Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2021 = 7.380, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFEREED JOURNAL, NOV-DEC, 2021, VOL- 9/68 अधिगम में चाक्षुष प्रत्यक्षण मृदुल कुमार ध िंह, Ph. D.
असिस्टें ट प्रोफेिर, हं सिया पी.जी. कॉलेज, प्रयागराज
Paper Received On: 21 DEC 2021 Peer Reviewed On: 31 DEC 2021 Published On: 1 JAN 2022 Abstract िीखना या असिगम (जममन, अंग्रेजी: learning) एक व्यापक ितत् एवं जीवन पयम न्त चलनेवाली महत्वपूर्म प्रसिया है । मनुष्य जन्म के उपरां त ही िीखना प्रारं भ कर दे ता है और जीवन भर कुछ न कुछ िीखता रहता है । िीरे -िीरे वह अपने को वातावरर् िे िमायोसजत करने का प्रयत्न करता है । इि िमायोजन के दौरान वह अपने अनुभवों िे असिक लाभ उठाने का प्रयाि करता है । इि प्रसिया को मनोसवज्ञान में िीखना कहते हैं । सजि व्यक्ति में िीखने की सजतनी असिक शक्ति होती है , उतना ही उिके जीवन का सवकाि होता है । िीखने की प्रसिया में व्यक्ति अनेक सियाऐं एवं उपसियाऐं करता है । अतः िीखना सकिी क्तथिसत के प्रसत िसिय प्रसतसिया है ।मनुष्य अपने जीवन काल में सनत्य ही कुछ ना कुछ िीखता रहता है । िीखने को असिगम भी कहा जाता है । िीखने की प्रसिया में व्यवहारों में पररवतम न आ जाता है । सलण्डग्रे न के अनुिार िीखने की प्रसिया ऐिी प्रसिया है । सजिमें सशक्षािी अपने व्यवहारों में पररवतम न लाकर नये -नये िं प्रत्ययों को िीखते हैं तिा अपने सचंतन प्रसिया को पुनमिंगसठत करते हैं , परं तु वास्तसवकता यह है सक सशक्षािी िीखते िमय जो भी प्रसियाएं करते हैं उिे िीखने की प्रसिया कहा जाता है । इन प्रसियाओं में कुछ का हम अवलोकन कर िकते हैं जैिे सलखना व बातचीत करना। वहीं दू िरी ओर कुछ प्रसियाएं अवलोकन योग्य न होते हुए भी महत्वपूर्म होती हैं जैिे सचंतन, प्रत्यक्षर्, स्मृसत तिा सवस्मृसत आसद। िीखने की इन प्रसियाओं में असिगमकताम द्वारा अमूतम िम्प्रत्ययों का िं बंि अपने दै सनक जीवन में घसटत होने वाली घटनाओं िे जोड़ दे ने पर िािमक ढं ग िे िीख पाते हैं । प्रस्तु त शोि पत्र में असिगम एवं चाक्षु ष प्रत्यक्षर् की सवस्तृ त व्याख्या की गयी है । मु ख्य शब्द: चाक्षु ष, प्रत्यक्षर्, प्रेक्षर्, प्रसतरूपर्
Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com प्रे क्षणात्मक (ऑब्ज़रवे शनल) अधिगम प्रधिरूपण प्रेक्षर् द्वारा िीखना तृतीय मुख्य सवसि है सजिके द्वारा हम िीख िकते हैं । दू िरों के व्यवहार को दे खकर उनके कौशलों को अपना ले ना बहुत ही िामान्य बात है । यह सदन-प्रसतसदन के जीवन का एक सहस्सा है । प्रेक्षर् द्वारा िीखना सकिी सवसशष्ट वातावरर् में उपयुि आदशम के सवद्यमान रहने पर सनभम र करता है । बालक ऐिे व्यक्ति को सजिे वह अपना आदशम मानता है , कोई कायम करते दे खता है तो वह उि व्यवहार को अपने में िमासहत कर ले ता है। उदाहरर् के सलये नवयुवक दू िरों (अपने आदशम ) के आिामक व्यवहार को दे खकर फौरन ही वह व्यवहार िीख जाते हैं । जब बच्चे टी.वी. में सहं िा की घटना दे खते हैं तो वह भी उि व्यवहार को िीखने का प्रयाि करते हैं । यद्यसप प्रेक्षर् सवसि अनु करर् सवसि िे कहीं ज्यादा जसटल सवसि है । बच्चे इि सवसि द्वारा
