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Lekh bordiya ji ke naam

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या हम आज़ाद है ? ‘दे खो हो टल के िनयम तो सभी को मानने चा हए कह भी जाओ तो बता कर जाओ.तुम हमार ज मेदार हो,कल को कुछ हो जाये तो पुिलस आ सकती है ’. ये ज मेदार भरे श द थे या फर एक डर.मु बई जैसे शहर म बड़ बड़ बाते करने वाले ऐसे संक ण वचारधारा वाले लोग भी रहते है ,मने क पना म भी नह सोचा था. ये बाते सुन कर बुरा लगा मगर अगले ह पल इस लेख को िलखने के िलए दल ने मजबूर कर दया. एक म हला होने के नाते इस तर के क

हदायते एक आम बात है मेरे िलये. बचपन से यह

िसख दे ते है लोग. मगर कई बार ज रत पड़ने पर म हला को अकेले रहने पर मज़बुर भी यह लोग करते है . अपनी अब तक क

ज़ंदगी का एक अरसा, पुरा एक दशक,जयपुर शहर म अकेले

बताया है मने. अब कारण कोई भी रहा हो उसका ज़

न करना ह उिचत है .

शु आती दनो म बहु त मु कलो का सामना करना पडा. जैस,े अकेले रोड पर चलते ल को के बुरे कमटस सुनना, शाम को दे र से घर आने पर लोगो क शक भर िनगाहो का सामना करना, कोई आपका पछा करता है , कोई रोड पर चलते हु ए ह आपको िल ट दे ने क कोिशश करता है, उसक बात ना मानने पर उसक धम कयो का सामना करना, जब कोई बस मे आपको छुने क कोिशश करता है और वरोध करने पर उसक धम कया या फर गिलया सुनना. इन सब के बावज़ुद अगर कसी को कुछ बताओ तो गलती ल क क मान कर मुझे ह ताने तथा मशवरे सुनने को िमले. हालां क ये सब मुिशकले अब नह आती ऐसा नह है . काफ हद तक भारत मे हालात अब भी ऐसे ह है . बस इन को दे खने का और सुनने का नज़ रया बदल गया है अब. वरना शायद ज़ंदगी बस िशकायते करते हु ए ह मेरे जीवन म बदलाव लाने का सबसे बडा

बत जाती.

य े बो दया जी का है . दुसरा दशक म काम करने के

पहले मने कभी उनके बारे कुछ नह सुना था. यहाँ तक क दुसरा दशक म आने के बाद भी शु

म म उनको नह ं जान पाई थी. आदतन लोगो से दूर रहना पसंद था, त उनसे भी म दूर

ह रहती थी. अपने बारे बहु त कम बाते करती थी. इस ऑ फस म एकल म हला होने नाते अपने ह सहकिमयो से मने बहु त कुछ सुना. बो दया जी को छोड़ कर हर कसी ने मुझसे मेर िनजी जंदगी म दखलंदाजी (ये श द ह उिचत है ) करने क कोिशश क थी. जससे म थोड़ परे शान सी रहने लगी थे, मगर बोला कसी से कुछ नह ं. मुझे याद है जब मै जंस व ट शट पहन कर ऑ फस गई, एक बहु त िसिनयर य

ने मुझ से पहनावे को लेकर सवाल कये. मुझे बहु त बुरा

लगा और गु सा भी आया.जब बो दया जी को पता चला उ होने मुझे से बात करनी चाह . मै


भी कहाँ बात करने वाली थी, जब उ होने

यार से बार बार पुछा तो मै रो पड और उ हे ह

बहु त कुछ कह दया. साथ ह यह भी आरोप लगा दया क आप तो म हलाओ क बराबर क बात करते है वो यहाँ है ह नह . आपके ऑ फस म म हलाओ के िलये

े स कोड था तो मुझे

पहले बताना था और भी बहु त कुछ कह दया. डर भी लग रहा था क अ य

के साथ मै ऐसी

बात कर रह थी. मगर बोलने के िलये वह उकसा भी रहे थे. सार बाते खतम होने के बाद मने उनसे माफ मांगी तो कहने लगे ये तु हरा हक़ है क तुम अपनी बात बना डरे बोलो. साथ ह बोले तुम अपनी पसंद के कपडे पहन कर आने के िलये पुर तरह से आज़ाद हो. आज़ाद

कसे नह पसंद होती, ले कन

या सह मायने मे हम इसका मतलब जानते भी है .

