Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language, Online ISSN 2348-3083, SJIF 2016 = 4.44, www.srjis.com UGC Approved Sr. No.48612, AUG-SEPT 2017, VOL- 4/23 https://doi.org/10.21922/srjhsel.v4i23.9637
सामान्य व्यक्ति के जीवन में क्तदनचयाा, धमा से सम्बन्ध एवं गहरी क्तचंतन की प्रक्तिया में आध्याक्तममकता की भूक्तमका ाऄममत कुमार मिपाठी 1 & मोहम्मद एहसान 2 1
सहायक प्रोफे सर, मनोमिज्ञान मिभाग, म. गाां. ाऄ. महन्दी मिश्वमिद्यालय, िर्ाा
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एम. मफल. शोर्ार्थी, मनोमिज्ञान मिभाग, म. गाां. ाऄ. महन्दी मिश्वमिद्यालय, िर्ाा Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com
प्रस्ततु शोर् के ाऄतां गात सामान्य व्यमि के जीिन में मदनचयाा, र्मा से सम्बन्र् एिां गहरी मचांतन की प्रमिया में ाअध्यामममकता की भमू मका को समझा गया। भारत र्मा की मिमिर्ताओ ां का स्र्थल माना जाता है, जहााँ ाऄमर्कतर लोग ाअध्यामममकता को व्यमिगत र्मा से जोड़ कर देखते हैं, हालामां क ऐसा नहीं है मक ाअध्यामममकता सभी र्मों से सबां र्ां नहीं रखता है। प्रायाः ाआस शोर् में मिमभन्न र्मों में ाअस्र्था का एक महमिपर्ू ा महस्सा होने के रूप में ाअध्यामममकता पर ाऄमर्क ज़ोर मदया गया है। र्मा और ाअध्यामम के िास्तमिक ाऄर्थों को समझने की ाअिश्यकता है। प्रस्ततु शोर् ाऄध्ययन के ाऄतां गात प्रमतभामगयों के रूप में िारार्सी जनपद (ाईत्तर-प्रदेश) के कबीर-मठ ि कबीर कृ मतममां दर, ममहला ाअश्रम-लांका, द्वाररकार्ीश ममां दर (ाऄस्सी-घाट), ममां दर और ममस्जद में रहने िाले 40 व्यमियों (ममहला/परुु ष) को प्रमतभागी के रूप में समम्ममलत मकया गया। मि ु ाईत्तर िाले प्र्ों के द्वारा प्रमतभामगयों से सामान्य व्यमि के जीिन में मदनचयाा, र्मा से सम्बन्र् एिां गहरी मचांतन की प्रमिया में ाअध्यामममकता की भमू मका को समझा गया। प्राप्त प्रद्दत से ज्ञात होता है मक मिमभन्न र्मों (महन्द/ू ाआस्लाम/कबीर पांर्थ) से सांबांमर्त िृद्ध प्रमतभामगयों का मानना है मक ाअध्यामममकता, मदन चयाा में ाऄमर्क महमि रखता है और ाआसके मलए ज्यादा से ज्यादा समय भी िे मनकालते है। ाआसी प्रकार िे ाअध्यामममकता का र्मा से गहरे सांबांर् को भी मानते हैं। मचांतन प्रमिया के रूप में महन्दू र्मा के िृद्ध प्रमतभामगयों ने ाअमम ि स्ि की खोज को माना, जबमक कबीर पांर्थ के प्रमतभमगयों ने मानि कल्यार् के रूप में तर्था Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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ाआस्लाम र्मा के प्रमतभामगयों ने गहरी मचतां न प्रमिया के रूप में भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था में ाअध्यामममकता की भमू मका को स्िीकार मकया। मुख्य क्तवन्दु :- ाअध्यामममकता, िृद्ध प्रमतभागी (महन्द/ू ाआस्लाम/कबीर पांर्थ)
प्रस्तावना ाअध्यामममकता के मिषय में बात की जाए तो ाअज के पररिेश ि पररमस्र्थमतजन्य जीिन मिज्ञान से ाईमपन्न हुाअ शब्द नहीं है बमल्क परु ातन काल से ही समाज में प्रचमलत है तर्था मजसकी एक मिस्तृत पृष्ठभमू म है। मनष्ु य ने सिाांगीर् मिकास करते हुए प्रमयेक स्तर पर ाऄनेकों ाईपलमब्र्यों को प्राप्त कर ाऄपने जीिन स्तर को सर्ु ारा है। मनष्ु य की ाईपलमब्र्यों से ाअज ाईसके मानमसक मिमतज पर गहरा प्रभाि पड़ता है तर्था ऐसे प्रभाि का कारर् व्यमि का ाऄपने-ाअप के मलए