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(Pg. 16279-16283) िूचनाओं और सवसभन्न कौशलों को िीख तो जाते हैं परन्तु उिका प्रयोग नहीं कर पाते हैं । मनु ष्य, सवशे ष तौर पर युवक ज्यादातर िकारात्मक सवसि िे प्रभासवत सकये जा िकते हैं अगर उनके आदशम उपयुि हों। वाधचक अथवा शाब्दब्दक
ीखना
आप इि पाठ को पढ़ कर िीखने की अविारर्ा को िमझने का प्रयाि कर रहे हैं , यह वासचक िीखने द्वारा ही िम्भव हो पा रहा है। आपने भाषा िीखी हुई है। िंिार के सवसभन्न भागों में लोग सवसभन्न भाषाओं को िीखते हैं । भाषा को िीखने की प्रसिया को शाक्तिक या वासचक िीखना कहा जाता है । जब आप अपनी बाल्यावथिा को याद करते हैं तो आप पाते हैं सक आपने भाषा िीखने की शुरूआत अक्षरों को पहचानने िे की िी। सफर शि िीखे और उिके बाद वाक्य। जब आप सवदे शी भाषा िीखते हैं तो आप युगल शिों का प्रयो ग करते हैं । मनोवैज्ञासनकों के अध्ययन का सवषय है सक िसमक िीखने और युक्तित िहचर िीखने में सकन सवसियों का प्रयोग सकया जाता है । िंप्रत्ययों को िीखना- िंप्रत्ययों को िीखना घटनाओं और वस्तु ओं की श्रे सर्यों को सवकसित करने के िम्बन्ध में है । यह हमारे जीवन के सलये बहुत महत्वपूर्म है सक हम वस्तु ओं के मध्य सकिी किौटी के आिार पर अन्तर करें । उदाहरर्ािम बालक, बासलका, फल और फनीचर िंप्रत्यय की श्रे र्ी में आते हैं । िंप्रत्यय के अन्तगमत एक िाि बहुत िी वस्तु एँ आतीं हैं । सवसभन्न प्रकार की श्रे सर्यों का प्रयोग अिवा वगों के नाम हमें िंप्रेषर् और सवसभन्न कायमकलाप करने में मदद करते हैं । िंप्रत्यय प्राकृसतक अिवा कृसत्रम हो िकते हैं । वे मू तम या अमू तम हो िकते हैं । स्वतंत्रता, प्रेम और लोकतंत्र अमू तम िंप्रत्यय के उदाहरर् हैं । गाय, मे ज, बालक, बासलका, िन्तरा तिा गुलाब आसद मू तम िंप्रत्यय के उदाहरर् हैं । सकिी सवचार को िीखते िमय हम िभी प्रकार की उत्ते जना के सलये एक ही तरह की अनु सिया करते हैं । सकिी िंप्रत्यय को िीखते िमय हम सकिी सवसशष्ट श्रे र्ी के सवसभन्न उद्दीपनों के सलये एक ही तरह की अनु सिया करते हैं । इि प्रकार हम िभी प्रकार की मे जों के सलये मात्र मेज शि अिवा िब प्रकार के बालकों के सलये मात्र बालक शि का प्रयोग करते हैं । वस्तु तः िभी प्रकार का उच्च श्रे र्ी का िीखना आवश्यक रूप िे िंप्रत्यय िीखने को िमासहत करता है । िंप्रत्यय सवश्व की जसटलताओं को कम करने में मदद करते हैं । कौशल िं का