बो दया जी के साथ काम करते हु ये मने बहु त कुछ िसखा. उ होने मुझे अपने आप से

ब

करवाया. इतनी बड ह ती होने के बावज़ुद कभी भी यह ए सास नह होने दया क वो कतना कुछ जानते है और मै नह .ब क मेरे अंदर के गुणोको पहचानने म मेर मदद करते रहे . जडर जैसे वषय पर मने उ ह से िसखा और उ होने मुझे कई मौके दये इस वषय पर अपनी समझ बनाने के. इसके िलये मै ज़ंदगी भर उनक आभार रहु ं गी. वो आज़ाद क िसफ बाते ह नह करते थे ब क उसे जीते थे और अपने य हार से भी िसखाते थे. मेर उनसे आ खर मुलाकत (मुझे नह पता था ये आ खर मुलाकात है ) लंदन म हु ई थी और तब भी उनका मेरे

ित यह

मतलब समझु और सह

व ास था क मै पडाई के साथ साथ जीवन मै िश ाका असली

दशा म चलु. ज़ंदगी के सातवे दशक मे भी एक

य

इतना खुले

दमाग वाला हो सकता है ये मेरे िलये एकदम अलग अनुभव था. वरना ये आज के पु ष व या दोनो (मै भी) इतने तंग दमाग वाले है क आप उनके साथ बहु त से मु ो पर जैसे से स, जडर, योिनकता पर बातचीत ह नह कर सकते. आज़ाद के 68 वष के बावज़ुद भी हमारे दे श म म हलाओ के

ित अ व ास क भावना आज़ाद

श द को छोटा कर दे ती है . मौजूदा हालात ऐसे ह क हर य ऐसा दखाने का

जडर या बराबर जैसे वषयो के

यास कर रहा होता है . लोग

ित या तो जाग क है या

ाचार और अपराध के खलाफ आवाज उठा रहे

ह. यह बात द गर है क वे इन मसल को सह अथ म कतना समझते ह? एक रे प केस हु आ या फर कोई ऐसी घटना घट नह ं क लगे सरकार, नेताओं और नौकरशाह को कोसने. भारत क आजाद को छ न कर कसी ताले म बंद करने का दोष भी हम उ ह पर लगा दे ते है .


भारत म हर रोज कई म हलाएं दु कम क िशकार होती ह और कई ऐसी ह, जो क ह कारणो से जला द जाती ह. जैसे दहे ज़

था, बे टया पैदा करना या फर एक ल क के

होना,अकेले घर से बाहर िनकलने क

प म पैदा

ह मत करना,अनपड आ द.म हलाओ से जुडे मु ो पर

िनणय भी पु षो ारा ह िलये जाते है . हं द के

िस

लेखक जयशंकर

साद ने अपनी रचना मनु

एक पु ष के आिधन बताया है . उनके अनुसार एक

मृित म म हलाओ को पुर

ज़ंदगी

ी को बचपन म पता के आिधन, जवानी

म पित के आिधन तथा बुडापे म बेटे के आिधन रहना ह शोभा दे ता है . इसमे उस

ी क

अज़ाद कहाँ रह ? ये तो सरे आम मानव अिधकार के व ध है .

यह नह ,ं

इससे न िसफ एक म हला ल क उससे जुडे कई लोगो क आजाद का होता ह। ये

दे खने म छोट -सी बात लग सकती ह, ले कन यह और इस जैसी छोट लगने वाली बात ह तय करती ह क कौन कतना आजाद है । आजाद के िलए मानिसक

या हम आजाद के सह मायने को समझते ह? हम

यापक सामा जक प रवतन क आव यकता है , य क अब भी कह न कह

प से हम गुलाम है . यह हमारे दे श को तर क करने से रोके हु ए है.