समय का ाऄभाि होना भी कहा जा सकता है ि मजसे गााँर्ी जी ने ‘पागल दौड़’ के रूप में ाऄमां कत मकया है। ाऄगर व्यमि के भौमतक जीिन को सर्ु ारने के प्रयास पर ध्यान के मन्ित मकया जाए तो ाअज के सामान्य जीिन में ाअध्यामममकता का एक महमिपर्ू ा ाऄर्था है (Chakrabbari, M. 1993, Krause, N., Dayton, B. I. & Liang, J. 1999)। क्तहन्दू धमा में आध्याक्तममकता, सामान्यताः सनातन र्मा को मानने िाले लोगों को महन्दू माना जाता है। सनातन र्मा की जीिन पद्धमत तर्था नैमतक मल्ू यों का मििेचन हमें िेदों से प्राप्त होता है। एक तरह से कहा जाए तो िेद ही सनातन र्मा एिां जीिन पद्धमत की मदशा का मनर्ाारर् करते रहे हैं और ाअज भी ाऄनेक पररितानों के बाद भी ाईनके मल्ू य मनर्ाारक िेद ही है। कालाांतर में जब यह ाऄनभु ि मकया जाने लगा मक िेदों की भाषा ाऄमयांत मललष्ट तर्था ाअम जन मानस के समझ के परे है तब िेदों को सरल सबु ोर् ि सगु म्य बनाने के मलए ाअरण्यक, ाईपमनषद तर्था ब्राह्मर् ग्रन्र्थों ाअमद की रचना हुाइ। जगां लों में मकए गए िेदों के सरलीकरर् को ाअरण्यक तर्था गरुु मशष्य परांपरा द्वारा मकए गए। ाआन्हीं ाअर्ारों पर सनातन र्मा की जीिन शैली तर्था मनयमों का मनर्ाारर् मकया गया। सनातन र्मा मक जीिन-शैली चार ाअश्रमों तर्था सोलह सस्ां कारों पर ाअर्ाररत है। सनातन र्मा में जीिन का 100 िषा को मान कर ाईसे चार भागों में Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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मिभामजत मकया गया तर्था हर भाग के मलए मिमशष्ट प्रकार के मनयमों को बाध्यकारी एिां ाऄमनिाया माना गया, ाअबध्य कहा गया मजन्हें ाअश्रम कहा जाता है। एक ाअश्रम की ाऄिमर् न्यनू तम 25 िषा मनर्ााररत की गाइ। ाअश्रमों के नाम प्रायाः ब्रह्मचया ाअश्रम, गृहस्र्थाश्रम, िानप्रस्र्थाश्रम, सन्याश्रम हैं (कपरू , ाअर. 2015, सजु ाता 2012)। कबीर पंथ में आध्याक्तममकता, कबीर पांर्थ भारत के भमिकालीन सांत कबीर की मशिाओ ां पर ाअर्ाररत एक सांप्रदाय है। सांत कबीर के मशष्य र्मादास ने ाईनके मनर्न के लगभग सौ साल बाद ाआस पांर्थ की शरुु ाअत की र्थी। प्रारांभ में दाशामनक और नैमतक मशिा पर ाअर्ाररत यह पांर्थ कालाांतर में र्ाममाक सांप्रदाय में पररिमतात हो गया। कबीर पांर्थ के ाऄनयु ामययों में महदां ,ू मसु लमान, बौद्ध और जैन ाअमद सभी र्मों के लोग शाममल हैं। कबीर की रचनाओ ां का सांग्रह ‘बीजक’ ाआस पांर्थ के दाशामनक और ाअध्यामममक-मचांतन का ाअर्ार ग्रांर्थ है। भारत में कबीर पांर्थ की मख्ु यताः तीन शाखाएाँ कबीरचौरा-काशी, र्नौती भगताही और छत्तीसगढ़ी पायी जाती हैं। ाआन शाखाओ ां के सांस्र्थापक िमशाः श्रमु त गोपाल साहब, भगिान गोसााइ ां तर्था मि ु ाममर् नाम साहब को माना जाता है। सांत कबीर का मानना है मक ाअध्यामममकता एक ाऄदां र से ाअने िाली चीज़ है मजसके मलए बाह्य मदखािा ाअिश्यक नहीं है ाअचाया,भा० (2014)। ाअध्यामममकता को पाने के मलए ाअतां ररक पररितान ज़रूरी है न मक बाहरी। ाईनके पदों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है तमु जिजन ि नां ौं गीत है रे , यहु जनि ब्रांह्म जिच र। के िल कजह समझ इय , आत्मां स धन स र रे ।। (कबीर ग्रांर्थािली, श्याम सांदु र दास,पेज न.70) जो भी मल ू ज्ञान है िह ाअमम सार्ना के द्वारा ही प्राप्त मकया जा सकता है ऐसा ाईनका मानना र्था। ज्यों नैनो में पतु ली, त्यों ख जलक घट म जह। मरू