परीक्षाओ िं की तैयारी करनी पड़ती है, एकएक नवषय के न ए माता-नपता 5-6 नकताबें खरीदते हैं, बच्चे को न खे ने का समय नम ता है , न दोस्तों से बात का । उसकी सारी इच्छाएिं मर जाती हैं, एक बच्चा एक नहीं कई-कई प्रनतयोगी परीक्षाओ िं में बैिता है नजसने छात्रों के व्याकु ता को एक दम से बढ़ा नदया है जो उसके उच्च अनधगम भार की माननसकता को और पष्टु बना रही है, और वह इन सबके मध्य अपनी सृजन क्षमता का ह्रास कर स्वयिं को शैनक्षक एविं सामानजक दष्ु पररणामो की तरफ अग्रसर कर रहा है | इन सब पररनस्थनतयों में बहुत आवश्यक है नक हम अनधगम एविं नवद्या यी परीक्षा पद्धनत में सधु ार करें , पाि​िम ननमा​ाण की प्रनिया को वैज्ञाननक ढिंग से नननमात करे तथा अनधगम के भार से प्रभानवत होने वा े छात्रों के शैनक्षक एविं सामानजक पररणामों को शोध अध्ययन के आधार नवनशष्ट रूप से नचन्हानिं कत कर उसे छात्रों के क्षमता एविं स्तरों के अनक ू ू बनाये | मायरन वीनर ने अपनी पस्ु तक ‚the child and state in india” में कहा है नक ‚जि तक सभी गरीि िच्चों के मलए पूणधकामलक, गुणवत्तापूणध मशक्षा मुहैया नहीं करवाई जायेगी, ति तक मनरक्षर िच्चे मजदूरी करने को मववश होंगे‛ बच्चों की अनशक्षा या अवरोधन का एक मख्ु य कारण उनपर अनधगम का भार भी है यहीं आनथाक दृनष्ट से हम नवश्ले षण करे तो पायेंगे की पाि्यचया​ा के न ए आवश्यक बहुत सारी पस्ु तकों को खरीदने के न ए उनके पास ससिं ाधन उप ब्ध नहीं होते हैं| इसी प्रकार लनू ा चास्की का नवचार था नक ‚मशक्षा तभी सर्ल मानी जायेगी जि वह सामामजक मशक्षा हो‛ नशक्षा के सामानजक पररणामो के अतिं गात छात्रों के सामाजीकरण की प्रनिया पणू रू ा प से सफ नहीं हो पाती नजसका एक मख्ु य कारण अनधगम भार हो सकता है | Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Rajnish Agrahari (Pg. 8437-8444) 8443

