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SHIKSHA KI GUNVATTA AUR SEVA KALIN PRASHIKSHAN

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Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2016 = 6.17, www.srjis.com UGC Approved Sr. No.45269, JULY-AUG 2017, VOL- 4/35

शिऺा की गण ु वत्ता औय सेवा कारीन प्रशिऺण सुयेन्द्र कुभाय ततवायी1 , P h.D. सॊगीता यणददवे2 1

प्राचामय स्व. गुराफफाई मादव स्भतृ त शिऺा भहाववद्मारम,फोयवाॊ (दे .अ.वव.वव.)

2

िोधाथी, दे वी अदहल्मा ववश्व ववद्मारम इॊदौय

प्रस्तुत आरेख शिऺा की गुणवत्ता व सेवाकारीन प्रशिऺण की आवश्मकता ऩय आधारयत ववचाय ववचाय है । मदद शिऺा की गुणवत्ता, आज की आवश्मकता है , तों सेवाकारीन प्रशिऺण इसभें क्मा मोगदान दे सकती है । शिऺण व्मवसाम भें हो यहे नीततगत ऩरयवतयन भें सेवाकारीन प्रशिऺण की बशू भका ऩय ववचाय प्रस्तुत ककमा गमा है । इसभें जीवन कौिर की आवश्मकता ऩय ऩय थोड़ा प्रकाि डारने का प्रमास ककमा गमा है । शिऺण व्मवसाम की दृष्टि से शिऺा की गुणवत्ता से क्मा अशबप्राम हो सकता है इस ऩय ववचाय प्रस्तुत ककए है । Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com

व्मवसातमक नीततमाॉ सभम के साथ फदरती है , शिऺण व्मवसाम एक उन्द्नतत िीर व्मवसाम है । शिऺण व्मवसाम भें तनत नए ऩरयवतयन हो यहे हैं । इन ऩरयवतयन के साथ गण ु वत्ता ऩण ू य शिऺण दी जा सकता है ,साथ ही उत्तभ वातावयण दे ने का प्रमास बी जा सकता है । सभाज व याटर की नीततमों भें ववश्व ऩिर के अनुसाय ऩरयवतयन होते हैं। इन नीततमों का ऩारन एक अच्छा नागरयक ही कय सकता है । एक अच्छे नागरयक के गण ु एक ववद्माथी भें ककस प्रकाय आएॊगे, मह तों शिऺक से अच्छा कोई बी नहीॊ फता सकता है । ववद्मार्थम य ों की आवश्मकताओॊ व ववचायों भें

ऩरयवतयन आ यहे हैं, मह ववचाय ककस तयह एक

सभाज व याटर के शरए सुखदामी हो सकते हैं, व नीततमाॉ ककस प्रकाय हभायी सॊस्कृतत व आधतु नकता को फना कय यख सकती है , मा दोनों भें साभॊजस्मता बफठा सकती है । इसकी आवश्मकता फनी हुई है। दे खा जाम तों, ववद्माथी की भाॊग सभमानुसाय ऩरयवततयत हो यही है ,

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आसऩास के वातावयण भें इतना ऻान प्राष्तत का वविार बॊडाय है , कक वह कई ववषम सॊफॊधी फाते स्वमॊ ही जान रेते है । अत: शिऺण व्मवसाम भे नीततमों का तनभायण ववद्मार्थम य ों की आवश्मकताओॊ, उनका सभाज भें स्थान व उन्द्नतत के शरए आवश्मक बफन्द्दओ ु ॊ को ध्मान भें यख कय ककमा जाता है । हभ शिऺण भें केवर मही ध्मान नहीॊ यखते, कक हभे केवर उस ववद्माथी का ववकास कयना है , अवऩतु सभाज भें वह ववद्माथी ककतना मोगदान दे सकता है , उसका बी ध्मान यखना है । हय व्मवसाम का एक ही भॊत्र होता है , “भाॊग औय ऩूततय” तों इसके अनुसाय शिऺण व्मवसाम भें नीततमाॉ ककस प्रकाय होगी। शिऺण व्मवसाम भे भाॊग है , एक अच्छे व गुणवत्ता ऩूणय उत्ऩाद की अफ इसकी ऩतू तय ककस प्रकाय की जामगी, तों शिऺण व्मवसाम की नीततमाॉ ककस प्रकाय की