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िीखने का एक महत्वपूर्म क्षे त्र अपने में सवसभन्न प्रकार के कौशलों के उपाजम न को िमासहत करता है जैिे - िाइसकल चलाना, लेखन, कार चलाना, हवाई जहाज चलाना, िमू ह का ने तृत्व करना, दू िरों को प्रोत्सासहत करना आसद। इन िभी कायो के सलये हमें कौशल की आवश्यकता पड़ती है । वे लोग जो इि प्रकार के कौशलों को िीखने के योग्य हैं उनको जीवन में सवसभन्न अविर प्राप्त होते हैं । एक बार इन कौशलों का उपाजम न हो जाये तो वह उिमें और असिक वृक्ति कर िकते हैं । एक बार इन कौशलों को िीख जाने पर यह स्वचासलत हो जाते हैं और व्यक्ति इन्हें आराम और िुसविापूवमक कर िकता है । पररर्ामस्वरूप लोग कायम को स्वेच्छानु िार करते हैं और एक ही िमय में एक िे ज्यादा कायम कर िकते हैं । (उदाहरर्ािम - कार चलाते िमय लोगों िे बातें करना) Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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(Pg. 16279-16283) मिेल का किन है सक िीखना यां सत्रक कायम के बजाय सववेकपूर्म कायम है । उिी बात को शीघ्रता और िरलता िे िीखा जा िकता है , सजिमें बुक्ति या सववेक का प्रयोग सकया जाता है । सबना िोचे-िमझे, सकिी बात को िीखने में िफलता नहीं समलती है । मिेल के शिों में -"िीखने की अिफलताओं का कारर् िमझने की अिफलताएँ हैं ।" असभग्रहर् िीखना में सशक्षािी को िीखने वाली िामाग्री बोलकर या सलख कर दे दी जाती है और सशक्षािी उन िामसग्रयों को आत्मिािम कर ले ते हैं । दु भाम ग्यवश असिकतर सशक्षक यही िमझते हैं सक अभी ग्रहर् िीखना मात्र रटकर ही सिखा जा िकता है परं तु उिूबेल ने स्पष्ट कर सदया है सक यह रटकर भी हो िकता है तिा िमझकर भी हो िकता है अन्वे षर् िीखना वैिे िीखना को कहा जाता है सजिमें सशक्षािी को दी गई िामसग्रयों में िे नए िंप्रत्यय या कोई नया सनयम या सवचार की खोज कर उिे सिखाना होता है ।सशक्षािी सदए गए िामसग्रयों के िाहचयम शिशह तिा मनमाने ढं ग िे उिके आशय को सबना िमझे हुए िीखते हैं । सनरिम क पदों का िीखना, शिों के जोड़े को िीखना, इिी श्रे र्ी के िीखने का उदाहरर् है िीखना सशक्षा के सलए सवशेष महत्व रखता है । इिसलए सशक्षकों में सवशे ष तरह के िीखने पर असिक बल िाला जाता है अिम पूर्म िीखना ओवैिी िीखने को कहा जाता है सजिमें िीखने वाले िामग्री के िारतत्व को एक सनयम के अनु िार िमझ कर तो िा उिका िंबंि गत ज्ञान िे जोड़ते हुए सिखा जाता है सशक्षर्-असिगम को प्रभासवत करने वाले कारक (Factors Influencing Teaching-Learning Process) िीखना सशक्षर् द्वारा ही िम्पन्न होता, चाहे वह सशक्षर् प्रसिया िीखने वाले द्वारा अपनाई जाए या अध्यापक द्वारा। सशक्षर् का उद्दे श्य ही है ‘िीखना‘। सशक्षर् का अिम तभी िािम क होता है , जब कोई इि प्रसिया िे िीखता है । मनोवैज्ञासनकों ने असिगम को प्रभासवत करने वाले कारकों की भी खोज की है । ये कारक सनम्नसलक्तखत है 1.