ख लोग न ि न ही, ब जहर ढूढ़न ि जह।। (कबीर ग्रांर्थािली, श्याम सांदु र दास, पेज न. 64) ाअाँखों में पतु ली की भााँमत हीं प्रमयेक शरीर में प्रभु मिराजमान है। यह मख ु ा और ाऄज्ञानी नहीं जानते और ाईन्हें काशी-कािा, ममां दर-ममस्जद में खोजने जाते हैं। उहिन तो सब ऐक है, परद रजहय िेश। भरम करम सब दरू कर, सब ही म जहअलेख। कबीर जी के पदों में ाअध्यामममकता साफ रूपों में देखा जा सकता है। िे ाअध्यामममक प्रेम में डूबे ऐसे सांत कमि है मजन्होंने चेतना के ाईच्चतर सोपानों पर पहुचाँ कर ब्रम्ह से
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भािाममक सबां र्ां को जोड़ा है। ाईनका कहना है की ाऄध्यामम का ाऄर्था है पर्ू ा पररितान जो एक ाअमम पररितान है और मजसमें समजां स्य है कोाइ मिरोर् नहीं। इस्लाम धमा में आध्याक्तममकता, ाआस्लाम का दृमष्टकोर् ाआस मामले में दमु नयााँ की सभी र्ाममाक ि दाशामनक व्यिस्र्थाओ ां से मभन्न हैं। िह कहता हैं मक ाआन्सानी ाअममा को ाआाश्वर ने र्रती पर ाऄपना प्रमतमनमर् मनयि ु मकया हैं। कुछ कताव्य और ाईत्तरदामयमि ाईसे सौंपे हैं और ाईनको परू ा करने के मलए श्रेष्ठतम एिां ाईपयि ु शारीररक सांरचना प्रदान की है। यह शरीर ाईसको मदया ही ाआसमलए गया है मक िह ाऄपने ाऄमर्कारों के प्रयोग तर्था ाऄपने कताव्यों के मनिााह में ाईससे काम ले। ाआसमलए यह शरीर ाअममा के मलए जेल नहीं बमल्क ाईसका कारखाना हैं और यमद ाअममा का कोाआा मिकास सांभि है तो िह ाआस कारखाने के औजारों तर्था ाईजाा का ाईपयोग करके ाऄपनी योग्यताओ ां का प्रदशान करे । मफर यह दमु नयााँ कोाआा यातनागृह भी नहीं है मजसमें ाआन्सानी ाअममा मकसी प्रकार ाअकर फाँ स गाआा हो, बमल्क यह तो िह कमास्र्थली है मजसमें काम करने के मलए ाआाश्वर ने ाईसे भेजा है। यहााँ मक ाऄनमगनत चीज़ें ाईसके ाऄर्ीन कर दी गाआा है। यहाां दसू रे बहुत से ाआसां ान ाआसी मखलाफत ाऄर्थिा प्रमतमनमर्मि के कताव्य मनभाने के मलए ाईसके सार्थ पैदा मकए गए हैं। यहाां प्रकृ मत की मागां ों से सास्ां कृ मतक, सामामजक, ाअमर्थाक, राजनैमतक तर्था जीिन के ाऄन्य मिभाग ाईसके मलए ाऄमस्तमि में ाअए हैं (Maududi, S., 2016)। ाआस्लाम ने ाअध्यामममक ाईमर्थान के मलए पमिि ग्रांर्थ कुऺराअन के पाठ (मतलाित) और ाईसमें ग़ौर-मफ़ि (मचांतन) करने तर्था ाईससे समकमा, समयमनष्ठा और नेमकयों पर चलने, बरु ााआयों से बचने, तर्था दसू रों को भी नेकी के रास्ते पर चलाने और बरु े रास्ते से रोकने की प्रेरर्ा, हौसला और जज़्बा हामसल करने की मशिा दी है। ाआससे व्यमि, व्यमि समहू ों, समाज का ाअध्यामममक स्तर ाउांचा ाईठता है। तल ु नाममक दृमष्ट से देखा जाए तो मनष्कषा यह मनकलता है मक ाअध्यामममकता को सामामजकता से सकुशल जोड़ने और दोनों के सामन्जस्य ि समागम को मानि-समाज के मलए महतकारी ि कल्यार्कारी बनाना ाआस्लाम का पमिि ाईद्देश्य है (मसीह, याo., 2014)।
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शोध का उद्देश्य ितामान पररप्रेक्ष्य में सामान्य व्यमियों के बीच ाअध्यामममकता और र्मा के सांबांर् ाऄध्ययन। गहरी मचांतन प्रमिया में ाअध्यामममकता की भमू मका का ाऄध्ययन।
क्तवक्तध प्रक्ततदशा प्रस्ततु शोर् िारार्सी जनपद (ाईत्तर-प्रदेश) के कबीर-मठ ि कबीर कृ मत-ममां दर, ममहला ाअश्रम-लांका, द्वाररकार्ीश ममां दर (ाऄस्सी-घाट) और ममस्जदों में रहने िाले 40 िृद्ध व्यमियों (ममहला/परुु ष) को प्रमतभागी के रूप में समम्ममलत मकया गया। तालिका सख्ं या 1 प्रलतदर्श सारिणी क्तवक्तभन्न धमा एवं पंथ