होगी।

चकूॊ क शिऺण व्मवसाम ही एक ऐसा व्मवसाम है , जो सबी व्मवसाम की आधायशिरा है । मही वह व्मवसाम है ,जो बावी बववटम की नीॊव यखता है ,मदद नीॊव भें भजफूती न हो तों ककसी बी व्मवसाम कक उन्द्नतत

सॊबव नहीॊ है । अत: शिऺण व्मवसाम के शरए आवश्मक है , शिऺा की

गुणवत्ता । शिऺा की गण ु वत्ता तनदहत है , शिऺण की गुणवत्ता ऩय। अफ मदद हभ शिऺा की गुणवत्ता कक फात कयते है , तों गुणवत्ता ककस भें तनदहत है । गण ु वत्ता ददखाई दे ती है , ववद्माथी के व्मष्क्तत्व भें , सभामोजन भें , हय ऩरयष्स्थतत का साभना कयने भें , एक स्वस्थ व उत्तभ भष्स्तटक के तनभायण भें , तथा एक प्रगततिीर भष्स्तटक के

तनभायण आदद भें , शिऺा की गण ु वत्ता होनी चादहए। गण ु वत्ता के फाये भें अरग

अरग भत हो सकते है । गुणवत्ता ऩूणय शिऺा तबी सॊबव हैं,जफ उसभे नैततक भूल्म हो। आज जीवन कौिर ऩय फर ददमा जा यहा हैं । जीवन कौिर क्मा ऩहरे नहीॊ थे? जीवन कौिर से अथय क्मा रगा सकते हैं? जीवन कौिर के अॊतगयत नैततक भूल्म का सभावेि होता है ,तों क्मा Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


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ऩहरे नैततक भल् ू म नहीॊ थे? ष्जसके कायण अफ उसे एक नए नाभ के साथ प्रस्तत ु ककमा जा यहा है । जीवन कौिर के अॊतगयत

ईभानदायी, सहमोग, सदहटणुता,सहानुबूतत का सभावेि

कयते हैं,औय साधायण अथय रगाए तों जीवन-जीने

की करा, अफ जीवन तों ऩरयष्स्थततमों से

सभझौता कयके बी जीमा जाता है , तों क्मा मही जीवन कौिर है ? हभे जीवन कौिर कक आवश्मकता

भहसूस क्मों हो यही है ? जफकक

मह भूल्म तों हभायी सॊस्कृतत भें ही ववद्मभान

थे, इनकी आवश्मकता एक नमे नाभ से क्मा हो यही है ? अफ एक छोिा सा, उदाहयण कहने के शरए छोिा सा है , रेककन मह जीवन कौिर के आवश्मकता का सभझाने का कामय तों कय सकता है । 21 जनवयी 201 7 इॊदौय (भ.प्र.) के एक दै तनक सभाचाय ऩत्र भें एक सभाचाय था, िहय भें जो नवजात पेंके जाते हैं, उनभें 90% रड़ककमाॉ होती है । कहने के शरए मह सभाचाय इॊर्गत कयता है ,कक नवजात को पेकने भें बी शरॊगबेद है । रेककन एक मह प्रश्न बी तों है ,नवजात ष्जनकी िामद ही गरती होगी वो पेंके जा यहे हैं,साहस कक कभी ककसभें है , अऩनी गरती स्वीकायने भें मा गरततमों को छुऩाने भें । अफ मदद सभाचाय ऩत्रों के सभाचाय दे खे मा ववद्मार्थम य ों की थोड़ी शिऺा के प्रतत रुर्च का हभ गहयाई से अध्ममन कये तों, ववद्माथी वगय कही न कही असॊतुटि ददखाई । अफ सफकी सॊतुष्टि के अनुसाय शिऺण सॊबव नहीॊ, रेककन नैततक भूल्मों