हमने आधुिनकता के नाम पर व

, रहन-सहन म प

िम स यता को तो अपना िलया, पर

वचार हमारे अब भी पुरातन है . बीतते समय म सामा जक सं थाओ क मदद से शु काय कया है और कई

कए गए वै

वकास पर काय करने वाली

क गांव के अिभयान ने

य से जुडे कई मु ो पर

ोजे ट कर रहे है .इससे कई वदशी क पिनयो को भारत मे एक बाज़ार

िमला. इससे लोग के मन म यह भावना पैदा होने लगी क

यादा सु वधा संप न होना ह

आधुिनकता को दशाता है .हम सब एक सु वधाभोगी जीवन क तरफ अंधी दौड़ लगा रहे ह. इस दौड़ म सभी अिधकािधक सु वधाएं, अिधकार व मौके बटोर लेना चाहते ह और इसे नाम दे ते ह आज़ाद का। इस नई आज़ाद म कत य भाव रहा ह नह .ं हमने रोज़मरा क

ज़ंदगी को

आराम दायक बानाने हे तु नए उपकरण अपना िलये, अपना पहनावा बदल िलया, रहन सहन बदल िलया, नये और बडे वाहनो मे तेज-र तार से चलते ह। दुिनया म हर वह चीज जो आधुिनक है , हमारे पास है , मगर हमे ज़रा यह सोचना होगा क हमारे सोच वचार, हमार ज़ंदगी और हमार चेतना मे कतना प रवतन आया है . इसमे कतनी आधुिनकताहै और अंदर से हम कतने आज़ाद ह.

या घर से बाहर आई है , कमा रह है . मगर

सोच मे बदलाव क तरफ कोई

यो के

यान नह है . यहाँ तक क खुद म हलाये अपने

ित हमार ित कतनी

सचेत है ? यह एक ग भीर मु ा है . इस मु े पर ना जाने कतनी बार बो दया जी ने बात क


मुझ से. और मै कभी समझ नह पाती थी. उ होने हमेशा हर बात पर ह सला ह

दया, फर

चाहे अकेले सफर करना हो या फर अकेले रहने क बात हो. ब क वो कई बार तार फ करते थे मेरे अकेले रहने पर और आने जाने पर. मै उ हे साफ मना कर दे ती थी तार फ करने पर भी और वो मेर उस भावना का भी आदर करते थे. आज़ाद एक नैितक मू य है , जसे दुिनया के कई ह स ने कड़े संघष और लंबी वैचा रक या ा के बाद महसूस कया और हािसल कया है .

ी क आज़ाद कोई अलग मु ा नह है , मगर फर

भी इस पर बार बार चचा िछड जाती है .भारत म भी आज़ाद क अवधारणा, अ य उ पाद क तरह हमे प तरह

म क एक दे न

वदे शी

है . हमने उ पादो को तो अपना िलया मगर उनक

य क आज़ाद पर हम अमल करना तो दुर सोचना भी नह चा ते है . साद वेश भुषा

मे भी कोई बहु त ऊंचे और आधुिनक वचार वाला हो सकता है,यह बात वरले लोगो को ह आसानी से समझ मे आ सकती है . जसमे से एक थे बो दया जी. जैसा क मने ऊपर उ लेख कया है , वह अपने जीवन के सातवे दशक मे भी खुली वचारधारा वाले य

रहे . उनके आदश

पर चलने वाले लोग य द अपनी सं कण मांिसकता मे थोडा भी प रवतन ले आये तो इस दे श को आज़ाद के मायने समझाने क ज़ रत नह पडे गी.दे श म राजनीितक

वतं ता का लंबा यु

चला, पर अब वैचा रक व मानिसक आज़ाद के िलए न िसफ पु षो को ब क

य को भी

बदलने के िलये कडे संघष करने क आव यकता है . तभी हम एक नतीज़े पर पहु ं च सकते है क हम वाकई

तं

है . तो हम सब को अपने आप से सवाल करने क आव य ा है क

या हम

सच म आज़ाद है ? यह लेख बो दया जी को सम पत

ारा: सुजाता वमा


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