प्रक्ततभाक्तगयों की सख्ं या
महन्दू र्मा
20
कबीर पांर्थ
13
ाआस्लाम र्मा
07
सम्पर्ू ा योग
40
उपकरण सामान्य व्यमि के जीिन में जदनचय ा, धमा से सम्बन्ध एिां गहरी जचांतन की प्रमिया में ाअध्यामममकता की भमू मका से सांबांमर्त प्र्ों को सािामकार प्रमिया द्वारा प्रमतभामगयों से पछ ू ा गया। प्रक्तिया सिाप्रर्थम कबीर-मठ ि कबीर कृ मत-ममां दर, ममहला ाअश्रम-लांका, द्वाररकार्ीश ममां दर (ाऄस्सी-घाट) और ममस्जदों में रहने िाले िृद्ध प्रमतभामगयों से सांपका कर ाईन्हें शोर् से सांबांमर्त जानकारी देकर शोर् के लाभ को बताया Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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मक मकस प्रकार ाआस शोर् के माध्यम से सामान्य व्यमि के जीिन के मदनचयाा, र्मा से सबां र्ां एिां एक गहरी प्रमिया के रूप में ाअध्यामममकता की भमू मका को समझना ाअिश्यक है। ाईनसे शोर् में सहयोग करने का मनिेदन करते हुए मिश्वास मदलाया गया मक ाईनके द्वारा मदये गये ाईत्तर को पर्ू ता या गोपनीय रखा जायेगा। ाआसका ाईपयोग के िल शैिमर्क ाईद्देश्य हेतु ही मकया जाएगा। तमपश्चात र्न्यिाद मदया गया।
क्तववेचना प्रस्ततु ाऄध्ययन सामान्य व्यमि के जीिन में मदनचयाा, र्मा से सम्बन्र् एिां गहरी मचांतन की प्रमिया में ाअध्यामममकता की भमू मका को समझा गया। महन्दू र्मा, कबीर पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा के 40 िृद्ध प्रमतभामगयों के द्वारा दी गाइ प्रमतमिया को ाईनके र्मा के ाऄनुसार ाऄलग-ाऄलग समहू ों में मिभि मकया गया। प्रमतभामगयों की सांख्या के ाअर्ार पर ाईनकी ाऄमभव्यमि को ाऄमां कत कर तामलकाओ ां का मनमाार् मकया गया।
आध्याक्तममकता का क्तदनचयाा में महमव और समय प्रमतभामगयों (महन्दू र्मा, कबीर पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा) से ाअध्यामममकता, मदनचयाा में महमि और समय के सांबांर् में ाईनसे प्र् पछ ू ा गया मक आपके जदनचय ा में आध्य जत्मकत क जकतन महत्त्ि है और इसके जलए आप जकतन समय जनक लते हैं? 27 प्रमतभामगयों ने जो ताक्तलका संख्या-2 में ाऄमां कत है,‘ाऄमर्क महमिपूर्ा के सांबांर् में’ ाऄपना मत स्पष्ट मकया और ाअगे प्र् पछ ू ा गया मक ाआसके मलए ाअप मकतना समय मनकालते हैं? तो समय-1 से 6 घटां े के बीच देने के सबां र्ां में 16 प्रमतभामगयों ने तर्था 11 प्रमतभामगयों ने ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने की कोमशश करने के सबां र्ां में ाऄपना मत मदया। तालिका सख्ं या-2 आध्यालमिकता का लदनचयाश िें िहमव औि सिय िम स.ं आध्याक्तममकता के प्रक्तत अक्तभव्यक्ति
प्रक्ततभाक्तगयों की सख्ं या
1 2 3
27
ाऄमर्क महमिपर्ू ा समय- 1 से 6 घांटे के बीच ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने की कोमशश
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तामलका से स्पष्ट है मक ाअध्यामममकता को लोग ाऄपने जीिन के मदनचयाा में ाऄमर्क महमि देते हैं। िहीं ाआसके मलए समय भी मनर्ााररत करने तर्था ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने का भी प्रयास करते हैं। ाअज की सबसे बड़ी समस्या के रूप में ाऄगर देखा जाए तो ाऄपने ाअप को जनने के सांबांर् में समय का न मनकाल पाना, स्ि के मलए लया गलत लया सही है? ाआमयामद का होना पाया जा रहा है जो सारी समस्यों का