बालक का शारीररक व मानसिक स्वास्थ्य (Physical and Mental Health of Children) प्रायः दे खा
जाता है सक शारीररक और मानसिक रूप िे स्वस्थ्य बालक िीखने में रुसच ले ता है । िकान का प्रभाव कम होने िे छात्र जल्दी िीखते हैं । शारीररक और मानसिक दृसष्ट िे सपछड़े बच्चे प्रायः पढ़ने सलखने में कमजोर रहते हैं और वे दे र िे िीखते हैं । 2.
पररवक्वता(Maturity) व्यक्ति की आयु बढ़ने के िाि-िाि उिकी पररपक्वता भी बढ़ती है । शारीररक एवं
मानसिक रूप िे पररपक्व होने पर िीखने की गसत बढ़ जाती है , सजििे िीखने का स्तर भी बढ़ जाता है । इिके सवपरीत यसद आयु एवं पररपक्वता के अनु रूप असिगम िामग्री नहीं है तो असिगम िामग्री ग्रहर् करने में कसठनाई होगी। 3.
िीखने की इच्छा (Will to learn) िीखना बहुत कुछ व्यक्ति की इच्छा पर सनभम र करता है सजि बात को
िीखने के सलए बच्चों में प्रबल इच्छा होती है , उिे िीखने उतना ही शीघ्र होता है। उनकी इच्छा के सवरूि उन्हें कुछ नहीं सिखाया जा िकता है । Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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प्रेरर्ा (Motivation)–िीखने के सलए बच्चों को प्रेररत करना अत्यंत आवश्यक है । इिसलए िमय-िमय
पर प्रशं िा, प्रोत्साहन तिा प्रसतयोसगता के आिार पर िीखना चासहए तो वे िुगमता िे िीख जाते है । 5.
सवषय िामग्री का स्वरूप (Nature of subject matter) प्रत्येक स्तर के छात्रों के सलए उनकी बुक्ति, रुसच
एवं असभक्षमता के अनु रूप पाठ्यवस्तु िरल, रोचक एवं अिम पूर्म होने पर छात्र उन्हें रुसचपूर्म एवं शीघ्रता िे िीखते है । कसठन, नीरि तिा अिम हीन सवषय-िामग्री बच्चे शीघ्रता िे नहीं िीख पाते हैं । 6.
वातावरर्(Environment) भौसतक एवं िामासजक वातावरर् दोनों ही सशक्षर् असिगम को प्रभासवत करते
हैं । शु ि वायु, उसचत प्रकाश, शान्त वातावरर् एवं मौिम की अनु कूलता के बीच बच्चे शीघ्र िीखते है । इिके अभाव में वे शीघ्र िक जाते हैं तिा असिगम प्रसिया बासित होती है । प्रस्तु त ले ख में हम प्रत्यक्षर् क्या है ? यह िमझने के सलए प्रत्यसक्षक प्रसियाओं के बारे में जानने का प्रयाि करते हैं । वातावरर् में घसटत होने वाली सवसभन्न घटनाओं को हम अपने ज्ञानें सियों के उद्दीपन के पररर्ाम स्वरूप सवसभन्न प्रकारों िे अनु भव करते हैं । यह प्रारं सभक अनु भव िंवेदना कहलाती है । िंवेदीतंत्र द्वारा प्राप्त इि प्रारं सभक िामग्री (िंवेदना) िे अिम प्राप्त करने के सलए इिका पुन: प्रिमर् करते हैं । सजिके कारर् हम अपने असिगम, स्मृसत, असभप्रेरर्ा, िंवेग तिा अन्य मनोवैज्ञासनक प्रसियाओं के उपयोग द्वारा उद्दीपकों को अिम वान बनाते हैं । इनमें हम ज्ञानें सियों द्वारा प्राप्त िूचनाओं की पहचान