Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2018 = 6.371, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFERRED JOURNAL, JULY-AUG, 2019, VOL- 7/52
महात्मा ज्योतिरावफुले: शै क्षतिक दृतिकोि की सामातिक भूतमका A Critical Analysis of the Social Role of Mahatma JyotibaPhule’s Educational Perspective कतविा ना. खोब्रागडे शोध छात्रा (पीएच.डी. शशक्षा शास्त्र ), शशक्षा शिभाग , महात्मा गाांधी अांतरराष्ट्रीय शहदां ी शिश्वशिद्यालय, िधाा, महाराष्ट्र. ई.मेल : kavitakhobragade18@gmail.com Abstract
इस शोध पत्र में महात्मा ज्योशतराि फुले के शैक्षशिक दृशिकोि की सामाशजक भशू मका का अध्ययन शकया गया है।भारत में िर्षों से चलतीआई ििाव्यिस्थाने शनचली जाशत और नारी शशक्षा की उपेक्षा की थी ।महात्मा फुले के काल में जाशतयता और ििाव्यिस्था परम शशखर पर थी। शनचली जाशत और नारी जाशत के शशक्षा की उस समय की शस्थशत अत्यांत गांभीर थी । महात्मा फुले तत्काशलन शस्थशत का अध्ययन कर चक ु े थे और िेंशशक्षा को मानिी शिकास का एकमात्र साधनमानते हैं।शशक्षा अपने अशस्ति के होने का एहसास शदलाती हैयह उनका मानना था ।उन्होनें शनचली जाशत और नारी शशक्षा के शिकास को लेकर हटां र आयोग में तत्कालीन शशक्षा व्यिस्था को चनु ौती देनेिाले शिचार रखे तथा तत्कालीन िांशचत,पीशित,दशलत और नारी आशद को मानो शशक्षा का एक शिकल्प प्रशतमान शदया।फुले द्वारा शदया गया शशक्षा का शिकल्प प्रशतमानआज भी प्रासांशगक है।यह शिकल्प प्रशतमान सामाशजक शशक्षा का एक अच्छा उदाहरि है।प्रस्तुत शोध द्वारा शोधकती ने महात्मा ज्योशतराि फुले के शैशक्षक दृशिकोि की सामाशजक भशू मका का अध्ययन शकया हैं । प्रस्तुत शोध गुिात्मक शोध शिशध के आधार पर ऐशतहाशसक शोध शिधाद्वारा पिू ा शकया गया है।प्रदत्त सांकलन हेतु प्राथशमक और शद्वतीय स्त्रोत के आधारपर प्रदत्तों को सांकशलत शकया गया हैं।ज्योशतराि फुले समाज पररितान के अग्रदतू रहे हैं।आज िांशचत, पीशित और दशलत समाज की शैशक्षक प्रगशत सोचनीय है।इस शपछिे समाज के शिकास का मद्दु ा हरदम शििाशदत रहा है पर आज तक समाधान कारक चचाा सामने नहीं आयी है।सही मायने में शपछिे समाज का सिाागीि शिकास शशक्षा व्यिस्था की बिी चनु ौती रही है।शैशक्षक शिकास हेतु महात्मा फुले ने तत्कालीन शस्थशत में शपछिे समाज के शिकास हेतु क्या प्रयास और सझु ाि शदए हैं और उनके शैशक्षक दृशिकोि की सामाशजक भशू मका क्या रही आशद का अध्ययन प्रस्तुत शोध व्दारा शकया गया हैं ।इस शोध द्वारा महात्मा फुले की सामाशजक शशक्षा और िांशचत, पीशित तथा दशलत समाज पर रहे प्रभाि को भी देखा गया हैं। मख्ु य शबांदु : महात्मा ज्योशतराि फुले, सामाशजक शशक्षा, समाज पररितान, शनचली जाशत, ििाव्यिस्था. Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com
प्रस्िावना : “ दबे-कुचले वगों में बुद्धिमत्ता,नैद्धतकता,प्रगद्धत एवं समृद्धि का द्धवकास करने हेतु द्धिक्षा की आवश्यकता सवााद्धधक है।” --- महात्मा फुले Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12642
महात्मा ज्योद्धतराव फुलेएक समता मल ू क और न्याय पर आधाररत समाज रचना की बात करते रहे। उन्होंने अपनी रचनाओ ं में द्धकसानों और खेद्धतहर मजदरू ों के द्धलए द्धवस्तृत योजना का उल्लेख द्धकया है। पिपु ालन, खेती, द्धसंचाई व्यवस्था के बारे में उन्होंने द्धवस्तार से द्धलखा है तथा गरीबों के बच्चों की द्धिक्षा पर उन्होंने बहुत ध्यान द्धदया।उन्होंने आज से 150 वर्ा पहले कृ द्धर् द्धिक्षा के द्धलए कृ द्धर्द्धवद्यालय खोलने की बात की।1875 में पणु े और अहमदनगर द्धजले में द्धकसानों का प्रथम आंदोलन महात्मा फुलेकी प्रेरणा से हुआ था। इस समय समाज के अन्य सधु ारकों में द्धकसानों के बारे में द्धवस्तार से सोच-द्धवचार करने का ररवाज़ नहीं था लेद्धकन महात्मा फुले ने इसे अपने आंदोलन का द्धहस्सा बनाया। स्त्री द्धिक्षा से सम्बद्धन्धत महात्मा फुलेके द्धवचार क्ाद्धं तकारी रहे। मनु की व्यवस्था में सभी वणों की स्त्री को िद्रू के श्रेणी में द्धगनाजाता था।महात्मा फुलेने प्रचद्धलत द्धववाह पिद्धत में बडे सधु ार के साथ नई द्धववाह द्धवद्धध का द्धनमााण अपने सत्यधमा नामक सगंठन के जररए द्धकया। प्रचद्धलत द्धववाह प्रथा के कमाकाडं में स्त्री को परुु र् के अधीन माना जाता था लेद्धकन महात्मा फुलेका दिान हर स्तर पर गैर-बराबरी का द्धवरोध करता था।महात्मा ज्योद्धतराव फुले महानद्धवचारक, समाज सेवी तथा क्ाद्धन्तकारी कायाकताा थे। महात्मा फुले ने मद्धहलाओ,ं दद्धलतों एवं िद्रू ो कीद्धिक्षा के द्धवकास हेतु अपना संपणू ा जीवन समद्धपात द्धकया।महात्मा फुले भारतीय समाज के सभी वगों को समान द्धिक्षा प्रदान करने के प्रबल समथाकरहे । डॉ. अम्बेडकर महात्मा फुलेके व्यद्धित्व-कृ द्धतत्व से अत्यद्धधक प्रभाद्धवत रहे हैं ।महात्मा फुलेसन् 19वीं िताब्दी के सामाद्धजक पररवतान के महानायक रहे । उन्होनें सामाद्धजक न्याय और द्धिक्षा के द्धवद्धिष्ट ध्येय के द्धलए अपना जीवन समद्धपात द्धकया। काया और द्धवचार से ओतप्रेत महात्मा ज्योद्धतरावफुले चम्ु बकीय व्यद्धित्व के धनी और महान व्यद्धि रहे। महात्मा फुलेने स्त्री द्धिक्षा, द्धवधवा द्धववाह, जाद्धत द्धनमाल ू न, द्धकसान और कामगारों के जीवन में मल ू भतू पररवतान लाए।सामाद्धजक समता, धाद्धमाक सद्धहष्णतु ा, आद्धथाक न्याय, और िोर्ण मद्धु ि के द्धलए ज्योद्धतराव ने जीवन के अद्धन्तम क्षण तक सघं र्ा द्धकया। आधद्धु नक महाराष्र के एक महान समाज-द्धचतं कज्योद्धतराव फुले मानवतावादी द्धवचारों से प्रेररत थे। द्धिक्षा हर दृद्धष्ट से प्रत्येक व्यद्धि के सधु ार का माध्यम हैं यह उनकी धारणा थी।महात्मा फुले ने इसी द्वार को िद्रू ोंअद्धतिद्रू ों तथा मद्धहलाओ ं के द्धलए खोलकर नवभारत की नींव रखी। दद्धलत और िोद्धर्त वगा को उनके मानवीय हक द्धदलाने के द्धलए उन्होनें जीवन भर संघर्ा द्धकया। ज्योद्धतराव और उनकी पत्नी साद्धवत्रीबाई दोनों का जीवन हर भारतीय के द्धलए गौरवपणू ा और गवा करने वाला है। आधद्धु नक महाराष्र की रचना में फुलेदंपद्धत्त ने महत्वपणू ा Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12643
योगदान द्धदया।सामाद्धजक क्ांद्धत के संगठन रूप में महाराष्र और भारत के इद्धतहास में महात्मा फुलेका स्थान अलौद्धकक है। अपने जीवन मे उन्होनें द्धवचार और कमा को अद्धधक महत्व द्धदया। बचपन से सामाद्धजक, धाद्धमाक, और आद्धथाक भेदभाव को तथा जातीयता के कारण उस समय के उच्च वगा द्वारा द्धनम्न वगा के साथ िोद्धर्त बतााव के ज्योद्धतराव गवाह रहे। इसद्धलए सामाद्धजक क्ांद्धत की मिाल अपनी २५ वर्ा की आयु में लेकर जीवन के अन्त तक समाज पररवतान के द्धलए जझू ते रहे तथा आधद्धु नक भारतीय समाज के द्धनमााण में महत्वपणू ा योगदान देते रहे ।तत्कालीन सामाद्धजक नवजागरण का प्रभाव और क्ाद्धं त ने उन्हें समाज पररवतान की प्रेरणा दी थी। तत्कालीन ईसाई द्धमिनरी का मानवतावाद, थॉमस पेन का मानव अद्धधकार, धाई मााँ सगणु ाबाई के मानव धमा के सस्ं कार और ईसाई पादररयों के व्यद्धित्त्व और काया प्रणाली का प्रत्यक्ष प्रभाव आद्धद सभी प्रभाव उनके जीवन में सामाद्धजक काया कीनींव रही। द्धमत्रों के साथ बचपन में खेल-कूदकी उम्र में उन्होंने द्धवद्धभन्न पस्ु तकों का अध्ययन द्धकया।उन्होंने भारत के सामाद्धजक, आद्धथाक और राजकीय पृष्ठभद्धू म का अध्ययन द्धकया। भारतीय समाज में प्रचद्धलत प्रथा, परम्परा, रीद्धत-ररवाजजो इस समाज के द्धवकास की मख्ु यधारा को रोक लगाई बैठी थी इसका द्धवरोध कर सामाद्धजक पररवतान की मिाल जलाई।द्धजसके कारण द्धनचली जाद्धत और स्त्री समाज अपने मानव होने के अद्धधकार से वंद्धचत हैं इस सामाद्धजक द्धवडम्बना को फुले महोदय जानते थे ।इस द्धवडम्बना का द्धवरोध कर समाज में नवपररवतान का ध्वज लहराया। ज्योद्धतराव ने िराब बंदी के द्धलए आंदोलन कर िहर में िराब बंद कराई।िद्रू ों के द्धलए अपने घर में पानी पीने का तालाब खदु वाए। जैसी कथनी वैसी करनी के चररत्राथा नायक महात्मा ज्योद्धतराव फुले ने 28 नवम्बर 1890 में संसार से द्धवदाली।सम्पणू ा मानव जाद्धत को मानव होने के भाव से पररद्धचत कराने वाले ज्योद्धतराव सच में महान क्ांद्धतकारी थे।महात्मा फुले ने कोद्धिपीद्धडत, वंद्धचत, अस्पृश्य, दद्धलत समाज के लोगों का अपनी आत्म उन्नद्धत और द्धवकास का मागा (द्धदिा) द्धदखाया । शोध प्रश्न :
महात्मा फुले के समय की सामाद्धजक कै सी थी ?
महात्मा फुले के समय की राजकीय द्धस्थद्धत कै सी थी ?
महात्मा फुले के समय की आद्धथाक कै सी थी ?
महात्मा फुले के सामाद्धजक क्ांद्धत में सामाद्धजक द्धिक्षाका द्धवकल्प प्रद्धतमान क्या था ?
महात्मा फुले की सामाद्धजक द्धिक्षा क्या थी ?
Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12644
महात्मा फुले के सामाद्धजक क्ांद्धत मे सामाद्धजक द्धिक्षा का काया क्या था ?
शोध के उदेश्य : महात्मा फुले के काल की सामाद्धजक,आद्धथाक, राजकीय द्धस्थद्धत का अध्ययन करना । महात्मा फुले के सामाद्धजक द्धिक्षा की भद्धू मका का अध्ययन करना । वंद्धचत, द्धपद्धडत, द्धपछडे और स्त्री समाज के द्धिक्षा में सकारात्मक पररवतान हेतु महात्मा फुले के द्धवकल्प प्रद्धतमान का अध्ययन करना । महात्मा फुले कालीन (ित्कातलन) सामातिक तस्िति : "भारत में राष्रीयता की भावना का द्धवकास तब तक नही होंगा ,जब तक खान-पान एवं वैवाद्धहक सबं धो पर जाद्धतय बंधन बने रहेंगे ।" महात्मा फुले प्रस्िावना : १९वी िताब्दी के पवू ााधा और उत्तराध्दा में भारतीय राजनौद्धतक, सामाद्धजक, आद्धथाक, आद्धद सभी क्षेत्र मे बडे उथल-पथु ल के साक्षी रहे हैं । १९ वी िताब्दी में भारत में यगु ान्तरकारी पररवतानों का सत्रू पात हो गया था । १६ वी िताब्दी मे आये अग्रेंजो नें अब तक पंजाब को छोडा तो सम्पणू ा भारत मे अपना वचास्व बना द्धलया था । भारत मे आझादी के आंदोलन िरू ु हो चक ु े थे । फ्रान्स की राज्यक्ांद्धत के कारण यरु ोप में एक नई द्धवचारधारा का प्रारम्भ हो चक ु ा था । इग्ं लन्ड की औद्योद्धगक क्ांद्धत के कारण भारत मे माद्धिनों का उपयोग बढा था, यातायात के साधनों में वृद्धि हुई थी । दरू संचार, रे ल, बैंक, आद्धद सद्धु वधा से परस्पर संपका और व्यवहार बढे, द्धवचारों के आदान-प्रदान को गद्धत द्धमली । भारतीय लोग पढने लगे थे । अथाात भारतीयों के द्धवचारों में दासता के द्धवरुि सघं र्ा की आग द्धनमााण हो चक ु ी थी । द्धिद्धिि िासन के आगमन तक भारतीय समाज को द्धवद्धभन्न कुरीद्धतओ ं ने जखड् रखा था । सतीप्रथा, कन्यावध जैसी भीर्ण एवं बाल द्धववाह जैसी घातक और अस्पृश्यता तथा जाद्धतभेद जैसी हाद्धनकारक कुरीद्धतयों ने देि को पतन के गता में धके ल रखा था । यरु ोप की नई द्धवचारधारा एवं द्धिक्षा के कारण भारत के सामाद्धजक द्धजवन में क्ांद्धतकारी पररवतान होने िरू ु हो गये थे । भारतीय बुिीजीद्धवयों में महात्मा फुले नई द्धवचारधारा से प्रेररत होकर महाराष्र की एक अद्धव्दतीय द्धवभद्धू तके रूप मे महाराष्र के सामाद्धजक बदला व हेतू मानोवें महानक्ांद्धतकारी के द्धलए उभार आये थे। (कुमार Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12645
,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स.२०-२१,चंचरीक, कन्हेयालाल ," महात्मा ज्योद्धतराव फुले", पृ.स.११ ) तत्काद्धलन भारत की सामाद्धजक द्धस्थद्धत : भारतमें अंग्रेजोंसे पहले ग्रामसंस्था, जातीसंस्था, और पररवार का प्रचलन यही गावके जीवन की आधारिीला थी। लेकीन अंग्रेजों के िासन का पररणाम इन तीनों पर हुआ और कूछ ही समय बाद ये संस्था लप्तु हो गई । धमा संस्था के िद्धििाली समथान से चातवु र्णया प्रणाली पर आधाररत जाद्धत व्यवस्था अद्धधक सख्ती से जीद्धवत रहने लगी थी । सामाद्धजक जीवन का कें द्रद्धबंदू अब व्यद्धि न रहा था । व्यद्धि ग्रामसस्ं था से के वल वणा और पररवार की सस्ं थाओ ं के माध्यम से ही सपं का बनाए रखते थे । राजसस्ं था से ग्रामसस्ं थाओ ं के माफा त ही व्यद्धि का जीवन परंपराओ,ं अधं ाद्धवश्वासों से जकडा हुआ था । मोक्ष की कल्पना व्यद्धिगत स्वरूप की थी । िाह्मणों का कमा था परु ोद्धहती । उनके पास जमीन बहुत कम थी । गाव की खेती योग्य जमीन के मद्धलक अद्धधकतर मराठे थे । दद्धलत जाद्धतयों के पास जमीन होती भी थी पर बहुत थोडी । गाव का पािील मराठा जाद्धत का द्धजन्हे वंिानक् ु म से पािील बनने का अद्धधकार प्राप्त होता था । पािील का प्रमख ु काया ग्रामसंस्था और राजसंस्था के बीच संबंध बनाये रखना । यह गााँव से लगान इकठा करता था और उसे समय समय पर सरकार के दरबार में जमा करता था । उसकी यह द्धजम्मेदारी प्रथम थी । इस काया में उसे कुलकणी की साहायता द्धमलती थी । कुलकणी के पद भी वंिानक् ु म से प्राप्त होते थे । चौकीदारी का काम उन महार, मांग, दद्धलतों को सौंपा जाता था द्धजनके पवू ाजों ने भी यह काया द्धकया था ।(कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स.१९ ,चंचरीक, कन्हेयालाल ," महात्मा ज्योद्धतराव फुले", पृ.स.१६ ) महात्माफुलेकालीनमहाराष्रसामाद्धजकद्धस्थद्धत :वास्तवमेंइद्धतहास का पनु ेलेखन इद्धतहास का अद्धवभाज्य अगं होता है । अतीत के तथ्थों की तलाि उनकी प्रामाद्धणकता-प्रासद्धं गकता की पृद्धष्ट करना, द्धवश्लेर्ण करना और व्याख्या करना ।१९ वी िताब्दी के मध्य तक भारतीयों में राजनैद्धतक एकता के द्धवचार का उदय नही हुआ था । प्राचीन काल से उच्च वगों का सास्ं कृ द्धतक दृद्धष्टकोण एक जैसा था । द्धिद्धिि िासकों की एक नीद्धत थी द्धक, भारत मे द्धवद्धभन्न जाद्धत, पंथ, धमा, के लोग थे द्धजनकी भार्ा, संस्कृ द्धत अलग-अलग थी । इसद्धलए द्धवद्धभन्न सामदु ाद्धयक चेतनाओ ं को प्रोत्साहन देने की नीद्धत का अनसु रण द्धिद्धिि कर रहे थे । भारतीय जनता मे एकता का प्रभत्ु व द्धिद्धििों के द्धलए भयावह था इसद्धलए िाहमण-अिाहमण तथा उच्चवगा और दद्धलत वगा के भेदों का दरुु पयोग Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12646
द्धकया गया था ।(सचू ना ,ताराचंद."भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इद्धतहास " खंड -४ मंत्र्यालय भारत सरकार पृ.स.xvii)सद्धदयोंतकगााँवोकीसामाद्धजक और बौद्धिक द्धस्थद्धत अंधाद्धवश्सास पणू ा , संकुद्धचत और रूढीवादी बनी रही । गााँव आद्धथाक प्रवाह हीनता ,सामाद्धजक प्रद्धतद्धक्यावाद और सांस्कृ द्धतक अन्धेपण के अलग-अलग के न्द्र बने थे ।द्धिवाजी ने स्थाद्धपत मराठा राज्य और बाद पेिवाई िासन के समाप्त होते-होते सामाद्धजक द्धस्थद्धत में भी बहुत बडा पररवतान आया । द्धव्दतीय बाजीराव के िासनकाल में अनैद्धतकता, जाद्धतवाद खल ु कर सामने आने लगा था । मात्र िाह्मण अपने स्वाथा की द्धसध्दी के द्धलए बाजीराव को कृ ष्ण, द्धिव का अवतार मानकर उसकी पजू ा, अचाना करने लगे थे । उसके िासनकाल में जातीयता चरम सीमा पर पहुच गई थी ।(कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स. २२ चचं रीक, कन्हेयालाल ," महात्मा ज्योद्धतराव फुले", पृ.स.१६ ) तत्काद्धलन द्धहन्ं दू स्त्री की सामाद्धजक द्धस्थद्धत : द्धहदं ू िास्त्रों के अनसु ारस्त्री को अद्धवश्वासी, दृष्ट, चच ं ल, अद्धवचारी और स्त्रेण माना जाता था । स्त्री का पती के साथ बैठकर भोजन करना अपमान माना जाता था । उसका द्धववाह बाल्यावस्था कर द्धदया जाता था । पती के साथ न रहना और ससरु के लोगों की सेवा करने के द्धलए उसे रखा जाता था । लोभी परुु र् अद्धधक सख ु प्राप्त करने और अपनी आकांक्षाओ ं की पतु ी हेतू दो या तीन द्धववाह करते थे और अपनी पत्नी को एक घर में रखते थे ।(कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स. ,चंचरीक, कन्हेयालाल ," महात्मा ज्योद्धतराव फुले", पृ.स.१६ ,) पेिवािासनमेिाह्मण का समाज मे स्थान :िाह्मणअपनेस्वाथाकीद्धसद्धध्दके द्धलएबाजीरावकोकृ ष्ण, द्धिव का अवतार मानकर उसकी पजू ा, अचाना करके और उसकी झठु ी तारीफ व प्रिंसा करने के कारण बाजीराव खि ु होकार उन्हे भद्धू म देना, लगान मे छुि देना, राजकीय करों में भी उन्हे अब भारी छुि द्धमलने से िाह्मण वगा आद्धथाक संप्पन्न होने लगे थे । पनु ा के आस-पास बार बार अकाल की द्धस्थद्धत द्धनमााण होती थी इस पररद्धस्थती मे द्धकसान मजदरू भख ू से बेहाल रहते थे, पर पेिवा सपं न्न पद्धर्णडत, वेदप् ाठीयों और िाह्मणों को भरपेि भोजन, पयााप्त मात्र में अनाज का द्धवतरण करता था । (मेश्राम ,एल. जी." महात्मा फुले रचनावली " पृ .स. १४५-१४६ ,िहा. म,ु बा. " भारतीय समाज क्ाद्धं त के जनक ",पृ.स. १५ ,कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान",पृ.स.२९ ) पेिवा िासनमे द्धकसान कामगारों की सामाद्धजक द्धस्थद्धत : गरीब जनता का िोर्ण पेिवाई काल में सबसे ज्यादा हुआ। कारण पेिवा बाजीराव द्धनरन्तर अपने र्ड्यंतत्रों के तहत होने वाले यध्ु दों और द्धवलाद्धसतापणू ा जीवन मे व्यस्त रहता था । उसके द्धलए पेिवा की बार-बार Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12647