जड़ है। जो कहीं न कहीं ाअध्यामममक-समय का ाऄभाि हैं। ताक्तलका सख् ं या-3 में ाअध्यामममकता को मदनचयाा में महमि और समय देने के सबां र्ां में प्र् की ाऄमभव्यमि को मिमभन्न र्मों (महन्द,ू कबीर-पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा) से सांबांमर्त प्रमतभामगयों ने ाऄपनी-ाऄपनी प्रमतमियाएाँ दी। महन्दू र्मा से सांबांमर्त 28 प्रमतभामगयों ने ाअध्यामममकता को मदनचयाा में महमि और समय देने के सांबांर् को महमिपर्ू ा माना,मजसमें 13 व्यमियों ने ाऄमर्क महमिपर्ू ा के सांबांर् में, 8 व्यमियों ने समय (1 से 6 घटां े के बीच) देने के सांबांर् में तर्था 7 व्यमियों ने ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने की कोमशश करने के मलए कहा। कबीर पांर्थ से सांबांमर्त 16 प्रमतभामगयों ने ाअध्यामममकता को मदनचयाा में महमि और समय देने के सबां र्ां में 9 व्यमियों ने ाऄमर्क महमिपर्ू ,ा 5 व्यमियों ने समय (1 से 6 घटां े के बीच) देने के मलए तर्था 2 व्यमियों ने ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने की कोमशश करने के मलए कहा। ाआसी प्रकार ाआस्लाम र्मा से सबां मां र्त 10 प्रमतभामगयों ने ाअध्यामममकता को मदनचयाा में महमि और समय देने के सांबांर् में 5 व्यमियों ने ाऄमर्क महमिपर्ू ा के सांबांर् में, 3 व्यमियों ने समय (1 से 6 घटां े के बीच) देने के सांबांर् में तर्था 2 व्यमियों ने ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने की कोमशश करने को कहा। तालिका सख्ं या-3 लवलिन्न धिों के आध्यालमिकता का लदनचयाश िें िहमव औि सिय प्रमतभागी महन्दू र्मा कबीर-पांर्थ ाआस्लाम र्मा
ाअध्यामममकता के प्रमत ाऄमभव्यमि ाऄमर्क समय- 1 से 6 घटां े के महमिपर्ू ा बीच 13 8 9 5 5 3
ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने की कोमशश 7 2 2
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ाऄर्थाात मदनचयाा में ाअध्यामममकता के मलए समय (1 से 6 घटां े के बीच) देने के सबां र्ां में महमिपर्ू ा स्र्थान है, तर्था ाऄमर्क से ाऄमर्क समय देने की कोमशश महन्दू र्मा से सम्बांमर्त प्रमतभामगयों ने कबीर-पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा की तल ु ना में ाऄमर्क महमिपर्ू ा माना है।
आध्याक्तममकता का धमा से सबं ंध प्रमतभामगयों (महन्दू र्मा, कबीर पर्थां तर्था ाआस्लाम र्मा) से ाअध्यामममकता, र्मा से सबां र्ां में ाईनसे प्र् पछ ू ा गया मक ‘आध्य जत्मकत , धमा से सांबांजधत है’ इस कथन से आप कह ाँ तक सहमत हैं? मदये गए ाईत्तर को ताक्तलका संख्या4 में रखा गया। मजसमें 32 प्रमतभामगयों ने‘सांबांर् की सहममत में’ ाऄपना मत स्पष्ट मकया जबमक 8 प्रमतभामगयों ने ‘सांबांर् की ाऄसहममत में’ाऄपने मिचार को रखा। ाअध्यामममकता को ाइश्वर की खोज के रूप में सांदमभात कर सकते हैं। ाऄगर ाअध्यामममकता की ाऄनभु मू तयों के मागों की बात की जाए तो िह मागा के िल र्मा है। साांस्कृ मतक ाआमतहासकार और योगी मिमलयम ाआरमिन र्थामसन कहते हैं, ‚र्मा, ाअध्यामम के समान नहीं हैं बमल्क सभ्यता में ाअध्यामममकता र्मा का रूप ग्रहर् करती हैं‛ मनष्कषाताः कहा जा सकता है मक ‘र्मा और ाऄध्यामम’ एक ही मसलके के दो पहलु हैं, दोनों का लक्ष्य एक ही है। हम जीिन को सही मायनों में तभी जी पाते हैं जब मानिीय भािनाओ ां से यि ु होते हैं और ाआन मानिीय भािनाओ ां को जीिन में र्ारर् करने के मलए हमें स्िस्र्थ दृमष्टकोर् की ाअिश्यकता होती है और िह स्िस्र्थ दृमष्टकोर् पिू ााग्रह रमहत होकर ाअध्यामममक जीिन को ाऄपनाते हुए ग्रहर् मकया जा सकता है। तालिका सख्ं या-4 आध्यालमिकता के धिश से सबं ध ं की अलिव्यलि िम स.ं 1 2