के साथ शिऺण

सॊबव है , दे खा जाए तों शिऺा तों गण ु वत्ताऩण ू य ही थी, क्मोंकक मदद हभ शिऺा से सॊफर्धत आमोगो को दे खे तों, िामद ही कोई ऐसा आमोग होगा, ष्जसने शिऺा की गुणवत्ता की फात न की हो। नीततमों का तनभायण बी हुआ औय उसी आधाय ऩय शिऺा बी दी जा यही है । क्मा उसके किमान्द्वमन

भे कोई सभस्मा है ? अफ हभ मह नहीॊ कह सकते, कक शिऺा की गुणवत्ता

गुणवत्ता मदद ऩुस्तकीम ऻान से सभझे तों िामद कभी नहीॊ है , इसका एक उदाहयण है , दसवी की

दहन्द्दी की ककताफ के एक ऩाठ से सभझने का प्रमास कयते हैं । ऩाठ का एक बाग

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बाग है, “र्गन्द्नी का सोना” मह यवीन्द्र केरेकय द्वाया यर्चत है,व्मवहारयक आदियवाद ऩय आधारयत ऩाठ ऩूयी तयह से आऩको भ्रशभत कय दे गा आखखय हभ कहना क्मा चाहते हैं ?ववद्मार्थम य ों के साभने प्रस्तुत क्मा कयना चाहते है ? कहने के शरए मह एक उदाहयण हैं, रेककन रेककन

सभझने का प्रमास कयें , ऩाठ के सायाॊि

अनुसाय िुद्ध सोने भे जफ तक ताॊफे की

शभरावि न कये तफ तक आबूषण नहीॊ फनेगे। मह तों हुई व्मवहारयक फात रेककन कहानी भें मह बी कहा है , कक व्मवहारयक आदियवाद केवर राब औय हातन

ऩय आधारयत है ,औय ऐसे

सभाज का ऩतन जल्दी होता हैं।एक तयप सभाज को दे खे तों व्मवहारयक आदियवाद को भहत्व कही न कही ददख जाता है ,तों मह ऩाठ क्मा शिऺा दे यहा है ? कहने के शरए इस ऩाठ का सायाॊि को ऩढने के फाद शिऺा की गुणवत्ता ऩय सवार उठामा जा ही नहीॊ सकता, रेककन क्मा मही वास्तववकता है ? वास्तववकता िामद थोड़ी हि कय हैं,हभ सही अनऩ ु ात नहीॊ यख ऩा यहे हैं, मा जो आदियवाद है ,उसे व्मवहारयक रूऩ से सही रूऩ भें प्रस्तुत नहीॊ कय ऩा यहे हैं । मदद इस उदाहयण को रे तों, हभ मह नहीॊ कह सकते, की शिऺा के गुणवत्ता भें कही कोई कभी है , तों सभस्मा क्मा है ? मदद शिऺा की गुणवत्ता ऩय प्रश्न उठाए जा यहे हैं, तों िामद शिऺा के भाध्मभ, शिऺक मा वो तकनीकी ष्जसके द्वाया शिऺा ववद्मार्थम य ों के ऩास ऩहुॉच यही है ।उसभे कही कोई कभी तों नहीॊ ।मदद हभ शिऺक व शिऺक के ऩास जो साधन है ,ऩाठ्म ऩुस्तक। ऩाठ्म ऩुस्तक की फात कये तों, ऩाठ्मिभ भे ऩरयवतयन सभमानुसाय हो यहा है , ककस वगय के शरए कौनसा ऩाठ्मिभ सही है , मह दे खा जाता है । उस आधाय ऩय ऩाठ्मिभ का तनभायण होता है , अफ वह ककस रूऩ भें ववद्मार्थम य ों के ऩास ऩहुॉच यहा है , मह जानना आवश्मक है । अफ चकक ूॊ ऩरयवतयन हो यहे हैं ,इसके शरए शिऺा के हय स्तय ऩय प्रमास हो यहे हैं, अफ NCERT द्वाया चरामा जा यहा ऩाठ्मिभ ऩूये प्रदे ि भे चरामा जाएगा,मह एक प्रमास है , क्मोंकक इसभें मह हो गमा जो हभ सभानता की