धन की मााँग बनी ही रहती थी । इस धनपद्धु ता के द्धलए पेिवा के कमाचारी द्धकसानों की फसलें जबरन लिु द्धलया करते थे । द्धकसानों के पिओ ु ं को भी बेच देते थे । पेिवा का इतना आतंक था की, कोई भी द्धकसान राज्यकमाचारी या उनके नीद्धत के द्धखलाफ आवाज तक नही उठा सकता था । द्धकसानों से चौथ और सरदेिमख ु ी या जबरन धनवसल ु ी एक आम बात हो गई थी । महात्मा फुले ने अपने द्धकसान कोंडा नामक पस्ु तक मे द्धकसान के हाल का द्धवस्तार से लेखन कर द्धकसानों की समस्या को उजागार द्धकया है । (िहा. म,ु बा. " भारतीय समाज क्ांद्धत के जनक" ,पृ.स. १५ ) द्धकसानतीनभागोंमेबिाहुआहै। िद्रु समाज के द्धकसान कुणबी, माली और धनगर नाम से जाने जाते हैं जो िद्रु के वल खेती कर अपना पेि पालते थे वे 'कुलवाडी' या कुणबी कहलाते थे । जो खेद्धतहार अपनी खेती सभं ालकर बागवानी करने लगे थे उन्हे 'माली' कहा गया । जो यह दोनों काम करते हुए भेड-बकरी चराने और उनके समहू पालने लगे वे गडररए कहलाते थे । लेकीन इन तीनों समदु ायों में रोिी-बेिी व्यवहार नही होता था पर मेलजोल बना रहता हैं । इससे यह लगता हैं की ये जाद्धत एक ही िद्रु जाद्धत से उपजी होंगी । अद्धधकांि लोग अनपढ और ईश्वरभिी में द्धवश्वास करनेवाले और भख ू -े कंगाल, द्धजसके पास आजीद्धवका का कोई साधन नही था । ज्योद्धतराव इस ग्रंथ मे महाराष्र के गरीब द्धकसान के तंगहाल और दयनीय जीवन का द्धचत्रण करते हुए कहते है की, िाह्मण परु ोद्धहत िद्रु ों को जन्म से लेकर स्मिान तक और गभाधारणा से लेकर तीथायात्रा तक द्धवद्धभन्न अवसरों पर धमा के नाम पर लिु ते थे ।( फुले द्धलद्धखत द्धकसान कोंडा ग्रन्थ की प्रस्तावना से ,फुले, ज्योतीराव. "गुलामद्धगरी " पृ.स.२३ मेश्राम ,एल. जी." महात्मा फुले रचनावली " कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स.२८ ) पेिवा िासन मे दद्धलत िद्रु की सामाद्धजक द्धस्थद्धत : सामाद्धजक द्धस्थद्धत के द्धवर्य में फुलेने अपने ग्रंथ गुलामद्धगरी में द्धलखा है द्धक, "आजतक द्धजतनी भी द्धधगं ामस्ती हुई है उसमे भी तरसे कहो या बाहर से, िाह्मण पद्धर्णडत परु ोद्धहत वगा के लोग अगवु ाई नही कर रहे थे, ऐसा हो ही नही सकता । इस द्रोह का परु ा नेतत्ृ व वे लोग ही कर रहे थे । उमाजी नाईक रामोिी महाराष्र का एक िद्रु जाद्धत में पैदा हुआ व्यद्धि था, जो लडाकू था, अग्रं ेंजों से मक ु ाबला कर िहीद हो गया लेकीन िाह्मण िहीदों को याद द्धकया जाता िद्रु को नही ।"( फुले, ज्योतीराव. "गुलामद्धगरी " पृ.स.२९ ) दद्धलत का जीवन गुलामों से भी बदतर हो गया था । वे अपनी मल ु भतू जरुरतों को पेिवाई स्वरक्षण प्राप्त िाह्मणो, साहुकारो से कजा लेकर परु ा करते थे और सदू से मि ु नही हो पाते थे । भ्रष्टाचार समाज में परु ी तरह व्याप्त हो चक ु ा Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12648
था। सन १८१८ में जब मराठा राज्य का पणू ा रूप से पतन हो गया तो आम जनता में ख़ि ु ी की लहर व्याप्त हुई, दद्धलत और िद्रु वगा ने तो बहुत ही राहत महससू की । (कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स.२६ ,मेश्राम ,एल. जी." महात्मा फुले रचनावली " पृ .स. १९८-१९९) महाराष्र के ग्रामों की सामाद्धजक द्धस्थद्धत :महाराष्रके ग्रामों मे िाह्मण ,मराठा,माली, सतु ार,लहु ार तेली जैसी जाद्धत आधाररत समाज रचना और जाद्धत आधाररत व्यवसाय थे । िाह्मणणों का कमा परु ोद्धहती था । खेती योग्य जमीन के मद्धलक अद्धधकतर मराठे थे । ग्राम सस्ं था, जातीसस्ं था और सयं ि ु पररवार का प्रचलन था । व्यद्धि इस परंपरागत सामाद्धजक जीवन का कें द्रद्धबंदू न था । सामतं वादी व्यवस्था में राजा सवोच्च होता था, लेकीन ग्रामीण भद्धू म पर उसका कोई अद्धधकार नही होता था । ग्रामीण भद्धू म तो ग्राम समाज और ग्रामीण लोगों के अधीन रहती थी । कुल पैदावार का एक द्धनद्धित भाग राजा को लगान के रूप में जरूर द्धदया जाता था । राजा को कर के रूप में द्धदये गये भाग के अद्धतररि िेर् पैदावर गााँव के ही उपयोग के द्धलए होती थी । गााँव मे बढई, लहु ार, कुम्हार, मोची, धोबी, तेली, आद्धद जैसे वंिनक् ु म से प्राप्त व्यवसाय द्धकये जाते थे, यह गााँव की जरुरतों को परु ा करते थे । गााँव मे हलखोर का काम करने वाले वगा को अछुत समझा जाता था । लोगों के व्यवसाय उनकी जाद्धत के आधार पर द्धनद्धित थे । लोग अपनी जरुरतों को परु ा करने के द्धलए अन्य समदु ायों से नाममात्र का लेन-देन या द्धवद्धनमय करते थे । यातयात के साधन सीद्धमत थे । (मेश्राम ,एल. जी." महात्मा फुले रचनावली " पृ .स. २१०,िहा. म,ु बा. " भारतीय समाज क्ांद्धत के जनक ",पृ.स. १२ ,कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स.२३,) महाराष्र की तत्काद्धलन राजकीय द्धस्थद्धत महाराष्र मे मराठा िासन की िद्धि और द्धवनाि :मराठािद्धिके प्रद्धतकद्धिवाजी ने अपनी बाल्याकाल मे पनु ा की जागीर प्राप्त की थी । यह जागीर उन्हे द्धवरासत से अपनी द्धपता से द्धमली थी । तत्काद्धलन महाराष्र के सामाद्धजक पृष्ठभमू ी को समझने के द्धलए इस देि की मराठा िद्धि को जानना जरुरी है । मराठा िद्धि के प्रद्धतक द्धिवाजी को जागीर अपने द्धपता िहाजी से द्धमली । िहाजी द्धबजापरू ररयासत के प्रमख ु सामन्त थे और उनकी सेना में अद्धधकाि ं द्धनम्न जाद्धत वगा के पराक्मी, वीर योध्दा, द्धकसान थे । जागीर द्धमलने के बाद द्धिवाजी ने सबसे पहले द्धवकें द्धद्रत मराठा िद्धि को एकीकृ त द्धकया ।महाराष्रके िद्धिसंपन्नमराठासरदारमहात्ववांक्षा के द्धिकार होकार आपसी संघर्ा में उलझ गये। िाहूजी की िद्धि क्षीण होने लगी, तब राजकाज में चतुर नीद्धत-द्धनपणु द्धचतपावन िाहमन पररवार के लोगों को आगे आने का अवसर Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12649
द्धमला । वे िाहुजी के नए पेिवा के रूप में सामने आये और मराठा सरदार सबसे अद्धधक संपन्न हो गये । बाद मे इन पेिवाओ ं ने चातुया से द्धिवाजी के वंिजों को नाममात्र का िासक बना द्धदया और सम्पणू ा िासन को की बागडोर अपने हाथों में ले ली । इस प्रकार पनु ा दरबार में पेिवाओ ं का प्रभाव स्थाद्धपत हो गया ।पेिवा बालाजी द्धवश्वनाथ (१७१३-१७२०), बाजीराव (१७२०-१७४०), बालाजी बाजीराव द्धव्दतीय (१७४०- १७६१), । १७६० में जब पाद्धनपत की तीसरी लडाई हूई तो मराठे अहमदिाह अब्दाली से हार गए और अब मराठों की िद्धि धीरे धीरे क्षीण होते गयी । बाद में पेिवा माधवराव (१७६१-१७७२) और पेिवा नारायणराव (१७७२-१७७३ ) ने पनु ा ररयासत में िद्धि सन्ं तल ु न बनाए रखने का बहुत प्रयास द्धकया गया लेकीन इस्ि ईद्धंडया कम्पनी की साम्रज्य द्धवस्तार की नीद्धत का द्धनरन्तर दबाव बढता गया । मराठा राज्य के िासक वगा के लोग आम जनता के द्धहतों को दरद्धकनार कर अपने द्धहतों और महत्वकांक्षाओ ं की पतु ी में लग गए , द्धजस से आम जनता खासकर मराठा जाद्धतयों, कामगारों, द्धकसानों, तथा द्धनम्न वगा के लोगों में उनके प्रद्धत असंतोर् उत्त्पन हो गया ।िाह्मण वगा के लोग उस समय िासकीय पदों पर थे, वे हर तरह से अपने तथा अपनी जाद्धत के लोगों के द्धहतों प्रद्धत संलन्ग थे । उसके कारण जाद्धतवाद बहुत ही द्धघनौने रूप में सम्पणू ा महाराष्र में फै लने लगा था । (चंचरीक, कन्हेयालाल."महात्मा ज्योद्धतराव फुले",पृ.स.१३ ,मेश्राम ,एल. जी." महात्मा फुले रचनावली " पृ .स. १९५ ,िहा. म,ु बा. " भारतीय समाज क्ांद्धत के जनक ",पृ.स. १२ ,कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स.१६ ) मराठा सघं षष और तब्रतिश का आगमन : पेिवा माधवराव की उनके चाचा रघनु ाथ रावने िासन के लालच में हत्या करदी, द्धजससे मराठा सरदार रघनु ाथ के द्धखलाफ होग येथे। अपनों के द्धखलाफ के कारण उसे अंग्रेजो की मदद लेनी पडी । पररणाम स्वरूप सन १७७५ में प्रथम अग्रं ेज मराठा यध्ु द हुआ । यही से मराठों का पतन होने लगा ।१माचा१७७६ को अग्रं ेजों और पनु ादरबार के बीच परु ादं र की सद्धन्ध हुई। बम्बई सरकार द्वारा पनु ा दरबार से एक और सद्धन्ध की गई, जो बडगााँव मे हुई थी । इस सद्धन्ध का कारण था अग्रं ेजों का मराठे से हारना १७ मई १७८२ को सालबाई में पनु ा दरबार और अग्रं ेजो के मध्य एक सद्धन्ध हुई । सन १८०० में नाना फडणवीस की मत्ु यु के पेिवा और द्धसद्धं धया के बीच सद्धन्ध हुई लेकीन दोनों एक-दसु रे को िंका की दृष्टी से देखते थे ।देखते-देखते पनु ा के दरबार से िाह्मण जाद्धत के पेिवाकी गद्दी हाथसे आपसी उलझन के कारण द्धनकाल गई । पेिवाओ ं के इस कृ द्धतत्व से पनु ा और दद्धक्षण के लोगो का मनोबल िूि चक ु ा था । पेिवा ने आद्धखर ३१ द्धदसंबर १८०२ को लॉडा वैलेजली से सद्धन्ध से मराठो से २६ लाख रुपये वाद्धर्ाक Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12650