आध्याक्तममकता के प्रक्तत अक्तभव्यक्ति र्मा से सांबांर् की सहममत र्मा से सांबांर् की ाऄसहममत
प्रक्ततभाक्तगयों की सख्ं या 32 8
ाआसकी पमु ष्ट ाऄपने शोर् Plante & Thoresen, (2007) में भी करते हुए माना है मक ाअध्यामममकता में र्ाममाक मन्िों का मनष्ु य के सामान्य-जीिन में ाअने िाली काइ तरह की परे शामनयों के मनिारर् में सबसे कम लागत िाली मचमकमसा के रूप में प्रयोग मकया जाता है। मिमभन्न र्मों के ाईपमस्र्थत मन्ि, मजसे मदनचयाा की मज़न्दगी में दोहरा Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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कर यह देखा गया मक सकाराममक स्िास््य के मनमाार् में महमिपर्ू ा भमू मका मनभाता है। मिां भले ही एक छोटा शब्द है लेमकन यह शब्द बहुत शमिशाली होता है। मिां को एक मस्र्थर ाऄिस्र्था और एक खास कायाकाल में मकया जाये तो मनष्ु य में जागरूकता और ाअध्यामममक सोच या मिचार ाअते हैं। मन्िम् पनु रािृमत्त को स्िास््यगत लाभ के रूप में देखा जाए तो मन्िम् पनु रािृमत्त; से नकाराममक मिचार से होने िाले व्यिहार को बामर्त करना, मचांता को मनयांमित करना, ाऄिाांमछत मिचारों से दरू करना, र्म्रू पान, मादक िव्यों के सेिन या ाऄन्य ाऄस्िास््यकर व्यिहार से बचना ाआमयामद में महमिपूर्ा भमू मका मनभाता हैं। ाअध्यामम, र्मा से सांबांमर्त-सहममत के सांबांर् में िृद्ध प्रमतभामगयों ने सांबांमर्त ाऄसहममत के सांबांर् मक तल ु ना में ाऄमर्क महमिपूर्ा माना। ाअध्यामममकता का र्मा से सांबांर् में मिमभन्न र्मों िमशाः महन्दू र्मा, कबीर-पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा से सांबांमर्त प्रमतभामगयों की प्रमतमिया को ताक्तलका संख्या-5 में प्रदमशात मकया गया। मजसमें 19 महन्दू प्रमतभामगयों में से 16 प्रमतभामगयों ने र्मा से सांबांर् की सहममत में जबमक 3 व्यमियों ने र्मा से सांबांर् की ाऄसहममत को माना है। 13 प्रमतभामगयों जो कबीर पर्थां से सबां मां र्त र्थे ाईसमें 10 प्रमतभामगयों ने र्मा से सबां र्ां की सहममत में तर्था 3 प्रमतभामगयों ने र्मा से सबां र्ां की ाऄसहममत में समझा। 7 प्रमतभामगयों जो ाआस्लाम र्मा से सबां ांमर्त र्थे ाईसमें 8 व्यमियों ने र्मा से सबां र्ां की सहममत में तर्था 2 व्यमियों ने र्मा से सबां र्ां की ाऄसहममत पर ाऄपना मिचार रखा। तालिका सख्ं या-5 लवलिन्न धिों के प्रलतिालियों का आध्यालमिकता के धिश से सबं ध ं की अलिव्यलि प्रमतभागी महन्दू र्मा कबीर-पांर्थ ाआस्लाम र्मा
ाअध्यामममकता के प्रमत ाऄमभव्यमि र्मा से सबां र्ां की सहममत
र्मा से सबां र्ां की ाऄसहममत
16 10 5
3 3 2
ाअध्यामममकता को र्मा से सबां र्ां की सहममत में महन्दू र्मा, मिमभन्न र्मा की तल ु ना में ाऄमर्क हैं सार्थ ही सार्थ कबीर पर्थां तर्था ाआस्लाम र्मा से सबां र्ां की सहममत की तल ु ना में भी ाऄमर्क पाया गया जबमक र्मा से सबां र्ां की ाऄसहममत का स्तर की तल ु ना में ाआस्लाम र्मा में कम पाया गया। Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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आध्याक्तममकता एक गहरी क्तचंतन प्रक्तिया प्रमतभामगयों (महन्दू र्मा, कबीर पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा) से प्र् पछ ू ा गया मक आध्य जत्मकत को एक गहरी जचांतन प्रजिय के रूप में आप कह ाँ तक समझ सकते हैं? मदये गए ाईत्तर को ताक्तलका संख्या-6 में रखा गया। मजसमें 23 प्रमतभामगयों ने ‘मचतां न प्रमिया के रूप में सहममत’ पर ाऄपना मत स्पष्ट मकया। जहाां तक ाआस कर्थन को समझनें की बात है तो 6 प्रमतभामगयों ने ‘ाअमम ि स्ि के खोज के रूप में’ाऄपना मत मदया और िहीं सार्थ ही सार्थ ‘भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था तर्था मानिता’ के सबां र्ां में िमशाः 3, 3 प्रमतभामगयों ने ाऄपने मिचारों को रखा। तालिका सख्ं या-6 आध्यालमिकता एक िहिी लचतं न प्रलिया िम स.ं
आध्याक्तममकता के प्रक्तत अक्तभव्यक्ति
प्रक्ततभाक्तगयों की सख्ं या
1 2 3 4
मचांतन प्रमिया के रूप में सहममत ाअमम ि स्ि के खोज के रूप में भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था मानिता
23 6 3 3
ाअध्यामममक व्यिहार, मजसमें ध्यान, प्रार्थाना और गहरी मचतां न प्रमिया शाममल हैं, ाऄताः ाअध्यामममकता को एक गहरी मचतां न प्रमिया के रूप में साफ-साफ देखा जा सकता है जो एक व्यमि को ाअतरां रक जीिन के मिकास के मलए ाऄमभप्रेररत है ऐसे व्यिहार ाऄलसर एक बृहद समय से जड़ु ने की ाऄनभु मू त में फमलत होता है, मजससे ाऄन्य व्यमियों या मानि समदु ाय के सार्थ जड़ु े एक व्यापक स्ि की ाईमपमत्त होती है। ाआसी प्रकार योग य परम प्रकृ जत को ि नने के च र मख्ु य म गा हैं- भजि, ज्ञ न, जिय और कमा । इनमें से ज्ञ न को गहरे जचांतन के स थ िोड़कर ही प्र प्त जकय ि सकत है। लॉ ऑफ़ कमाा (कमा मिर्ान) एक लोकमप्रय र्ारर्ा है मजसमें कहा गया है मक हमारा प्रमयेक मिचार और प्रमयेक काया कुछ समय बाद सक्ष्ू म रूप र्ारर् कर लेता है, मानो बीज बन जाता है, मचत्त की गहरााइ में ाऄव्यि रूप से रहता है, और कुछ समय बाद ाअमिभातू होकर ाऄपना फल देता है। कमा-फलों का यही समहू मनष्ु य के जीिन को मनर्ााररत करता है। ाऄर्थाात हमारे ितामान कमा ही हमारे भमिष्य को मनर्ााररत करते हैं। तामलका सांख्या-6 से स्पष्ट होता है मक प्रमतभामगयों
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ने ाअध्यामममकता को एक गहरी मचतां न प्रमिया के रूप में ाऄमर्क सहममत जतााइ है जो कहीं न कहीं ाअमम ि स्ि ाऄर्था की खोज, भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था करना तर्था मानि के कल्यार् के मलए तमपर बनाता है। तालिका सख्ं या-7 लवलिन्न धिों के प्रलतिालियों के द्वािा आध्यालमिकता एक िहिी लचतं न प्रलिया प्रक्ततभागी क्तहन्दू धमा कबीर-पथ ं इस्लाम धमा
प्रक्ततभाक्तगयों का आध्याक्तममकता के मचतां न प्रमिया ाअमम ि स्ि के के रूप में खोज के रूप में 12 4 6 2 5 0
प्रक्तत अक्तभव्यक्ति भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था 2 0 1
मानिता 1 2 0
ताक्तलका संख्या-7 में ाअध्यामममकता को एक गहरी मचांतन प्रमिया के रूप में मिमभन्न र्मों िमशाःमहन्दू र्मा, कबीर-पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा से सांबांमर्त प्रमतभामगयों की प्रमतमिया को प्रदमशात मकया गया। 19 महन्दू प्रमतभामगयों में से 12 व्यमियों ने मचांतन प्रमिया के रूप में, 4 व्यमियों ने ाअमम ि स्ि की खोज के रूप में, 2 व्यमियों ने भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था के तर्था 1 व्यमि ने मानि माि के सांबांर् में ाअध्यामममकता को एक गहरी मचांतन के रूप में समझा। 