फात कयते हैं,उस ऩय सवार

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उठना फॊद हो जाएॊगे। अफ इसकी आवश्मकता क्मो ऩढ़ यही है ,मह तों शिऺाववदों द्वाया ही फतामा जामगा, हो सकता है , कक NCERT के दृष्टिकोण भें साधन

ऩुस्तक जो कक शिऺक के शरए साधन

है ,िामद स्तय के अनस ु ाय नहीॊ है / मा याटरीम स्तय ऩय एकसभान ऩाठ्मिभ होना

चादहए। अत: सुधाय की आवश्मकता हैं,अफ हभ मह भान सकते हैं, कक इसके ऩीछे जो बी दृष्टिकोण होगा वह अवश्म ही नीततमों से सॊफष्न्द्धत होगा। बावी नागरयकों का तनभायण आवश्मक हैं, अऩघात कभ हो, मोगदान भें ववृ द्ध हो। मह तों हुआ ऩुस्तकों के शरए प्रमास,अफ शिऺण दऺता के शरए ककमा जाने वारा प्रमास सभम–सभम ऩय सेवाकारीन

शिऺक प्रशिऺण। अफ सेवाकारीन क्मों वेसे तों तनमभ

है ,की प्रशिक्षऺत शिऺको को ही शिऺण व्मवसाम भें यखा जाए,क्मोंकक प्रशिक्षऺत शिऺक वे हैं, जो शिऺण ववर्धमों, फार भनोववऻान तथा शिऺा की सही ष्स्थतत से ऩरयर्चत हैं। मदद गण ु वत्ता ऩय सवार उठता है , तों ववचाय उठना राज़भी है , कक कभी कहाॉ है ? हो सकता तनमभों का ऩारन नहीॊ हो यहा हैं, मा तनमभों भें

कही कोई ढीर हो सकती हैं। रेककन ऩरयवतयन िाश्वत

हैं,ऩरयवतयन को कोई योक नहीॊ सकता ।रेककन ऩरयवतयन ववर्धमों भें होता है , भूल्मो भें नहीॊ।प्रकृतत कबी फदरती नहीॊ जैसी है ,वह वैसी ही यहे गी। शिऺा की प्रकृतत उसके भूल्मों ऩय आधारयत होती है ।क्मा भूल्मों भें ऩरयवतयन हो सकता हैं? भूल्म याटर की सॊस्कृतत से जुड़े होते है ,वह याटर के ववकास के शरए आवश्मक होते हैं। याटर का ववकास वहाॉ के नागरयकों के ववकास ऩय तनबयय कयता है , नागरयक आर्थक य , साभाष्जक,औय नैततक रूऩ से सदृ ु ढ हो। ककन्द्तु उनके भूल्म अॊधववश्वास से जुड़े हो,तों क्मा शिऺा सचभुच शिऺा है ? नहीॊ, शिऺा मह सभझाने का प्रमास कयती है ,कक क्मा सही है ? शिऺा अॊधववश्वास को दयू कयके ववश्वास को जगाने का प्रमास कयती है ।इस प्रकाय शिऺा एक भात्र साधन है , उन्द्नतत का। अफ शिऺा को दे ने के साधन भें बी ऩरयवतयन आवश्मक है , कोई बी भनुटम सम्ऩूणय नहीॊ होता है ।मदद हभ एक फाय के प्रशिऺण भें मह भान रें , कक वह दऺ हो Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