आय की भद्धू म भी पेिवाओ ं द्वारा हद्धथया ली । पेिवा िाह्मण का जप-तप, पजू ा-पाठ, सब कूछ धरा का धरा रह गया।२० फरवरी १८१८ को अंग्रेजो के समक्ष आत्मसमपाण कर द्धदया । पेिवाई का अन्त हो गया । इस प्रकार पनु ा में परु ी तरह अंग्रेजी राज्य कायम हो गया । इस प्रकार द्धिवाजी द्वारा बडे यत्न और पररश्रमपवू ाक स्थाद्धपत स्वत्रत मराठा राज्य को इन पेिवाओनं े अपनी महत्वाकांक्षा और स्वाथापरता, जाद्धतवाद, छुंआछुंत, ऊचनीच, पारस्पाररक वैमनस्य, कें द्धद्रय सत्ता का अभाव और िाह्मण धमा में पाखर्णड के वचास्व के कारण हमेिा-हमेिा के द्धलए खो द्धदया और अग्रं ेजी िासन का गल ु ाम बना द्धदया । (कुमार ,प्रभात. " समाज सधु ार मे फुले का योगदान" ,पृ.स.१८ ) भारत की राजव्यवस्था : भारत में अग्रं ेजों से पहले ग्रामसस्ं था, जातीसस्ं था, और पररवार का प्रचलन यही गावके जीवन की आधारिीला थी। लेकीन अग्रं ेजों के िासन का पररणाम इन तीनों पर हुआ और कूछ ही समय बाद ये सस्ं था लप्तु हो गई । धमा सस्ं था के िद्धििाली समथान से चातुवर्णया प्रणाली पर आधाररत जाद्धत व्यवस्था अद्धधक सख्ती से जीद्धवत रहने लगी थी । सामाद्धजक जीवन का कें द्रद्धबंदू अब व्यद्धि न रहा था । व्यद्धि ग्रामसंस्था से के वल वणा और पररवार की संस्थाओ ं के माध्यम से ही संपका बनाए रखते थे । राजसंस्था से ग्रामसंस्थाओ ं के माफा त ही व्यद्धि का जीवन परंपराओ,ं अंधाद्धवश्वासों से जकडा हुआ था । मोक्ष की कल्पना व्यद्धिगत स्वरूप की थी । िाह्मणों का कमा था परु ोद्धहती । उनके पास जमीन बहुत कम थी । गााँव की खेती योग्य जमीन के मद्धलक अद्धधकतर मराठे थे । दद्धलत जाद्धतयों के पास जमीन होती भी थी पर बहुत थोडी । गााँव का पािील मराठा जाद्धत का द्धजन्हे वंिानक् ु म से पािील बनने का अद्धधकार प्राप्त होता था । पािील का प्रमख ु काया ग्रामसंस्था और राजसंस्था के बीच संबंध बनाये रखना । यह गााँव से लगान इकठा करता था और उसे समय समय पर सरकार के दरबार में जमा करता था । उसकी यह द्धजम्मेदारी प्रथम थी । इस काया में उसे कुलकणी की साहायता द्धमलती थी । कुलकणी के पद भी वि ु म से प्राप्त होते थे । चौकीदारी का काम उन महार, मागं , दद्धलतों को सौंपा जाता था द्धजनके पवू ाजों ं ानक् ने भी यह काया द्धकया था । महात्मा फुले कालीन भारि की आतिषक तस्िति : भारतपरअद्धधकारकरनेमेंअग्रेंजोकोसौसालभीकमसमयलगा। १७५७ से १८५७ के बीच कम्पनी की नीद्धत में अनेंको बार पररवतान हुए थे । द्धकन्तु इस दरम्यान कम्पनी ने अपने मख्ु य उद्देंश्यों कों कभी भी अपने आखों से ओझल नही द्धकया । वे उद्देश्य थे-कम्पनी के मनु ाफे में वृद्धध्द करना, भारत से होने वाले द्धििेन के लाभों में वृद्धध्द करना, तथा भारत में द्धिद्धिि प्रभत्ु व को बनाए रखना । भारत में अंग्रेजों के द्धहतों को ध्यान में रखकर और उन्हे बढावा देने के Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12651
द्धलए कम्पनी तथा द्धििेन की सरकार ने नई आद्धथाक द्धनद्धतयों का प्रद्धतपादन द्धकया और समयानक ु ु ल उन्हे लागू द्धकया । अग्रोजों ने द्धजन आद्धथाक द्धनद्धतयों को अपनाया उनके कारण भ-ू राजस्व प्रणाली, कृ र्ी, व्यापार, और उद्योग के क्षेत्र में अनेक पररवतान हुए । इन पररवतानों का भारतीय जन-जीवन पर बडा प्रभाव पडा । उसमे कूछ अच्छे भी थे, द्धकन्तु स्वाथा से प्रेररत होने कारण भारतीयों के द्धलए ये ज्यादातर अद्धहतकारक साद्धबत हुए । (फुले, ज्योतीराव,गुलामद्धगरी पृ.स ४३ .मेश्राम .एल. जी- महात्मा फुले रचनावली- पृ .स. २०२,३०९ ,३१३ ) ग्रामीि अिषव्यवस्िा : अंग्रेंजों के आगमन के पहले तक भारत मे सभी गांव लगभग आत्मद्धनभार थे । द्धकसान खेती करते थे और अपनी उपज का एक भाग राजस्व के रूप में िासक को देते थे । िासक ग्राम प्रधान के माध्यम से वसल ु ी करते थे । अग्रं ेजों ने अपने िासन मे अपने अद्धधकारीयों और भारतीयों एजेंन्िों के द्धनयत्रं ण में परु ानी व्यवस्था को जारी रखा । परन्तु यह भारतीय एजेंि उच्च वगा के थे । यह द्धकसानों को कष्ट देने लगे । राजस्व द्धनद्धित रािी के रूप में वसल ू द्धकया जाने लगा, द्धफर उपन्न चाहे जो भी हो । राजस्व की वसल ु ी मद्रु ा के रूप में होने लगी इसद्धलए द्धकसान ऐसी फसलें उगाने के द्धलए मजबूर हुए द्धजन्हे बाजार में बेचा जा सके । माद्धिनों द्वारा बनाये कपडे और अन्य उत्पाद्धदत वस्तूओ ं के कारण स्थानीय दस्तकारों के धन्दे भी चौपि होने लगेथे । अब गावों की आत्मद्धनभारता समाप्त होने लगी थी । (मेश्राम .एल. जी."महात्मा फुले रचनावली". पृ .स. ६८ ,कीर,ध . "महात्मा ज्योतीराव फुले "पृ.सं.१८२-१८४ ) भारि की लिु :लगान के नाम पर द्धकसानों का खनू चसु ा जा रहा था । उनकी तबाही और बरबादी का अन्दाजा प्रद्धतवर्ा बढने वाली मालगुजारी की रकम के आकडे १७७५-७६ तक यह रकम २८ लाख, १८ हजार पौन्ड थी । अनेक भागों से भारत का सोना इग्ं लंड जाने लगा था । (िहा. म,ु बा. "भारतीय समाज क्ांद्धत के जनक",पृ.स.४ ) औद्योतगक पुंिीवाद का युग :भारतके आद्धथाकिोर्ण के इद्धतहास में १८१३ ई. वर्ा महत्वपणू ा माना जाता है । अब कम्पनी के एकाद्धधकार का अन्त हो गया था और औद्योद्धगक पजंु ीवाद द्वारा भारत के िोर्ण का नया अध्याय िरू ु हुआ था । इग्ं लडं में औद्योद्धगक क्ाद्धन्त के फलस्वरूप बडे-बडे कारखाने खल ु चक ु े थे इन कारखानों में कम खचा पर अद्धधक कापडों का उत्पादन होने लगा था । अब हाथ से बने भारतीय कापडों से सस्ते अग्रं ेजी कपडे द्धमलने कारण भारतीय वस्त्र उद्योग खत्म होने लगा था । इससे देि का आद्धथाक ऱ्हास बडी तीव्रता से होने लगा था । भारत का कच्चा माल सस्ते दाम में खरीद कर कारखानों में बना पक्का माल भारत के बाजार में बेचा जाने लगा । औद्योद्धगक पंजु ीवाद के कारण बेकारों की संख्या मे वृद्धध्द होने लगी और लाखों भारतीय आजीद्धवका के अभाव Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12652
में अकाल के महु में समा गये । १९ वी सदी के पवु ााध्दा में सात बार अकाल पडा द्धजसमें अनेक व्यद्धि भख ू से तडप-तडपकर मर गये । १८३३ के बाद औद्योद्धगक पंजु ीवाद ने औपद्धनवेद्धिक िोर्ण का एक और क्षेत्र द्धनकाला की, भारत में जमीन खरीद कर बागानों के माद्धलकों कें रूप में वहा बस जाने की इजाजत दी जाने लगी । भारत में बागानों की प्रथा थी । (िहा. म,ु बा. "भारतीय समाज क्ांद्धत के जनक",पृ.स. १) महाराष्र की तत्काद्धलन आद्धथाक द्धस्थद्धत : महाराष्र के ग्रामोंका आद्धथाक िोर्ण : सामतं वादी व्यवस्थामें राजा सवोच्च होता था, लेकीन ग्रामीण भद्धू मपर उसका कोई अद्धधकार नही होता था। ग्रामीण भद्धू म तो ग्राम समाज और ग्रामीण लोगों के अधीन रहती थी । कुल पैदावार का एक द्धनद्धित भाग राजा को लगान के रूप में जरूर द्धदया जाता था । राजा को कर के रूप में द्धदये गये भाग के अद्धतररि िेर् पैदावर गाव के ही उपयोग के द्धलए होती थी । गााँव मे बढई, लहु ार, कुम्हार, मोची, धोबी, तेली, आद्धद जैसे वंिनक् ु म से प्राप्त व्यवसाय द्धकये जाते थे, यह गााँव की जरुरतों को परु ा करते थे । गााँव मे हलखोर का काम करने वाले वगा को अछुत समझा जाता था । लोगों के व्यवसाय उनकी जाद्धत के आधार पर द्धनद्धित थे । लोग अपनी जरुरतों को परु ा करने के द्धलए अन्य समदु ायों से नाममात्र का लेन-देन या द्धवद्धनमय करते थे । यातयात के साधन सीद्धमत थे । दद्धलत िद्रु वगा के लोग खेती-मजदरु ी करके , दस्तकारी करके भी अपने पररवार को भरपेि भोजन, तन ढकने को सही ढग के कपडे तथा रहने को दो हाथ जगह व छत भी नही जिू ा पाते थे । उनका जीवन गुलामों से भी बदतर हो गया था । वे अपनी मल ु भतू जरुरतों को पेिवाई स्वरक्षण प्राप्त िाह्मणो, साहुकारो से कजा लेकर परु ा करते थे और सदू से मि ु नही हो पाते थे । भ्रष्टाचार समाज में परु ी तरह व्याप्त हो चक ु ा था । (कुमार ,प्रभात." समाज सधु ार मे फुले का योगदान" पृ.स.२२ २१, चंचरीक, कन्हेयालाल."महात्मा ज्योद्धतराव फुले",पृ.स.१२,) महात्मा फुले की सामातिक तशक्षा सामातिक तशक्षा :सामाद्धजक द्धिक्षा का तात्पया प्रौढ द्धिक्षा के समान साक्षरता प्रदान करने मात्र से नही है । साक्षरता तो एकमात्र आगामी द्धिक्षा को प्राप्त करने का साधन द्धजसे उपलब्ध कराकर द्धिद्धक्षत द्धकया जा सकता है । हस्ताक्षर करना द्धिक्षा नही है । देि में द्धवद्धभन्न सामाद्धजक रूढी, परम्परा, बुराईयााँ, द्धपछडापण, अंधद्धवश्वास, संकीणाता, अवैज्ञाद्धनकता, द्धनधानता आद्धद को समल ू नष्ट कर सामाद्धजक पनु रुत्थान कर आध्याद्धत्मक एवं नैद्धतक द्धवकास, वैज्ञाद्धनक एवं तकनीकी उन्नद्धत आद्धद द्धवकास सामाद्धजक द्धिक्षा के अंग है। Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12653