10 कबीर पांर्थ के प्रमतभामगयों में से 6 व्यमियों ने मचांतन प्रमिया के रूप में, 2 व्यमियों ने ाअमम ि स्ि की खोज के रूप में तर्था 2 व्यमि ने मानिता के सांबांर् ाअध्यामममकता को एक गहरी मचांतन के रूप में जाना है। 6 ाआस्लाम र्मा के प्रमतभामगयों में से 5 व्यमियों ने मचांतन प्रमिया के रूप तर्था 1 व्यमि ने भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था के सांबांर् में ाऄपना मत मदया। ाऄर्थाात, ाअध्यामममकता को एक गहरी मचांतन प्रमिया के रूप में महन्दू र्मा के प्रमतभामगयों ने मिमभन्न र्मों (कबीर-पांर्थ तर्था ाआस्लाम र्मा) की तल ु ना में ाअध्यामममकता को पररभामषत मकया है। िहीं कबीर पांर्थ मानिता के सांबांर् में महन्दू तर्था ाआस्लाम र्मा की ाऄपेिा ाऄपनी ाअस्र्था व्यि की है। ाअध्यामममकता, मिमभन्न र्मों के बीच पायी जाने िाली एक साझा प्रमयय के रूप में जड़ु ी भािनाओ,ां व्यिहारों एिां मिचारों के पररर्ाम स्िरूप होने िाले ाऄनेक शारीररक ि मानमसक स्िास््यगत लाभ के रूप में देखा जाता है। सार्थ ही ाअध्यामममकता को ाऄभौमतक िास्तमिकता के ाऄमभगम के रूप में कहा जा सकता है। यह एक ाअतां ररक मागा है जो व्यमि को ाईसके ाऄमस्तमि के सार की खोज में सिम बनाती है। ाअध्यामममकता को एक प्रकार से Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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ाअतां ररक मागा के रूप में मचमन्हत मकया जा सकता है, मजस पर चलकर हम ाअज के सामान्य जीिन के िास्तमिक ाऄर्था तर्था ाऄमस्तमि के सार की खोज करने ि समझने में सिम हो सकते है। सार्थ ही मजसके द्वारा जीिन के गहनतम मल्ू य ि िास्तमिक ाऄर्था की व्याख्या की जा सकती है। व्यमि पररिार, समाज, राष्र, तर्था सम्पर्ू ा मिश्व ि मानिता के कल्यार्ार्था स्िस्र्थ एिां मल्ू यपरक जीिन की ओर ाऄमभमख ु एिां ाऄग्रसर मकया जा सकता है (Gerald, G. 1977, Kumar, V. & Kumar, S. 2014)।
क्तनष्कषा सामान्य व्यमि के जीिन में जदनचय ा, धमा से सम्बन्ध एिां गहरी जचतां न की प्रमिया में ाअध्यामममकता की भमू मका के सबां र्ां में मि ु ाईत्तर िाले प्र्ों के द्वारा सामान्य व्यमि, ाअध्यामममकता की ाऄमभव्यमि स्ियां के ाअर्ार पर कै से करता है? ाआसकी मििेचना के ाअर्ार पर मनष्कषा प्राप्त मकया गया मक:
ाअध्यामममकता को मदनचयाा में शाममल करने को सभी (महन्द,ू ाआस्लाम एिां कबीर पर्थां ) ने महमिपर्ू ा माना और ाआसके मलए िे समय मनकालने का प्रयास भी करते हैं।
जहााँ तक र्मा से ाअध्यामममकता का सबां र्ां है, तो िृद्ध प्रमतभामगयों ने र्मा को ाअध्यामममकता के सार्थ सबां र्ां की बात को माना। महन्दू र्मा, ाआस्लाम र्मा तर्था कबीर पांर्थ से सांबांमर्त प्रमतभामगयों ने ाअध्यामममकता को र्मा से सांबांर् की बात कही जबमक कुछ ही लोगों ने ाऄसहममत व्यि की।
गहरी मचांतन प्रमिया के रूप में मिमभन्न र्मों (महन्द,ू ाआस्लाम एिां कबीर पांर्थ) से सांबांमर्त व्यमियों ने ाऄपनी सहममत दी। मजसमें महन्दू र्मा ाऄन्य र्मों (ाआस्लाम एिां कबीर पांर्थ) की तल ु ना में ाऄमर्क सहममत जतायी है। महन्दू र्मा के लोगों ने ाअमम ि स्ि की खोज तर्था भगिान के प्रमत पर्ू ा ाअस्र्था को गहरी मचांतन प्रमिया के रूप में माना है। जबमक कबीर पांर्थ के लोगों ने मानिता को गहरी मचांतन प्रमिया माना।
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