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हो गमा तों भहाभानव मा अततभानव कक कल्ऩना साकाय हो गई। अफ तों सष्ृ टि भें ऩरयवतयन की आवश्मकता नहीॊ यही। रेककन मह सॊबव नहीॊ है , वह अऩूणय है इसशरए तों भानव है , उसे बी नवीन प्रशिऺण की आवश्मकता है , इसशरए तों सभम-सभम ऩय प्रशिऺण ददमा जाता है , मा मा सेवाकारीन प्रशिऺण ऩय ज़ोय डारा जाता है । सेवाकारीन प्रशिऺण की आवश्मकता क्मों है ? इस ऩय थोड़ी दृष्टि हभनें ड़ार री,ऩय सेवा कारीन प्रशिऺण भें शिऺक क्मा अऩेऺा यखता है ,औय प्रशिऺण के ऩश्चात उनसे क्मा आऩेक्षऺत ऩरयणाभ की

मथाथय भे कल्ऩना की जाती है ? प्रशिक्षऺत शिऺक भें शिऺण

अशबरुर्च, कऺा भें शिऺण दऺता,आदद के गण ु तों ववद्मभान होते हैं,रेककन सेवाकारीन प्रशिऺण के फाद इन गुणों भें ककतनी ववृ द्ध हुई है , मे उनकी शिऺण व्मवसाम के प्रतत तनटठा, ववद्मार्थम य ों की उऩरष्धध, तथा कऺा भें नई तकनीकी के साथ सपरता ऩव य शिऺण ऩय आधारयत होती ू क है । अफ हभ उऩयोक्त ष्जन तीनों गुणों की फात कय यहे हैं। इनभें सवयप्रथभ हभ

मह भान सकते हैं,कक शिऺक की व्मवसाम के प्रतत तनटठा जो आधारयत होती है ,उसकी

अशबऺभता ऩय, उसके दृष्टिकोण आदद ऩय।प्रशिक्षऺत शिऺक भें हभ मह तों भान सकते हैं,कक शिऺण व्मवसाम के प्रतत जो उसका दृष्टिकोण होगा, वह सकायात्भक ही होगा, मदद इस व्मवसाम भें ही हभ नकायात्भक ववचाय के साथ प्रवेि कयते हैं,तों अन्द्म व्मवसाम कक प्रगतत के फाये भे हभें सोचना बी नहीॊ चादहए,औय प्रशिऺण के ऩश्चात बी नकायात्भक दृष्टिकोण यहे तों उन्द्नतत की फात सोचना बी नहीॊ चादहए। सकायात्भक दृष्टिकोण अथायत गरत ऩरयष्स्थततमाॉ फदरी जा सकती हैं ,कदठन ऩरयष्स्थततमों से बी तनकरा जा सकता हैं। शिऺा नुकसान नहीॊ कय सकती हैं,ऩरयवतयन सॊबव हैं। मह तों हुआ शिऺा के प्रतत दृष्टिकोण, अफ हभ शिऺण अशबऺभता को सभझने का थोड़ा प्रमास कयते हैं।

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शिऺण अशबऺभता के शरए मह ववचाय है ,कक मह जन्द्भजात गण ु है। रेककन सबी स्थान ऩय प्रततित एक सभान होता हैं,िामद नहीॊ? अशबऺभता मदद व्मष्क्त के भौशरक गण ु भानें तों व्मष्क्त बववटम भें वह इस व्मवसाम भें ककतना सपर हो सकता है , मा ऐसे क्मा भुख्म गुण हैं, जो व्मष्क्त को इस व्मवसाम भें सपरता का (जो ववद्मार्थम य ों की उन्द्नतत ऩय आधारयत हैं ) का ध्मोतक हैं? अशबऺभता को हभ