महात्मा फुले की सामाद्धजक द्धिक्षा और सामाद्धजक क्ाद्धं त मे योगदान प्रस्िावना : ज्योद्धतबा फुले ने दद्धलत आंदोलन का एक सन्ु दर बीज बोया था । तत्काद्धलन समाज व्यवस्था िाह्मण व्यवस्था के द्धवरुि जोतीबा फुले ने क्ांद्धत की घोर्णा की । जोतीबा फुले ने समाज से छुंआ-छुंत द्धमिाने का द्धपडा उठाया । तत्काद्धलन समाज ने क्ांद्धत ज्योद्धत के साथ जो व्यवहार द्धकया, वह उनके साले अपनी बहन साद्धवत्री को द्धलखे एक पत्र से स्पष्ट होता है वे द्धलखते है, "बहन तमु और द्धजजाजी बद्धहष्कृ त हो गए हो । महार मागं दद्धलत के द्धलए तमु जो काम करते हो, वह कुल भ्रष्ट करने वाला है । इसद्धलए कहता हुं द्धक जाद्धत रूढी के अनसु ार िाह्मण जो कहे, उसी प्रकार आचरण करना चद्धहए । "साद्धवत्रीबाई अपने भाई को उत्तर देते हुए पत्र द्धलखती है और उससे उनका सामाद्धजक काया का दृढ द्धनिय स्पष्ट होता है," भाई तुम्हारी बुद्धि कम है और िाह्मण भट्ट लोगों की द्धिक्षा से वह दबु ाल बनी हुई है । तुम तो गाय बकरी के पास जाकर उन्हे सहला सकते हो । नाग पंचमी के अवसर पर द्धवर्ेले नागों को दधु द्धपला सकते हो, लेकीन महार, मांगों को जो तुम जैसे ही है, उन्हे अछुंत मानते हो । भट्ट लोग तुम्हे भी कलद्धु र्त मानते है और महार मांगों जैसा ही समझते है । महार मांग पढ द्धलखकर इन्सान बनकर जीए । इसके द्धलए कोद्धिि करने वाले ज्योद्धतबा महार-मांगों को पढाते है और मै दावे के साथ कहती हुं द्धक वे यह अच्छां काया कर रहे हैं । मैं उनकी मदद करती हुं । यह इतना आनन्दायक है द्धक इससे परमानन्द द्धमलता है उसके अद्धतररि मनष्ु यत्व की सीमा भी दृष्टीगोचार होती हैं । " उपरोि द्धववरण से तत्काद्धलन समाज ने फुले के साथ जो व्यवहार द्धकया वह स्पष्ट होता है अथाात इसका मतलब बचपन से द्धनचले जाद्धत मे जन्म में ज्योती को हर समय उच्च वणा के व्यवहार से परे िानी हुई । उनके सामाद्धजक क्ांद्धत की प्रेरणा अब उन्हे बैचेन कर रही थी । (कीर धनजं य, "महात्मा जोद्धतराव फुले " पृ.स.११७ ,जगताप ,म.ु '' यगु परुु र् महात्मा फुले '' पृ,स,७७ ,नरके ,एच." महात्मा फुले साद्धहत्य और द्धवचार" पृ.सं.१९ ) ज्योतीराव का प्रथम बाद्धलका स्कूल : १८४४ में ज्योद्धतबा ने खोली प्रथम स्कूल मे प्रारम्भ में ६ बाद्धलकाएं थी, द्धजसमे ४ िाह्मण , १ मराठा, १ धनगर । उनके नाम इस प्रकार –
Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
नाम १ . अन्न पणू ाा जोशी २ . समु ती मोकाशी ३. दगु ाा देशमख ु ४ . माधवी धत्ते ५ . सोनू पवार ६ . जनी करडडले
12654
आयु ५ ४ ६ ६ ४ ५
उपरोि सारणी से पता चलता हैं की ज्योद्धतराव द्वारा खोला गया प्रथम द्धवद्यालय द्धजसमे सभी जाद्धत की नारी का प्रवेि हैं । अथाात उस समय सभी जाद्धत के नारी की द्धिक्षा के द्धलए महात्मा फुले काया कर रहे थे ।
प्रथम बालिका स्कूि : (द्धवद्रोही एम.आर." दद्धलत दस्तावेज "पृ.स. ९९) नारी तशक्षा के तलए योगदान : हमारे देि का दभु ााग्य ही है की द्धजस देि मे आद्धदििी के रूप में नारी की कल्पना की गई हो और जहा "यत्रं नायस्ताु पज्ू यते तत्र देवता" उद्धि प्रचद्धलत हो उसी देि में नारी की द्धस्थद्धत एक पिसु मान हो गई थी । धमा के ठे केदारों ने िास्त्रों को तोड-मोडकर कर कुछ ऐसा रच द्धदया द्धक नारी के वल भोग्या ही बन गयी थी । वास्तव में जो समाज की द्धनमाात्री थी उसकी यह दिा देखकर ज्योतीराव बहुत द्राद्धवत हुए हुए । दसु री ओर हमारे देि के पतन के गता में पहुची नारी अद्धिक्षा और अज्ञानवि परू ु र्ों के अत्याचार सहते हुए गुलामी के बन्धन में जकडी हुई थी । नारी द्धिक्षा के कारय् में ज्योतीराव को बडी मद्धु श्कलों का सामना करना पडा । उन पर अत्याचार द्धकये गये । द्धहदं ू Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12655
लडद्धकयों के द्धलए अमेररकन द्धमिन द्वारा सन १८१९ में १९ वी सदी की की प्रथम पाठिाला खोली गई थी । सन १८४० में कूछ अन्य द्धवद्यालय पणु े के आस-पास भी खोली गई थी । स्कािीि द्धमिन के द्वारा पणु े मे एक द्धवद्यालय खोला गया था, उसमें १० बाद्धलका यें पढती थी। सन १८४८ उनके िाह्मण द्धमत्र गोवंडे इनाम कद्धमिन में काम करते थे, उनका स्थानांतरण अहमदनगर के जज कायाालय मे हुआ था । यह जगह द्धमिनरी द्धवद्यालय के द्धलए बहुत प्रद्धसि थी । ज्योतीराव अपने द्धमत्र से द्धमला और वहा के कुमारी फरा र की अमेररकन द्धमिन द्वारा सच ं ाद्धलत स्त्री स्कूल को देखने गये । भारत के स्त्री द्धिक्षा को लेकर फराार इतनी द्धचद्धं तत देख ज्योद्धतराव व गोवडं े प्रभाद्धवत हुए । उन्होनें द्धनणाय द्धलया की पनु ा जाकर वह दद्धलत स्त्री के द्धलए पाठिाला खोलकर इसका सदं ेि परु े महाराष्र जाए। ज्योद्धतराव पनु ा लौिते ही सन १९४८ के अगस्त माह में बुधवार पेठ महु ह्ले में द्धभडे के मकान में द्धनम्न जाद्धत के लडकीयों के प्रथम स्कूल खोली गई । स्कूल की प्रथम मद्धहला द्धिद्धक्षका के रूप में अपनी पत्नी साद्धवत्री की द्धनयद्धु ि की । अब समाज में हलचल मच गई । इससे धमा भ्रष्ट होगा । धमा ग्रंथ के अनसु ार िद्रु पढ नही सकते, यह ईश्वर, धमा, और समाज की इच्छा और मयाादा के द्धवपरीत हैं । द्धवद्या िद्रु के घर द्धनवास नही कर सकती आद्धद जैसी चचाा और आलोचना होने लगी । साद्धवत्री पर तो पाखंडीयों ने पत्थर गोबर, लकडी, फे की पर साद्धवत्री अपने काया से जरा भी नही हिी । इतना दृढ संकल्प था । बेिा ज्योती अब नही सनू रहा तो द्धपता गोद्धवदराव को समझाया गया की इस धमा भ्रष्ट कृ त्य को बंद करे । द्धपता ने ज्योद्धत को द्धिक्षा प्रसार और सधु ार काया को बंद करने को कहा नही तो घर से द्धनकल जाने को कहा । ज्योतीराव और साद्धवत्री ने घर छोड द्धदया । अब उनका आद्धथाक बल ओर कमजोर हो गया पर वे अपने दृढ संकल्प पर द्धस्थर थे । ज्योतीराव का यह काया अब काफी प्रगद्धत पर था । अपनी इस संस्था की बदौलत उन्होने सन १८५१ की १७ द्धसतम्बर को रास्ता पेठ नामक महु ल्ले में एक अन्य कन्या द्धवद्यालय की स्थापना की । इस द्धवदयालय का द्धनरीक्षण करने के बाद दादोबा पाडं ु रंग तखाडकर ने यह मत व्यि करते हुए कहा था की, ''इतने काम समय में द्धवद्यालय की प्रगद्धत का श्रेय उसके सच ं ालकों को ही जाता है । द्धिक्षा बोडा के अध्यक्ष जॉन वाडान और न्यायाधीि िाऊन ने द्धवद्यालय के काया को देखकर काफी सन्तोर् व्यि द्धकया था । नारी द्धिक्षा और द्धनम्न जाद्धत के द्धिक्षा की द्धहमायत करने वाले के रूप में ज्योतीराव का नाम सम्पणू ा महाराष्र मे गुजने लगा था । अथक पररश्रम और त्याग अब चारों तरफ एक ऐसी ज्योद्धत के रूप में प्रकाि द्धजससे सम्पणू ा पददद्धलत समाज प्रकाद्धित होने लगा था । पनु ा आब्ज्वरा नामक पत्र ने उनके १२ जनू १८५२ के अंक में द्धलखा था की, अपने देश्वाद्धसयों के उिार के Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12656
द्धलए ज्योतीराव द्वारा जो प्रयास द्धकये जा रहे हैं और नारी द्धिक्षा के क्षेत्र में उन्होने जो प्रिंसनीय काया द्धकया है इसके द्धलए सरकार से उन्हे २०० रुपये का सम्मान-वस्त्र इनाम द्धदया था । (कीर धनंजय, "महात्मा जोद्धतराव फुले " पृ.स.४७ ,जगताप ,म.ु '' यगु परुु र् महात्मा फुले '' पृ,स,१४४,मेश्राम ,एल.जी." महात्मा ज्योद्धतबा फुले रचनावली ".पृ.सं.,नरके ,एच." महात्मा फुले साद्धहत्य और द्धवचार" पृ.सं२५.२७ ) ज्योतिबा द्वारा अपने िीवन काल में खोले गए तवद्यालय की सच ू ी: अ.क्र लिद्यािय का नाम १ डिडेवाडा डजला पनु ा २ हररजन , डजला पनू ा ३ हडपसर डजला पनु ा ४ ओतरू ,डजला पनु ा ५ सवड,डजला पनु ा ६ आलहाट का घर डज .पनु ा ७ नाय गाव ता.खडं ाला डज ,सातारा ८ डशरवल,तालक ु ा खडं ाला.डज सातारा ९ तले गाव , ढमढेले ,डज .पनु ा १० डशरवर,डजला पनु ा ११ आजीरवादी ,माजगाव १२ कारंजे ,डज सातारा १३ डिगार १४ मढू ले ,डज पनु ा १५ अप्पा साहेब डिपलनू कर १६ नाना पेठ पनु ा १७ रास्ता पेठ ,पनु ा १८ बेताल पेठ,पनु ा (तवद्रोही एम.आर." दतलि दस्िावेि "पृ.स. ९९)
स्थापना लिलथ १-१-१८४८ १५-५-१८४९ १-८-१८४८ १५-१२-१८४८ २०-१२-१८४९ १-७ -१८४९ १५-७-१८४९ १८-७-१८४९ १-८-१८४९ ८-८-१८४९ ३-३-१८५० ६-३-१८५० १९-९-१८५० १-१२-१८५० ३-७-१८५१ १-१२-१८५१ १७-९-१८५१ १५-३-१८५२
दतलि तशक्षा मे योगदान : सन १८५४ वर्ा दद्धलतों के उिार के द्धलए सनु हरा और बहुत ही बडा पररवतान लानेवाला साद्धबत हुआ । इद्धतहास मे वडू का खद्धलता के नाम जाना जानेवाला यह ज्ञापन दद्धलत द्धिक्षा के व्दार खोलने में मद्दगार साद्धबत हुआ । १९ जल ु ाई १८५४ इसि् इद्धं डया कम्पनी के सच ं ालकों ने एक ज्ञापन भारत सरकार को मागादिान के द्धलए भेजा द्धजसमे द्धलखा था द्धक "जो गरीब जनता खदु की मेहनत से द्धिक्षा लेने मे असमथा है, उसे जीवन में उपयि ु Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12657