आज प्रनतयोनगता का माहौ बन गया है। ोग चाहते हैं नक हमारा बच्चा ज्यादा से ज्यादा पढ़े। नदल् ी जैसे शहरों में कक्षा 8 के बाद बच्चे को बोडा की परीक्षा के साथ-साथ कई तरह की प्रनतयोनगता परीक्षाओ िं की तैयारी करनी पड़ती है। एक-एक नवषय के न ए माता-नपता 2-3 नकताबें खरीदते हैं। बच्चे को न खे ने का समय नम ता है , न दोस्तों से बात का। उसकी सारी इच्छायें मर जाती हैं। एक बच्चा एक नहीं कई-कई प्रनतयोगी परीक्षाओ िं में बैिता है, नजससे परीक्षाओ िं का बच्चे पर बोझ बढ़ा । इस कारण नकतने ही कोनचिंग सिंस्थान खु गए हैं। अब तो कोनचिंग सिंस्थान में दानख े के न ए भी प्रवेश परीक्षा देनी पड़ती है। इन सिंस्थानों की फीस ाखों रुपए होती है। इसमें समाज में वगाभदे पैदा हुआ है। इन सब उपयाक्त ु कारणों को दृनष्टगत रखते हुए अनधगम के भार के कुछ महत्पणू ा पररणाम ननम्नन नखत है –  अनधगम भार के कारण नशक्षा को बीच में छोड़ने की प्रवृनत गातार बढ़ रही है, बीच में नवद्या य बीच में नवद्या य छोड़ने वा े ये बच्चे अनशक्षा के कारण ननम्न आनथाक जीवन जीने के न ए मजबरू होते हैं नजससे उनका रुझान असामानजक प्रवृनतयों जैसे- नशे की त, अपराध, बा श्रनमक, इत्यानद की ओर हो जाता है |  अनधगम भार अनधक होने के कारण नवद्यानथायो में बहुत से मनो-सामानजक नवकार जैसे समायोजन में कमी, ननणाय ेने क्षमता, नेतत्ृ व क्षमता, सामानजक अ गाव, सामानजक वचिं ना इत्यानद दष्ु पररणाम परर नक्षत होते हैं | सन्दभध ग्रंथ सूची:मोहतं ी, ए.के और शुक्ला, आर. (2003) द वानिन गिं चाइल्डहुड : वेट ऑफ़ स्कूल बैग अ नडके ड आफ्टर द य पाल कमेटी.अन पनब् शड मेननू स्िप्ट ,जानकर हुसैन सेंटर फॉर एजक ु े शन स्टडीज, जवाहर ा नेहरु नवश्वनवद्या य , नई नदल् ी. प्रो.यशपाल. (1993). न क्षा नबिा बोझ के . ररपोटा ऑफ़ द नेशन एड्वायजरी कमेटी.मानव एविं सिंसाधन नवकास मत्रिं ा य, भारत सरकार. NCERT(2006). राष्ट्रीय पाठ्यचया​ा की रूपरे खा-2005. नई नदल् ी : लूनाचास्री, अनातोली (2007). न क्षा एविं सामानिक न क्षा व्यवस्था. नई नदल् ी: प्रकाशन सिंस्थान शमाध, सुभाष (2007). न क्षा और समाि. नई नदल् ी: प्रकाशन सिंस्थान. वमाध, एस.,शमाध , डी., और लासधन, आर. डब्लू (2002). स्कूल स्रेस इि इनिं डया : इफे क्टेड ऑि टाइम एडिं डेली इमो ि. इटिं रनेशन जना ऑफ़ नवहनवर डेव ेप्मेंट,26 , 500-08. Aggrawal, J.C (1994). Learning without Burden : An Analysis, shipra Publication Arun S. (2000). Why India has 50 Million School Dropouts. The times of India 15 December. Christle C. A. Joiivette K. & Nelson C.M. (2007) . “School Characteristics related to High School Dropout Rates” Remedial and Special Education. Csikszentmihalyi, M. (1990). Flow: The psychology of optimal Experience. Harper perennial. Gardner, H. (1991).The unschooled Mind: how children think and school should teach. basic books. New York. Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Rajnish Agrahari (Pg. 8437-8444) 8444

Gordon, E. W., Bridglall, B. L., & Meroe, A. S., (Eds.). (2005). Supplemental education:The hidden curriculum of high academic achievement. Oxford, United Kingdom:Rowman Littlefield. Harkness, S., & Super, C. M. (1996). Parents’ cultural belief systems: Their origins,expressions, and consequences. New York, NY: Guilford Kirazoglu C. (2009). “ The investigation of school-dropout at the secondary level of formal education: the stated reasons by the school administrators and school counselors: a preliminary study” Procedia social and Behavioral sciences I. Konantambigi, R. M. and Nandini, R. (2009). 'Teaching Strategies in Mathematics for Children in the Normal Classrooms : A Qualitative Analysis', Psychological Studies, 54(3). NCERT (2002). Curriculum load on children at pre-primary and primary stage: An exploratory study. New Delhi: NCERT (DEE). Pandya R. (1998). “Why do kids drop out of school?” Social welfare, June, 16-19. Pratinidhi K. A. Kurulkar, V. P.Garad G. S. and Dalal M.(1992). “ Epidemiological Aspects of school dropouts in children between 7-15 years in Rural Maharashtra” Indian Journal Pediatrics. Stearns E. and Glenne E.J. (2006). “ When and Why Drpout Leave High School” Youth & Society. Sweller, J., & Chandler, P. (1991). Evidence for cognitive load theory. Cognition and Instruction, 8, 351-362. Sweller, J., van Merrienboer, J., & Paas, F. (1998). Cognitive architecture and instructional design. Educational Psychology Review, (3), 251–296.

Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


Turn static files into dynamic content formats.

Create a flipbook
MADHYAMIK STAR PAR ADHIGAM BHAR KI VYAPKATA, SHKAMATA SANVARDHAN KI CHUNOTIYA EANV SAMBHAVNAYE by Scholarly Research Journal"s - Issuu