ववषम

तनमशभतता

सभस्मा

(ववद्मार्थय मो) को

को

सर ु झाने की ऺभता

गहयाई से सभझने

की ऺभता

कदठनाइमों

भल् ू माॊकन

के प्रतत चेतना

इस प्रकाय सभझ सकते हैं-

की ऺभता

अशबऺभता

ववषम के

कामय के

गॊबीयता

तनटठा

प्रतत

प्रतत

दयू दशियता

दृड़ता

क्मा अशबऺभता प्रबाववत होती हैं ?क्मा अशबऺभता होते हुए ही कोई इस व्मवसाम भे असपर हो सकता हैं। मदद प्रशिक्षऺत शिऺको के ऩरयणाभ सॊतोंषप्रद नहीॊ हैं, मा अर्धक सुधाय की आवश्मकता हैं, मा हभ शिऺा के तनम्न स्तय की फातें कये तों शिऺा के गण ु वत्ता की फात फेभानी है । अबी ववश्व भें अऩना स्थान को न दे खे तों फेहतय हैं। हभ शिऺा की गुणवत्ताका भाऩन ककस प्रकाय कय यहे हैं? शिऺा की गुणवत्ता भें शिऺक का मोगदान, भख् ु म उसकी जन्द्भजात अशबऺभता। रेककन क्मा अशबऺभता प्रबाववत प्रबाववत होती हैं?िामद नहीॊ मा हो सकता है ,अशबऺभता व्मष्क्त की सोच ऩय बी तनबयय कयती हैं, कक वह इस व्मवसाम को ककस प्रकाय ग्रहण कय यहा हैं। मदद व्मवसाम इस दृष्टिकोण से Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


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की कही कुछ नहीॊ शभरा तों अॊत मही था, मा सफसे सयु क्षऺत व्मवसाम मही है , एक तों हुए मे मे दृष्टिकोण मा एक दस ू या दृष्टिकोण, कक भें तों केवर इसी व्मवसाम के शरए ही फना हूॉ / फनी हूॉ, मे बावना व्मष्क्त भें जफ बी आ जाम तफ िामद व्मवसाम के प्रतत तनटठा फढ़ जाती हैं।तफ कह सकते प्रशिऺण सपर था । अत: मदद प्रशिऺण व्मवसाम के प्रतत तनटठा फढ़ता है , मह प्रशिऺण की सपरता है । प्रशिऺण के फात बी ककसी अन्द्म व्मवसाम का चमन, प्रशिऺण ऩय प्रश्न खड़ा कय सकता हैं,।हभ कह सकते हैं,कक तनटठावान व्मष्क्त ही शिऺा की प्रगतत के फाये

भें सोच सकता है ,मा मे कहे शिऺा की गुणवत्ता का ख्मार यख सकता है । सेवाकारीन प्रशिऺण इसभें क्मा

सहामता कय सकती हैं? शिऺक अशबऺभता

से मह ऻात हुआ,कक व्मष्क्त भें शिऺक फनने के जन्द्भजात गुण थे,प्रशिऺण के फाद तनखाय आमा था, तों सेवाकारीन प्रशिऺण के फाद औय उत्कृटिता आएॊगी मा आनी चादहए। मही उत्कृटिता शिऺा के शरए भीर के ऩत्थय का कामय कयें गी। सेवाकारीन प्रशिऺण के ऩश्चात शिऺक भे तनम्न व्मवसातमक गुणों भें उत्कृटिता आनी चादहए। नई तकनीकी का सपरता ऩूवक य प्रमोग,नई ववर्धमो का सपरता ऩूवक य प्रमोग, नैततक गुणों को ऩारन कयने का अर्धक साभार्थमय,व्मवसाम के प्रतत तनटठा ऩारन कयने भें दृड़ता, कऺा शिऺण भें उत्कृटिता आदद।

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सेवाकाऱीन

प्रशिऺण

के

पश्चात,

शिऺक

व्यवहार

•नमी ववर्धमो का प्रमोग

•भूल्मों का ऩुन: फोध

•शिऺा की नमी आवश्मकता के

•भानशसक ववशबन्द्नता के

•साभाष्जक सभस्मा के प्रतत चेतना

आधाय ऩय सपरता ऩूवक य शिऺण दे ना ।

होनें

वाऱा

प्रतत

जागरूकता

• याटरीम स्तय की सभस्मा के प्रतत चेतना

•शिऺा की गुणवत्ता का ध्मान गुणवत्ता का ध्मान (ववर्धमों व साधन से सॊफॊर्धत)