और व्यावहाररक ज्ञान के द्धलए योग्य बनाने हेतू द्धिक्षा दी जाये । हमारी इच्छा है की सरकार भद्धवष्य में उद्धचत कदम उठाकर इस लक्ष्य को हाद्धसल करे । इसके द्धलए सरकार अद्धधक व्यय करने के द्धलए तैयार हैं । " इस ज्ञापन मे आगे यह भी द्धलखा था द्धक, "द्धकसी भी द्धवद्याथी को जाद्धत के कारण सरकारी द्धवद्यालय या महाद्धवद्यालय में प्रवेि देने से इन्कार नही द्धकया जाए । '' यह ज्ञापन दद्धलत द्धिक्षा के द्धलए महान आदेि ही था । वडू के इस ज्ञापन ने भारतीय द्धिक्षा क्षेत्र में क्ांद्धत लाई थी । लेकीन यह इतना आसन न था । उस समय उच्च पदों पर द्धवराजमान अद्धधकारी द्धनम्न वगा के द्धिक्षा क्के द्धवरोधी थे । अहमदनगर के द्धनवाद्धसयों ने १८५५ में दद्धलतों के द्धलए द्धवद्यालय खोलने ने का द्धनवेदन द्धदया था और उसके अनसु ार सरकार ने वहा एक द्धवद्यालय भी खोला था । द्धिक्षा बोडा की ररपोिा में यह भी द्धलखा था की, "यह पहला अवसर है की हम लोगों ने दद्धलतों के द्धलए द्धवद्यालय खोला है । "( मेश्राम ,एल.जी." महात्मा ज्योद्धतबा फुले रचनावली ".पृ.सं.) १८५६ में महार जाद्धत के एक द्धवद्याथी को धारवाड के द्धवद्यालय में प्रवेि के द्धलए वहा के प्रधानाध्यापक ने रोक लगाई थी इस मद्दु े को लेकर कें द्र सरकार और मंबु ई सरकार के बीच बहस हुई थी । इस द्धवर्य पर राय देते हुए लंडन द्धस्थत कम्पनी के संचालक ने कहा था द्धक, " हमारा यह उद्देि है की सरकारी द्धिक्षा संस्था सभी वगा के द्धलए खल ु ी होनी चाद्धहए । कूछ अद्धधकारी मंबु ई सरकार के डर से सद्धदयों से चली आ रही दद्धु र्त परम्परा को तोडने से डरते हैं पर सरकारी स्कूल जाद्धत-पाती द्धवरद्धहत होनी चाद्धहए । ( कीर धनंजय, "महात्मा जोद्धतराव फुले " पृ.स.११७ ,मेश्राम ,एल.जी." महात्मा ज्योद्धतबा फुले रचनावली ".पृ.सं. ) द्धिक्षा को सावजाद्धनक और सभी वगा के खल ु ने के प्रयास तो हो रहे थे पर िाह्मण वाद के कारण बार-बार उसमे पररवतान भी होते थे । इस समस्या को सल ु झाने और उस समस्या का समाधान भी अब उन्हे आिा की द्धकरण दे रही थी । एक िाह्मण वगा दद्धलत द्धिक्षा का द्धवरोध कर रहा था, तो वही िाह्मण जो ज्योतीराव के द्धमत्र होते थे वे उन्हे द्धिक्षा काया मे मद्द कर रहे थे । दद्धलतों के द्धिक्षा के बारे में ज्योद्धतराव का यह द्धवचार था की, "द्धनम्न वगों को इस प्रकार की द्धिक्षा दी जाये की वे व्यद्धिगत स्वतत्रता के अद्धधकारों व सामाद्धजक समानता के समानता के द्धलए लड सके । ( जगताप ,मु . '' यगु परुु र् महात्मा फुले '' पृ,स,३५, नरके ,एच." महात्मा फुले साद्धहत्य और द्धवचार" पृ.सं . ९० )
Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12658
हिं र आयोग में प्रस्ििु महात्मा फुले के शै तक्षक तवचार भारतीय द्धिक्षा के प्रचार-प्रसार में 'अधोमख ु ीद्धनश्यंदन द्धसध्दांत' प्रचद्धलत था। द्धिक्षा सम्बन्धी समस्याओ ं और उनके सधु ार के सम्बध में सझु ाव प्रस्तुत करने के द्धलए द्धिद्धिि सरकार ने द्धवद्धलयम हिं र की अध्यक्षता में सन1882 में एक आयोग गद्धठत द्धकया था।द्धजसका नाम ''हिं र कमीिन" था।उसमे द्धदए गये सझु ावों में महात्मा फुले तत्कालीन द्धिक्षाव्यवस्था के बारे में बताते हैं की, द्धिक्षा का प्रारम्भ नीचे से उपर की ओर करना चाद्धहए न द्धक ऊपर से नीचे की ओर। पहले नींव और द्धफर कलि यह िायद आपके इग्लडं में होता होंगा और पहलेकलि द्धफर नींव का द्धनमााण वहााँ पर सम्भव हुआ हो हमारे यहााँ यह सम्भव नही हैं। हमारे यहा वणाभेद हैं, जाद्धतभेद हैं, हमारा समाज अखडं नही हैं । यहााँ ऊाँचाई पर रहनेवाले लोग ज्ञान को द्धनचली जाद्धत के लोगों तक आने नही देंती। वें नहरे जरुर खोदेंगे पर बाधं बनाकर पानी को उपर ही रोक लेंगे।उन्होंने अब तक ज्ञान गंगा का पानी रोक रखा हैं। आप उन्हे द्धनचली जाद्धत के द्धिक्षा के अद्धधकार मत सौद्धपये। यह द्धजम्मेदारी आपको ही उठाना होंगा।" महात्मा ज्योद्धतराव के द्धवचार से स्पष्ट होता हैं, की उस समय के द्धिक्षा सम्बन्धी समस्या का अध्ययन ज्योद्धतराव कर चक ु े थे।उनकी सोच व्यापक एवं गम्भीर थी। ज्योद्धतराव ने अपने प्रस्ताव में द्धचंता व्यि की हैं द्धक, सरकार की अगर यह सोच हैं द्धक, "उच्च वगा के लोग द्धनम्न वगा में द्धिक्षा का प्रचार-प्रसार करें गी तभी धीर-धीरे द्धनम्न वगा द्धिद्धक्षत एवं संस्काररत होंगा।" तो सरकार धोखे में हैं । सच्चाई तो यह हैं की, गरीब द्धकसानों से पैसा इकठ्ठा करके सरकार उसे उच्च वगा की द्धिक्षा पर लिु ा रही हैं । यह द्धिक्षा देने वाले द्धवश्वद्धवद्यालय अमीरों के लडकों का भौद्धतक जीवन संपन्न करने का काम कर रही हैं। इन अमीरपत्रु ों ने पढकर देिवाद्धसयों का कुछ भी भला द्धकया हैं ऐसा द्धदखाई नही देता। उन्होनें ना तो अपना कोई आदिा समाज में प्रस्तुत द्धकयाहैं और ना ही जरुरतमदों के द्धलए कोई स्कुल खोले और ना ही दभु ााद्धगयों को अपने घरों में पनाह दी। तो द्धफर यह द्धकस काम के हैं?" आगे उन्होनें कहा की "द्धहन्दी द्धवद्यापीठ के समथाकों से मेरा सवाल हैं की, वे आज तक के अनभु व के आधार पर हमे कोई एक उदाहरण बता सकते हैं, जो उनकी मान्यता को सही द्धसि कर दे।" जब ऐसा द्धसि नही होता हैंतो द्धफर द्धकस आधार पर यह कहा जाता हैं द्धक भारतीय समाज के लोगों का बौद्धिक और नैद्धतक स्तर यद्धद उपर उठाना हैं तो पहले उच्च वगों की द्धिक्षा का स्तर बढाना होंगा। द्धनवेदन में फुले महोदय एक ओर बातपर ध्यान कें द्धद्रत करते हुए बताते हैं की, "राष्रकल्याण में वृिी हुई हैं अथवा नही यह जानने के द्धलए महाद्धवद्यालय में द्धिक्षा ग्रहण कर रहे द्धवद्याद्धथायों की संख्या और द्धवश्वद्धवद्यालयीन उपाधीयों की सचू ी ही एकमात्र साधन नही हैं । द्धजस प्रकार जंगल Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12659
में द्धिकार के संबंध में काननू बनाने से या दस पौंड कर अदा करने वाले को मतदान का अद्धधकार देने से संद्धवधान की कल्याणकररता साद्धबत नही होती उसी प्रकार द्धवश्वद्धवद्यालय से द्धनकलने वाले रंगरूिों या वहााँ के देिी व्यद्धियों की 'संकायाध्यक्ष' और 'डाक्िर' के रूप में द्धनयद्धु ि करना इस देि के द्धलए द्धहतकारी हैं ऐसा साद्धबत नही होता हैं।" द्धनवेदन में आगे उन्होनें बहुत गम्भीर बात पर अपने द्धवचार और सझु ाव द्धदए हैं जो उस समय द्धिद्धिि िासन में हो रहे अन्याय और िाम्हण के काया-कतात्ु व को स्पष्ट करनेवाले थे। वे द्धनवेदन में कहते हैं द्धक उच्च वगों की सरकारी द्धिक्षा पध्दद्धत की प्रवृद्धत्त इस बात से द्धदखाई देती हैं द्धक सरकारी वररष्ठ पदों पर इन िाम्हण का वचास्व स्थाद्धपत हो चक ु ा हैं। सरकार यद्धद जनता का सचमचु ही कल्याण करना चाहती हैं, तो इन दोर्ो का द्धनवारण करना सरकार का प्रथम कताव्य हैं और द्धनचली जाद्धत के थोडे-थोडे लोगों की द्धनयद्धु ि करके द्धदन-ब-द्धदन बढ़ रहे िाम्हणों के वचास्व को सीद्धमत द्धकया जाना चाद्धहए। कुछ लोग कहते की यह इस पररद्धस्थती में सम्भव नही हैं इस पर हम यह जवाब देते हैं द्धक सरकार ने यद्धद उच्च द्धिक्षा पर कम ध्यान द्धदया और जनता की प्राथद्धमक द्धिक्षा पर अद्धधक ध्यान द्धदया तो नीद्धत और बतााव से लोग पढ़-द्धलखकर अपना जीवन सफल कर सकतेह।ैं महात्मा ज्योतिरावफुलेका तशक्षा तवकल्प प्रतिमान हिं र आयोग में फुले महोदय ने के वल भारतीय द्धिक्षा की तत्काद्धलन द्धस्थद्धत का द्धववरण ही नहीं बद्धल्क वंद्धचत,पीद्धडत, दद्धलत द्धिक्षा की दिा और द्धदिा का वणान भी द्धकया हैं।फुले महोदय ने वंद्धचत, पीद्धडत और दद्धलत के िैद्धक्षक द्धवकास हेतु द्धिक्षा का जो प्रद्धतमान द्धदया वह द्धिक्षा प्रद्धतमान वतामान में भी इस समाज के द्धवकास में उतना ही लाभदायक तथा अत्याआवश्यक हैं। इस प्रद्धतमान में फुले महोदय ने प्राथद्धमक द्धिक्षा, माध्यद्धमक द्धिक्षा, उच्च द्धिक्षा, ग्रामीण द्धिक्षा, छात्र वृद्धत, द्धिक्षक के वेतन तथा प्रद्धिक्षण और द्धवद्यालय की देखभाल तथा प्रबंधन आद्धद सम्बन्धी तत्कालीन द्धस्थद्धत का द्धववरण और सधु ार हेतु सझु ाव देकर वद्धं चत, पीद्धडत और दद्धलत के िैद्धक्षक द्धवकास में महत्वपणू ा योगदान द्धदया था। प्राथद्धमक द्धिक्षा -अपने प्रस्ततु द्धनवेदन में फुलेमहोदय प्राथद्धमक द्धिक्षा के बारे में द्धवचार रखते हैं, द्धक "मम्ु बईक्षेत्र मे प्राथद्धमक द्धिक्षा की उपेक्षा हुई हैं। सरकार द्धिक्षा के द्धलए जो कर वसल ू करती हैं वह रुपये द्धिक्षा पर खचा नही कर रही। इस प्रान्त के अनेक गााँवों में लगभग 10 लाख बच्चों के द्धलए प्राथद्धमक द्धिक्षा की कोई सद्धु वधा उपब्लध नही हैं। द्धिक्षा का अभाव ही उनकी दररद्रता, स्वावलम्बन का अभाव और द्धिद्धक्षत तथा बुिीमान लोगों पर द्धनभार रहने की उनकी आदत का कारण हैं।अपनी राय में आगे उन्होंने कहााँद्धक, प्राथद्धमक द्धिक्षा कुछ हद तक अद्धनवाया की Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12660