की जाती है , अिम वान बनाते हैं अिवा व्याख्या करते हैं । उिे हम प्रत्यक्षर् कहते हैं । प्रत्यक्षर् की प्रसिया को िंपन्न करने वाला प्रत्यक्षर्कताम कहलाता है । मनु ष्य प्रत्यक्षर्कताम के रूप में सनक्तिय या यां सत्रक नहीं होता बक्ति वह इिमें असभप्रेरर्ा, प्रत्याशा, िंज्ञानात्मक शैली तिा अपने अनु भवजन्य िां स्कृसतक पृष्ठभू सम का िमावेश करता है । प्रत्यक्षर् का एक भाग चाक्षु ष प्रत्यक्षर् है सजिमें की सवसभन्न प्रकार के भागों का िमु च्चय होता है । चाक्षुष प्रत्यक्षर् को हम आकृसतक प्रत्यक्षर् भी कहते हैं क्योंसक इिमें सवसभन्न आयाम, रं ग, सबंदु आसद िक्तिसलत होते हैं । चाक्षुष प्रत्यक्षर् में वातावरर् के िाि िनात्मक िहिंबंि पाया जाता है । उदाहरर् के सलए अलग-अलग वातावरर् में रहने वाले लोगों अलग-अलग प्रकार का चाक्षु ष प्रत्यक्षर् की प्रवृसत्त पायी जाती है । एक्तस्कमों नई एवं पुरानी बफम को दे खकर अन्तर बता िकता है । िहारा के लोग जे ब्रा के पैटनम का अन्तर बता िकते हैं , ग्रामीर् पररवेश के लोग क्षै सतज दू री का िही अनु मान लगा िकते हैं , जं गल में रहने वाले ऊंचाई का अनु मान लगाने में दक्ष होते हैं , िाइबेररया के लोग रे क्तण्डयर की त्वचा के रं गों में भे द कर िकते हैं आसद जै िे प्रमु ख उदाहरर् हैं । गेस्टाल्ट मनोवैज्ञासनकों ने अपने शोि सनष्कषों में पाया सक व्यक्ति सवसभन्न उद्दीपकों को सवभि अंशों में न दे खकर िमग्र के रूप में दे खते हैं । सजिके कारर् िे हमारी प्रमक्तस्तकीय प्रसियायें हमे शा अच्छी आकृसत या िौष्ठव का प्रत्यक्षर् करती है । चाक्षु ष प्रत्यक्षर् हमारे स्मृसत के सलए प्रसतमा सनमाम र् का कायम करता है यह प्रसतमा सनमाम र् कूट-िंकेत में भण्डाररत हो जाती हैं जो पररक्तथिसत आने पर प्रत्यास्मरर् होकर स्मृसत की प्रसिया पूर्म करती हैं । प्रत्यास्मरर् न होना सवस्मरर् है । चाक्षु ष प्रत्यक्षर् की इिी उपादे यता के कारर् ही पाठ्यिम में शै सक्षक भ्रमर् को थिान सदया गया है तासक सशक्षािी चाक्षुष प्रत्यक्षर् िे मू तम एवं अमू तम के मध्य तादात्य में थिासपत कर िकें। Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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(Pg. 16279-16283) चाक्षु ष प्रत्यक्षर् का एक महत्वपूर्म भाग भ्रम है । भ्रम वह क्तथिसत है सजिमें जो आकृसतक प्रत्यक्षर् हो रहा होता है परं तु वह वास्तव में ित्य नहीं होता है । प्रिमर् के द्वारा पूवम सिि अनु भवों िे तुलना की जाती है । उदाहरर् के सलए मृं गमरीसचका, क्षै सतजीय समलन-रे ल की पटरी का दू री पर समला होना सदखाई पड़ना। अन्य उदाहरर्ों में िमान लं बाई वाले रे खा खं िों का क्षै सतज व लम्बवत सनरूपर् करने पर लम्बवत रे