•शिऺा

भें

प्रमास

के

जागरूकता

प्रतत

•नमी ऩरयवतयन को सही दृष्टि कोण

से स्वीकाय कयना

•ऩाठ्मिभ सहमोग •भनोववऻान

ऩुनतनभायण भें

होने

भे वारे

ऩरयवतयन की जानकायी होना •ऩयीऺा भूल्माॊकान ऩरयवतयन

किमाष्न्द्वत

कऺा शिऺण भें

पररवततन

•व्मवसातमक उन्द्नतत के शरए •व्मवसाम

•ववषम का सयरतभ रूऩ से प्रस्तुतीकयण

में

नैततक दातमत्व

•नमी तकनीकी का प्रमोग •उत्कृटि ऩरयणाभ राने का प्रमास

के

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प्रणारी भें

को

होने

सही

कयना

मा

वारे

रूऩ

व्मवसातमक

गण ु वत्ता

आवश्मकता दस ू ये गुणों कक हभ मदद फात कयते हैं,तों वह हैं कऺा भें शिऺण दऺता

कक अथायत एक प्रशिक्षऺत शिऺक अऩने प्रशिऺण के सभम जो सीख कय आमा हैं। वह ककतनी दऺता से उसका उऩमोग कऺा शिऺण भें कय सकता हैं। एक प्रशिक्षऺत शिऺक कऺा भें अऩने ववषमगत उद्देश्म व साभान्द्म उद्देश्म के साथ शिऺण प्रायॊ ब कयता हैं , उसके भष्स्तटक भें मह सोच तों होनी चादहए, कक इस प्रकयण के द्वाया कौन से साभान्द्म उद्देश्म के तनकितभ ऩहुॉचा जा सकता हैं। वे कौन से ववषमगत उद्देश्म हैं, जो भूल्माॊकन के सभम हभ प्रातत होंगे,इसके शरए कौन सी ववर्ध उऩमक् ु त होगी? कौन सी दृश्म व श्रव्म साभग्री अर्धक उऩमुक्त होंगी ?ऩाठ का प्रस्तुतीकयण भें ककस ववर्ध द्वाया ववद्मार्थम य ों की त्रदु िमों को कभ से कभ ककमा जा सकता हैं। मदद ककिोयावस्था की फात कये तों ककिोयावस्था के भनोववऻान से,साथ ही फार फार भनोववऻान से बी

बरी प्रकाय से ऩरयर्चत होना चादहए। अफ चकूॊ क हभ मह प्रशिक्षऺत

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शिऺक की फात कय यहे हैं, तों हभ मह भान सकते हैं, कक सेवाकारीन प्रशिऺण के ऩश्चात एक शिऺक भें तनम्न ऩरयवतयन हो सकते हैं, 1. वह जो दै तनक जीवन से सॊफर्धत उदाहयण अऩनी कऺा भें दे ता थे, उसे आज कक वास्तववकता के साथ साथयकता से जोड़ सके। 2. सभाज भें यहे फदराव को प्रकयण के साथ जोड़कय दै तनक जीवन के उदाहयणों द्वाया ववद्मार्थम य ों तक ऩहुॊचा ऩामे। 3. बववटम भें होने वारी सभस्माएॉ एवॊ आवश्मकता को दै तनक जीवन के उदाहयणों के साथ सष्म्भशरत कय सके। 4. आधतु नक ववर्धमों का प्रमोग कऺा भें अनुिासन के साथ ऩूये आत्भववश्वास के साथ प्रमोग कय सके। 5. ववद्मार्थम य ों के भनोववऻान व उन ऩय हो यहे फाहयी वातावयण के

प्रबाव को कायण जों

ऩरयवतयन हो यहे हैं, उसे दे खते हुए कऺा के स्तय को एक सभान ष्स्थतत तक राने का प्रमास शिऺक के द्वाया हो सकता है । 6. सभऩणय उसका फढ़ जाएगा, वह शिऺा भें हो यहे ऩरयवतयन जो बववटम के शरए आवश्मक हैं , उसे अऩनाएगा। 7. वह स्वमॊ बी नई तकनीकी द्वाया स्वाध्माम भें रग जाएगा। तीसयी जो प्रभख य ों की उऩरष्धध जफ हभ ववद्मार्थम य ों की ु फात है , वह ववद्मार्थम उऩरष्धध के फात कयते हैं , तों हभ कह सकते है कक ष्जतना उसका भानशसक स्तय था, उसने उतनी उऩरष्धध हाशसर की। रेककन मदद हभ शिऺण दऺता के सॊदबय भें रे ,तों एक प्रशिक्षऺत शिऺक के शरए ववद्मार्थम य ों की उऩरष्धध के भामने क्मा हैं? अत: हभ

मह कह सकते हैं, कक

शिऺक केवर उनके शरए नहीॊ होते ष्जनका भानशसक स्तय ऊॉचा हो, व जो ककसी बी वस्तु को

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को आसानी से सभझ कय प्रगतत कय रें, तों इसभें शिऺण दऺता का प्रततित ककतना, कहने का अथय हैं , उच्च शिऺण दऺता +उच्च भानशसक स्तय=उच्च उऩरष्धध,रेककन उच्च शिऺण दऺता +तनम्न भानशसक स्तय=साभान्द्म उऩरष्धध शिऺण तबी गुणवत्ता ऩूणय सभझा जाएगा। अत: हभ एक कऺा भें मदद शिऺण दऺता का भूल्माॊकन कयना है , तों मह तबी सॊबव है , जफ उच्च भानशसक स्तय वारे ववद्माथी सही सभम ऩय उऩरष्धध तथा तनम्न भानशसक स्तय वारे ववद्माथी साभान्द्म उऩरष्धध प्रातत कये ।मदद भाध्मशभक स्तय ऩय शिऺा की दऺता का आकरन कयना हैं ,तों हभ उस वगय की साभान्द्म दहन्द्दी, साभान्द्म अॉग्रेजी,साभान्द्म ववऻान,साभान्द्म गखणत,का अध्ममन कयना ऩड़ेगा। अत: शिऺक भें मह दऺता होनी चादहए,कक कऺा का तनम्न िैक्षऺक उऩरष्धध वारा ववद्माथी कभ से कभ दहन्द्दी, अॉग्रेजी भें वाचन,तथा रेखन तों कय सके। जो ववषम है , उस कऺा के अनुरूऩ वह प्रस्तुत तों कय सके। उच्च उऩरष्धध तों उच्च भानशसकता का ऩरयचामक होती हैं। साभान्द्म उऩरष्धध तनम्न भानशसक स्तय के शरए शिऺण दऺता की उत्कृटिता का ऩरयचामक होगी। सेवाकारीन प्रशिऺण भेँ इन फातों को ध्मान भें यखते हुए प्रशिऺण की व्मवस्था होनी चादहए, ताकक एक शिक्षऺत सभाज आए। ष्जनभें आत्भ तनबययता हों, दस ू ये ऩय आर्श्रत यहने के स्थान ऩय स्वमॊ कामय कये , सभाज के शरए फोझ न फनकय एक उऩमोगी उत्ऩाद फनें। सॊदबय : ऩार एच. आय. (2006). प्रगत शिऺा मनोववऻान . ददल्री : दहॊदी भाध्मभ कामायन्द्वम तनदे िारम ददल्री ववश्वववद्मारम फैयक नॊ 2 एवॊ4 . ऩार एच.आय.(201 0). िैक्षऺक-िोध. बोऩार:भध्म प्रदे ि अकादभी

बोऩार ।

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