जाए। कम से कम 12 वर्ा की उम्र तक अद्धनवाया होनी चाद्धहए। छोिी जाद्धतयों के लोगों को जातीयता के कारण द्धवद्यालयों में अलग रखा जाता हैं इसद्धलए उनके द्धलए सरकार ने अलग से द्धवद्यालय खोलने चद्धहए।महार, मांग,चांभार आद्धद छोिी जाद्धत के लोगों की जहााँ अद्धधक बस्ती हैं वहााँ उनके द्धलए अलग से द्धवद्यालय खोलने चाद्धहए। द्धिक्षा की इस गंभीर द्धस्थद्धत में सरकारी द्धवद्यालयों से प्राथद्धमक द्धिक्षा दी जाए क्योंकी गरीब द्धवद्याद्धथायों के द्धलए कोई खदु के दाद्धयत्व पर स्कूल नही खोलेंगे। द्धवद्याद्धथायों को यह द्धिक्षा भद्धवष्य मे उद्धचत और व्यावहारोपयोगी साद्धबत होनी चद्धहए।पाठ्यक्म और द्धिक्षा प्रणाली में परु ी तरह से सधु ार द्धकया जाना चद्धहए। (नरके ,एच१९९३) माध्यतमक तशक्षा -माध्यद्धमकद्धवद्यालय के बारे में फुलेअपने द्धवचाररखते हैंद्धक, देि का द्धहत जानने वाली कोई भी सरकारी माध्यद्धमक द्धवद्यालयों का अनदु ान बन्द करे ऐसा आज की पररद्धस्थती में मै नही कहुगं ा क्योंद्धक ऐसा करना द्धिक्षा प्रसार-प्रचार के द्धलए द्धहतप्रद नही होंगा।द्धिक्षक और द्धवद्याथी मैद्धरक की परीक्षा में बेवजह रुद्धच लेते हैं। इस पाठ्यक्म में व्यावहाररक ज्ञान नही होता हैं। द्धवद्याथी को अपने जीवन मे समथा बनाने की योग्यता माध्यद्धमक द्धिक्षा में होनी चद्धहए। ज्ञानप्रसार की सीमा को देखते हुए प्रवेि परीक्षा में बैठने वाले द्धवद्याद्धथायों की संख्या न के बराबर हैं । द्धफर भी सरकारी नौकरी की आवश्यकता को देखते हुए यह संख्या अद्धधक कही जा सकती हैं। द्धिक्षा ग्रहण करना सभी के वि में होता तो यह संख्या और भी अद्धधक होती। उच्च तशक्षा -फुले महोदय ने अपने सझु ाव में उच्च द्धिक्षा के बारे कहा हैं ,द्धक "उच्च द्धिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार हो की उच्च द्धिक्षा को सभी लोग सहजता से ग्रहण कर सके । मैद्धरक परीक्षा के द्धलए मान्य द्धवर्यों की द्धकताबे द्धजस प्रकार मद्रास और बंगालके सरकारी राजपत्र में प्रकाद्धित होतीहैं, उसी प्रकार मम्ु बई सरकार भी अपने राजपत्र में प्रकाद्धित करे । ऐसा करनेसे द्धनजी द्धवद्यालयों कोप्रोत्साहन द्धमलेंगा और ज्ञान प्रसार की दृष्टी से अद्धधक सहायता होंगी।" मम्ु बई द्धवश्वद्धवद्यालय द्धनजी तौर पर द्धिक्षा देनेवाले द्धवद्याद्धथायों को परीक्षा में बैठनेकी अनमु द्धत देता हैं तो यह लोगों के द्धलए एक वरदान होगा। बी.ए, एम.ए. की उपाद्धध हेतू द्धनजी तौर पर की गई पढ़ाई को द्धवद्यालय यद्धद मान्यता देता हैं तो कई यवु ा द्धवद्याथी द्धनजी तौर पर पढाई परू ी कर द्धिक्षा का लाभ हर समय उठा सकता हैं। ग्रामीि तशक्षा -ग्रामीण द्धिक्षा के बारे में प्रस्तुत द्धवचार फुले महोदय रखते हैं ,द्धक "ग्रामीण लोगों को ग्रामीण पररवेि का ज्ञान हो, इन लोगों को ग्रामीण व्यापार-व्यवहार का ज्ञान हो। ग्रामीण लोगों का मख्ु य व्यवसाय कृ द्धर् हैं इसद्धलए संबद्धधत प्राथद्धमक ज्ञान हो।मेरा द्धवचार हैं, द्धक ग्रामीण क्षेत्रों में मोडी और नागरी द्धलद्धप में पठन-पाठन हो। Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12661
लेखा, इद्धतहास, भगू ोल औरव्याकरण का साधारण ज्ञान हो। ग्रामीण लोगों के द्धलए नैद्धतक उत्थान के आदिा पाठ और स्वास्थ द्धिक्षा के पाठ आद्धद का समावेि पाठ्यक्म में हो। द्धिक्षा और दैद्धनक जीवन के आपसी मेल-द्धमलाप योग्य द्धिक्षा होनी चाद्धहए ।उनकी प्राथद्धमक द्धिक्षा मातृभार्ा में हो। खेतीसे सम्बद्धन्धत एक आदिा योजना बनानी चद्धहए। पस्ु तकों के पाठ्यक्म का द्धनरीक्षण कर, उनमे सधु ार कर, उन्हे जीवनोपयोगी और व्यवहार परक बनाना चद्धहए।" छात्र वृद्धत्त -ज्योद्धतराव द्धनवेदन में छात्र वृद्धत्त के बारे में सझु ाव देते हैं, द्धक "छात्र वृद्धत्तकुछ इस प्रकार दी जाए की द्धजस वगा में द्धिक्षा की प्रगद्धत नही हुई हैं, उस वगा के बच्चों को कुछ छात्रवृद्धत्तयााँ द्धमले। छात्र वृद्धत्त के द्धलए होड लगाकर छात्र वृद्धत्त देने की पध्दद्धत योग्य होने पर भी यह द्धनम्न वगा के द्धिक्षा प्रसार में सहाय नही होगी।" तशक्षक के वेिन और प्रतशक्षि - द्धिक्षक के वेतन और प्रद्धिक्षण के बारे में फुलेद्धनवेदन में कहते हैं, द्धक "प्राथद्धमक द्धवद्यालयों में द्धनयि ु द्धिक्षक अद्धधकतर िाम्हण जाद्धत से हैं।उसमें से कुछ द्धिक्षक 'सामान्य द्धिक्षक द्धवद्यालय' से उत्तीणा हैं।कुछ द्धिक्षकअप्रद्धिद्धक्षत हैं।नगर्णय वेतन के अनसु ार उनका काया भी अपयााप्त और असंन्तोर्जनक हैं। इसद्धलए मेरी राय हैं,द्धक प्राथद्धमक द्धवद्यालयों के द्धिक्षक अध्यापक पात्रता परीक्षा उत्तीणा द्धकए होऔर अद्धधकतर द्धकसान वगा से हों ताद्धक यह द्धिक्षक उन गरीब बच्चों की आवश्यकताओ ं को, भावनाओ ं को अद्धधक अच्छे से समझ सके ।उनके साथ सहजता से व्यवहार कर सके । पाठ्यक्म में सामान्य द्धवर्यों के साथ-साथ खेती, कला और स्वास्थ सम्बंधी पाठ्यक्म हो।अच्छे द्धिक्षक तैयार करने के द्धलए उन्हे अद्धधक वेतन द्धदए जाए और उनके आद्धथाक द्धस्थद्धत में सधु ार द्धकए जाए।उनका वेतन 12 रुपये से कम न हो और बडे िहरों में १५ रुपये से कम न हो। द्धहसाब-द्धकताब का भी काम उन्हे द्धदया जाये या कस्बों के द्धिक्षकों की बजाय द्धजस द्धवद्यालय के अद्धधक द्धवद्याथी उत्तीणा होंगे उन द्धिक्षकों को प्रोत्साहन के रूप में माद्धसक वेतन के अलावा कुछ द्धविेर् वेतन भी द्धदए जाए ।" द्धवद्यालय की देखभाल तथा प्रबंधन :"उप द्धिक्षा द्धनरीक्षक द्धवद्यालय में वर्ा में एक ही द्धनरीक्षण करता हैं । इस द्धनरीक्षण से द्धविेर् लाभ नही होता हैं । ग्रामीण क्षेत्रों के द्धवद्यालयों का द्धनरीक्षण वर्ा में कम से कम चार बार या उससे भी अद्धधक बार द्धकया जाना चद्धहए। द्धवद्यालय के द्धनरीक्षण की पवू ा सचू ना द्धिक्षकों को न देते हुए अचानक द्धनरीक्षण करना उपयोगी साद्धबत होगा। उनके द्वारा द्धकया गया द्धनरीक्षण अद्धधकतर औपचाररक और अपयााप्त होता हैं "। Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
महात्मा फुले का सामातिक तशक्षा मे योगदान १ ८८२ भें बायत की शिऺा सम्फन्धी सभस्माओं औय उनके सुधाय हे तू सझ ु ाव के शरए ववशरमभ हं टय ब्रिटटि अधधकायी की अध्मऺता भें आमोग का गठन जजसभें पुरे ने अऩने ननवेदन भें अऩने ववचाय प्रस्तुत ककए| महात्मा फुिे का लिक्षा लिकल्प प्रलिमान
प्राथडमक ग्रामीण माध्यडमक उच्ि छात्र डशक्षक डशक्षा डवद्यालय डशक्षा डशक्षा डशक्षा डशक्षा वृडत्त वेतन पर का एवं खिाा स्वरूप प्रडशक्षण
१ २ वर्ष की उम्र तक प्राथशभक शिऺा अननवामष ग्राभीण शिऺा भें कृर्ी शिऺा को अग्रक्रभ,व्माऩाय-व्मवहाय का ऻान हो| ननयीऺण वर्ष भे चाय फाय हो| ववद्माथी को जीवन भे सभथष
प्रशिऺण
फनाने वारा ऩाठ्मक्रभ हो | उद्देि केवरऩयीऺा ऩास कयना नही |
उच्च शिऺा छात्र ननजी तौय ऩय ऩा सके | उसके शरए
नही
शरए ववद्मारम ने भान्मतादे नी चटहए|
जजस वगष भे शिऺा की प्रगनत नही हो यही उन्हे छात्र वजृ तत हो|
साभान्मशि ऺक ववद्मारम
Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
12662
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12663
तनष्कषष : 1.
महात्मा फुले के समय की दद्धलत, पीद्धडत, िोद्धर्त और स्त्रीवगा की सामाद्धजक अत्यंत दयनीय थी
। भारतीय जनता मे एकता का प्रभत्ु व द्धिद्धििों के द्धलए भयावह था इसद्धलए िाहमण-अिाहमण तथा उच्चवगा और दद्धलत वगा के भेदों का दरुु पयोग द्धकया गया । द्धिद्धिि िासन के आगमन तक भारतीय समाज को द्धवद्धभन्न कुरीद्धतयों ने जकड् रखा था । सतीप्रथा, कन्यावध जैसी भीर्ण एवं बाल द्धववाह जैसी घातक और अस्पृश्यता तथा जाद्धतभेद जैसी हाद्धनकारक कुरीद्धतयों ने देि को पतन के गता में धके ल रखा था 2.
महात्मा फुले के समय की राजकीय द्धस्थद्धत भारतमेंअग्रं ेजोंसेपहलेग्रामसस्ं था, जातीसस्ं था,
औरपररवारकाप्रचलनयहीगावके जीवनकीआधारिीलाथी।
महाराष्र
द्धिवाजीद्वाराबडेयत्नऔरपररश्रमपवू ाकस्थाद्धपतस्वत्रतमराठाराज्यकोइनपेिवाओनं ेअपनीमहत्वाकाक्ष ं ा
में और
स्वाथापरता, जाद्धतवाद, छुंआछुंत, उच्च -नीच, पारस्पाररक वैमनस्य, कें द्धद्रय सत्ता का अभाव और िाह्मण धमा में पाखर्णड के वचास्व के कारण हमेिा-हमेिा के द्धलए खो द्धदया और अंग्रेजी िासन का गुलाम बना द्धदया। 3.
महात्मा फुले के समय की आद्धथाक द्धकसान खेती करते थे और अपनी उपज का एक भाग
राजस्व के रूप में िासक को देते थे । िासक ग्राम प्रधान के माध्यम से वसल ु ी करते थे । अंग्रेजों ने अपने िासन मे अपने अद्धधकारीयों और भारतीयों एजेंन्िों के द्धनयंत्रण में परु ानी व्यवस्था को जारी रखा । परन्तु यह भारतीय एजेंि उच्च वगा के थे । यह द्धकसानों को कष्ट देने लगे । राजस्व द्धनद्धित रािी के रूप में वसल ू द्धकया जाने लगा, द्धफर उपन्न चाहे जो भी हो । राजस्व की वसल ु ी मद्रु ा के रूप में होने लगी इसद्धलए द्धकसान ऐसी फसलें उगाने के द्धलए मजबूर हुए द्धजन्हे बाजार में बेचा जा सके । माद्धिनों द्वारा बनाये कपडे और अन्य उत्पाद्धदत वस्तूओ ं के कारण स्थानीय दस्तकारों के धन्दे भी चौपि हो गए थे। 4.