खाखण्ड का तुलनात्मक रूप में असिक लम्बी प्रतीत होना। सजिे की ऊर्ध्ाम िर क्षै सतज भ्रम कहा जाता है । वास्तव में यसद दे खा जाए तो असिगम िंव्यवहार में हम 80% के लगभग चाक्षु ष िंवेदना का प्रयोग करते हैं तिा चाक्षु ष िंव्यवहार में हमारी आँ ख एक महत्वपूर्म भू समका अदा करती है । यह प्रकाश के उि वर्मिम सजिका तरं ग दै ध्यम सवस्तार 380-780 नै नोमीटर (मीटर का एक अरबवाँ भाग) के प्रसत िंवेदनशील होती हैं । आं खों द्वारा दे खी गई सवषय वस्तु मक्तस्तष्क में सवसशष्ट सचन्ह (कूट िंकेत) द्वारा भण्डाररत होती रहती है। यह तो हुई दे खे गए अनु भव का परं तु यसद जो लोग दृसष्टहीन है वह अपने िंप्रत्यय का सनमाम र् कैिे करते हैं ? िामान्य व्यक्ति जहां सकिी आकृसत के सवषय में प्रसतमा सनमाम र् कर ले ते हैं , वहीं पर दृसष्टहीन के सलए यह एक दु ष्कर कायम है । क्योंसक मक्तस्तष्क दे खी गयी वस्तु का ही आकृसतक भं िारर् करता है । इिी कारर् स्वप्न में दे खी गयी सवषयवस्तु एं हमारे जीवन में घसटत हुई रहती है । इि िंबंि में गहन शोि के बाद यह ज्ञात हुआ है सक आकृसत सनमाम र् में तिा स्मृसत में घसनष्ठ िंबंि है । महात्मा गां िी सचत्रकूट सवश्वसवद्यालय के प्रोफेिर राम बहादु र सिंह जो सक स्वयं दृसष्टहीन हैं , उन्होंने बताया सक वह व्यक्ति जो अपने जीवन के दौरान दृसष्टहीन हुआ है वह तो प्रत्यक्षर् में पूवम अनु भवों के आिार पर आकृसत सनमाम र् (प्रसतमा सनमाम र्) कर िकता है । उदाहरर् के सलए सकिी व्यक्ति ने घोड़ा दे खा हुआ है तो वह अपने मक्तस्तष्क में भण्डाररत घोड़ा की प्रसतमा का प्रत्याहरर् कर ले गा, परन्तु जन्मान्ध के सलए घोड़ा का िम्प्रत्यय बहुत ही दु ष्कर होगा क्योंसक घोड़े का प्रसतमा सनमाम र् उिके मक्तस्तष्क में हुआ ही नहीं है । यह तब तक दु ष्कर होगा जब तक सक अन्य प्रत्यक्षर् सविाओं (स्पशम एवं र्ध्सन) का प्रयोग ना कर ले। िंदर्भ
ूची
मनोसवज्ञान कक्षा-11, एन॰िी॰ई॰आर॰टी॰, नई सदल्ली। मनोसवज्ञान कक्षा-12, एन॰िी॰ई॰आर॰टी॰, नई सदल्ली। सिं ह, ए॰ के॰ (2016), सशक्षा मनोसवज्ञान, भारती भवन पक्तिशिम एण्ड सिस्टर ीब्यूटिम , पटना। सिं ह, ए॰ के॰ (2016), उच्चतर िामान्य मनोसवज्ञान, भारती भवन पक्तिशिम एण्ड सिस्टर ीब्यूटिम , पटना। गु प्ता, एि॰ पी॰ (2015), उच्चतर सशक्षा मनोसवज्ञान, शारदा पुस्तक भवन, प्रयागराज गु प्ता, एि॰ पी॰ (2009), सशक्षा मनोसवज्ञान, शारदा पुस्तक भवन, प्रयागराज पाठक, पी॰ िी॰ (2009), सशक्षा मनोसवज्ञान, अग्रवाल पक्तिकेशन, आगरा यादव, एि॰ (2008), सशक्षा मनोसवज्ञान, शारदा पुस्तक भवन, प्रयागराज िारस्वत, एम॰ (1996), सशक्षा मनोसवज्ञान की रूपरे खा, शारदा पुस्तक भवन, प्रयागराज
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