महात्मा फुले के सामाद्धजक क्ाद्धं त में सामाद्धजक द्धिक्षाका द्धवकल्प प्रद्धतमानमहात्मा फुले के
सामाद्धजक क्ाद्धं त मे सामाद्धजक द्धिक्षा का काया इसप्रकार फुले महोदय ने प्राथद्धमक द्धिक्षा, माध्यद्धमक द्धिक्षा, उच्च द्धिक्षा, ग्रामीण द्धिक्षा, छात्र वृद्धत, द्धिक्षक के वेतन तथा प्रद्धिक्षण और द्धवद्यालय की देखभाल तथा प्रबंधन आद्धद सम्बन्धी तत्कालीन द्धस्थद्धत का द्धववरण और सधु ार हेतु सझु ाव देकर वंद्धचत, पीद्धडत और दद्धलत के िैद्धक्षक द्धवकास मं महत्वपणू ा योगदान द्धदया था।
Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
5.
12664
महात्मा फुले की सामाद्धजक द्धिक्षा ज्योतीराव ने आजीवन िदु -अद्धतिद्रू के अद्धधकारों के द्धलए
संघर्ा द्धकया, वह के वल द्धकसी वगा द्धविेर् के द्धलए नही था बल्की सामाद्धजक तथा आद्धथाक समानता पर आधाररत िोर्ण-रद्धहत समाज बनाने के द्धलए था । आज जो राजनैद्धतक दल सामाद्धजक समानता की बात करते हें, परन्तु उनका उनका प्रयास के वल राजसत्ता हद्धथयाना है पर फुले की सामाद्धजक क्ांद्धत समाज मे सधु ार करना थी और यह आज भी प्रांसंद्धगक है । वतामान सन्दभा में वंद्धचत ,दद्धलत और स्त्री द्धिक्षा की नींव अगर द्धकसी ने रखी है तो ज्योद्धतबा फुले का एक सामाद्धजक द्धिक्षा का प्रद्धतमान सामने आता है । तत्काद्धलन समाज मे स्त्री और िद्रू को मानव होने के अद्धधकार से नकारा था । ज्योतीराव ने आजीवन इनके अद्धधकारों के द्धलए जो सघं र्ा द्धकया वह के वल द्धकसी वगा द्धविेर् के द्धलए नही था बद्धल्क सामाद्धजक तथा आद्धथाक समानता पर आधाररत िोर्ण रद्धहत समाज बनाने के द्धलए था । आज द्धवद्धभन्न पक्ष के राजनेता एवं सभी राजनैद्धतक दल सामाद्धजक समानता की बात करते है पर उनका प्रयास सत्ता के द्धलए है । पर द्धजन दद्धलत वगों को द्धिद्धक्षत बनाने के द्धलए ज्योतीराव आजीवन झगडते रहे , वही द्धिद्धक्षत होकार उनको पराद्धजत कर रहे हैं।ज्योद्धतराव ने हिं र आयोग को प्रस्तुत द्धकये गये द्धनवेदन में अद्धनवाया प्राथद्धमक द्धिक्षा, नारी द्धिक्षा, व्यावसाद्धयक द्धिक्षा पर बल द्धदया । अध्यापक प्रद्धिद्धक्षत हो और वे द्धकसान वगा से हो, उनके वेतन अच्छे हो आद्धद बाते आज भी प्रासंद्धगक है
तत्कालीनद्धिक्षा-व्यवस्था
परअपने प्रस्तुत द्धवचार में ज्योतीराव ने कहा था की, वतामान द्धिक्षा प्रणाली के वल द्धलद्धपक और अध्यापक बनाने की फै क्िी है । आज भी डेढ िताब्दी बीत जाने पर भी द्धिक्षा के इस रूप में द्धकसी भी तरह का पररवरत् न नही आया है । उपसहं ार :ज्योद्धतराव अपने समय से बहुत आगे थे । इसका पता इसी बात से चलता है की, उनके उस समय के सझु ाव और द्धवचार आज भी प्रासद्धं गक है। उनका परु ा जीवन धमाभेद, वणाभेद और द्धलगं भेद के द्धखलाफ एक महान द्धवद्रोह था । सत्य की खोज उनके जीवन का लक्ष्य था । उनके द्धवचार और आचार में द्धकसी भी प्रकार का अन्तर नही था । महात्मा फुलेसन 19 वीं सद्धद के महान समाज सधु ारक और द्धिक्षा के जनक रहे। कमाकाडं पर उन्होनें प्रहार द्धकया। धमाग्रथं का द्धनमााण ईश्वर ने नही द्धकया।जन्म से कोई नीच-उच्च हैं इस बात का खडं न द्धकया। ईश्वर को द्धनद्धभाक कहते हुए सारे मानव समान हैं इस द्धसिांत पर वे अिल रहे।महात्मा फुले के द्धिक्षा द्धवकल्प प्रद्धतमान ने तत्काद्धलन वंद्धचत, पीद्धडत और दद्धलत के िैद्धक्षक द्धवकास में महत्वपणू ा भद्धू मका रखी हैं। वत्तामान में भारतीय द्धिक्षा व्यवस्था ने वंद्धचत, पीद्धडत, दद्धलत के िैद्धक्षक द्धवकास को लेकर अद्धधक प्रयास द्धकए पर उतनी सफलता नहीं द्धमल Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12665
पायी। इस समाज का गुणात्मक स्तर बढ़ाना द्धिक्षा व्यवस्था के द्धलए चनु ौद्धत हैं । आद्धथाक द्धवकास हेतू ग्रामीण क्षेत्र में कृ द्धर् द्धिक्षा तथा िहरी क्षेत्र मे व्यवसाय परक द्धिक्षा और सद्धु वधा प्रदान करने के कडे द्धनयम पारदिी एवं सही द्धक्यान्वयन की आवश्कता हैं। प्रद्धतद्धदन द्धमद्धडया से प्राप्त खबरों में वंद्धचत,दद्धलत के अन्याय और अत्याचार को लेकर एक खबर जरुर होती हैं।अथाात आज भी यह वगा सरु द्धक्षत हैं इसका प्रमाण देना असम्भव हैं । क्या इसके द्धलए देि ने इस समाज को द्धदया दजाा या द्धिक्षा अभी भी अधरू ी हैं इसका द्धचंतन करना महात्मा फुले के दृष्टी से आज भी प्रासद्धं गक हैं। आज ग्रामीण मद्धहलाओ ं के द्धिक्षा के द्धवकास मे कोई प्रगद्धत नही द्धदखाई देती हैं। हमारी सरकार द्धिक्षा पर प्रद्धतवर्ा करोडों रुपये खचा कर रही हैं, द्धफर भी देि की अद्धधकतर जनता अद्धिद्धक्षत हैं,इसका मल ु कारण हमारे देि के ग्रामीण और िहरी गरीब पररवार की आद्धथाक द्धस्थद्धत हैं ।अपने द्धनवेदन में अद्धनवाया प्राथद्धमक द्धिक्षा, नारी द्धिक्षा, व्यावसाद्धयक द्धिक्षा, ग्रामीण क्षेत्र मे कृ र्ी द्धिक्षा और िहरी क्षेत्र मे व्यवसाय परक द्धिक्षा आद्धद सभी सझु ाव ने उस समय समाज में क्ांद्धत लायी थी और यह सझु ाव आज भी उतने ही महत्वपणू ा और प्रासंद्धगक हैं। सदं भष सातहत्य ग्रन्ि सच ू ी: शसरसिाल डी.राज,(२०१३),, “महात्मा ज्योशबता फुले : आधशु नक भारतीय दाशाशनक ” ओमिेदत्त,गेल : (२०१४).“ज्योशतराि फुले और भारतीय क्ाांशत के आदशा ” (२०१४)। जगताप,म.ु (१९९३).यगु परुु र्ष महात्मा फुले.मम्ु बई:महात्मा फुले चररत्र साधने प्रकाशन सशमशत महाराष्ट्र शासन। शिमलकीती,डी.(२००५).महात्मा फुले का समग्र साशहत्य ,पिु े : महाराष्ट्र प्रकाशन । मेश्राम,एल .जी .(सांपा)(२००२).महात्माज्योशतबा फुले रचनािली, शदल्ली : राधाकृ ष्ट्ि प्रकाशन । कीर,डी.(२०१२).महात्मा ज्योशतराि फुले,मम्ु बई : पाप्यल ु र प्रकाशन । नरके ,एच.(सांपा).(१९९३).महात्मा फुले साशहत्य और शिचार,मांबु ई:महात्मा फुले चररत्र साधने प्रकाशन सशमशत शसांन्हा,िी.एम.् (२००९).आधशु नक भारत का इशतहास,नईशदल्ली :ज्ञान प्रकाशन । शहा,एम.बी.(१९९२).भारतीय समाज क्ाांशत के जनक महात्मा ज्योशतबा फुले,शदल्ली : राधाकुष्ट्ि प्रकाशन । शिद्रोही,एम आर.(१९८९).दशलत दस्तािेज, नईशदल्ली : सम्यक प्रकाशन । अिथरे ,पी.(सांपा).(२०१३).समग्र िाड:मय ,महात्मा फुले,औरांगाबाद साशहत्य प्रकाशन । जगताप,म.ु (१९९३). यगु परुु र्ष महात्मा फुले,मम्ु बई : महात्मा फुलेचररत्र प्रकाशन सशमशत । पाण्डे,पी.(सांपा) जोशी.एल,(२००६).ज्योशत चररत्र,नईशदल्ली : नयाशािाल बुक रस्ट प्रकाशन सशमशत। नरके ,एच.फडके ,(सपां ा).(१९९१).महात्मा फुले गौरि ग्रन्थ,मम्ु बई : महाराष्ट्र राज्य शशक्षि शिभाग । जोशी,ए. (१९६९). महाराष्ट्र के समाज सधु ारक,पिु े : महाराष्ट्र राष्ट्रभार्षा सभा । Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
कशिता ना. खोब्रागडे (Pg. 12641-12666)
12666
शिमलकीती. (१९९४). महात्मा ज्योशतबा फुले रचनािली, नई शदल्ली : राधाकुष्ट्ि प्रकाशन । कुमार,प्रभात.(२००७).समाज सधु ार में ज्योशतबा फुले का योगदान.जोधपरु :राजस्थानी साशहत्य सांस्थान । शमाा,एस.(2014).शशक्षि और अशधगम की सृजनात्मक पद्धशतयाां. नईशदल्ली: एन.सी.ई.आर.टी । अग्रिाल,जे.सी.(2002). स्कूल प्रबन्ध, सचू ना एिांसम्प्प्रर्षेि तकनीकी. आगरा :सन्िाल पशललके शन। चांचरीक,के .(२०००).महात्मा ज्योशतबा फुले, नईशदल्ली: प्रकाशन शिभाग और सचू ना प्रसारि मांत्रालय भारत सरकार । शमाा,आर.ए.(2000). भारतीय शशक्षा प्रिाली का शिकास.मेरठ : आर. लाल बुक डेपो । मराठी पस्ु िके ठोंबरे ,शि.(१९९१).महात्मा फुले याांचे काया,मांबु ई :लोकिाङ् मय गृह । गेल,आ.(१९९०). ज्योशतबा फुले याांचा स्त्री-मक्त ु ीच शिचार,मम्ु बई :लोक िाड:मय । खैरे,एस.चाांदिे.ए.(सांपा).(२०१५).समतेचे शनशमाक महात्मा फुले,समग्र िाड:मय खांड प्रथम.पिु े:प्रशममा प्रकाशन। शगली,एस .(२००५).महात्मा ज्योशतबा फुले याांचे सािाजाशनक सत्यधमा .िधाा:सधु ीर प्रकाशन । link:
http:mesesain.wordpress.com/2013/2014mahatmajyotibaphule-a-mordernIndian-philosopherby-dr.desh-raj-sirswal।
Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies