Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2018 = 6.371, www.srjis.com PEER REVIEWED JOURNAL, MAR-APR, 2019, VOL- 6/50
प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धशत की वततमान समय में नैशमशिकता अतल ु कुमार1 & भरत कुमार पडं ा2, Ph. D. 1
(पी. एच. डी.शोधाथी) शशक्षाशास्त्र, शशक्षा शिद्यापीठ, महात्मा गााँधी, ऄंतरराष्ट्रीय शहदं ी शिश्वशिद्यालय,
िधाा,महाराष्ट्र-442001 Email-id :-atulkumargupta00@gmail.com 2
(सहायक प्राध्यापक), शशक्षाशास्त्र, शशक्षा शिद्यापीठ, महात्मा गााँधी, ऄंतरराष्ट्रीय शहदं ी शिश्वशिद्यालय,
िधाा,महाराष्ट्र-442001 Abstract
शशक्षा एक ऐसी प्रशकया है जो मनष्ट्ु य को अशदकाल से ही प्रभाशित करता अया है और मनष्ट्ु य ने शशक्षा के द्वारा ऄपने ही समाज और संस्कृ शत का शिकास शकया है। शजसका पररणाम अज का अधशु नक समाज है।शशक्षा समय , समाज, संस्कृ शत और देश की भौगोशलक पररशस्थशत के ऄनसु ार बदलती रही है। शकन्तु अज हमारी शशक्षा व्यिस्था ऐसी हो गयी है , जहााँहम शशक्षा का ऄथा शकसी स्कूल ,कालेज या शिश्वशिद्यालय में जाकर शिशभन्न शिषयों की दस या बीस -तीस पस्ु तकें ऄध्यापकों से पढ़ लेना ही समझते हैं। शजस व्यशि ने आस शनयत पाठ्यक्रम के ऄनसु ार शजतनीऄशधक पस्ु तकें पढ़ी हैं और शजतनी उाँची परीक्षाएं पास की हैं िह हमारी दृशि में ईतना ही ऄशधक शशशक्षत या शिद्वान है। अजकल लोगों का यही शिचार है शक जो व्य शि ऄक्षरों से पररशचत नहीं है और एक या कइ भाषाओ ं को शलखने -पढ़ने की योग्यता नहीं रखता िह कदाशप शशशक्षत नहीं कहा जा सकता है। परन्तु हमारीप्राचीन भारतीयशशक्षा व्यिस्था ऐसी न थी ईसमें शिद्याशथायों को के िल शकसी एक शिधा की शशक्षा नहीं दी जाती थी बशकक ईन्हें शशक्षा शारीररक , मानशसक,बौशिक तथा अध्याशत्मक शशियों के शिकास की शशक्षा दी जाती थी। शजससे िे ऄपने जीिन में शकसी भी कशठनाइ का सामना कर सके शकन्तु अज की शशक्षा ऐसा करने में ऄसमथा है। बी . सरन ने कहा है की, “ चाहे शकतने भी ऄच्छे शदन क्यों न अये तब तक मातृभशू म का मख ु मण्डल न चमके गा जब तक की भारत की संस्कृ शत बोल न ईठे गी , जंगलों के गुरुकुलों में शनिास करने िाले ऊशषयों की भाषा में , जागकर न कहेगी की ईस ऄलौशकक संदेश और शशक्षा को फै लाओ , गुरुकल प्रणाली के शसिांत सदैि और सिात्र ग्रहणीय है –प्रत्येक देश और प्रत्येक पररशस्थशत में ” । अज हमारी शशक्षा शकसी ऄधं ेरी गफ ु ा में ऄपने रास्ते से भटक गयी है । ऐसा क्यों ? ऄत: हमें ऄपनी अधशु नक शशक्षा में कुछ शदशा एिं दशा पररितान करने की अिश्यकता है। शजसे हम आस लेख के माध्यम से दृशिपाशदत करने का प्रयत्न कर रहे है। Keywords:-प्राचीन भारतीय शशक्षा, अधशु नक शशक्षण,गुरुकुल प्रणाली, शिद्यालयी शशक्षा। Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com
प्रस्तावना:-प्राचीन भारत में शिक्षा की व्यवस्था के शिए गरुु कुि प्रणािी का शवकास शकया गया था। जहाां एक-एक ऋशि, महशिि सैकड़ोंशवद्याशथिय़ों को ाऄपने यहााँ रख करजीवन जीनेके शिए ाअवश्यक शिक्षा प्रदान करते थे। ाईस समय कागज का ाअशवष्कार नहीं हुाअ था, ाआसशिए पस्ु तक़ों द्वारा शिक्षा देने वािा प्रश्न ही नहीं ाईठता । ाईस समय सब प्रकार की शिक्षा मौशखक या व्यवहाररक रूप में ही दी जाती थी। ाआसशिए ाईस समय के शवद्याथी जो कुछ पढ़ते थे ाईसे जन्म भर के शिए स्मरण िशि द्वारा सरु शक्षत बना िेते थे। मन, बशु ि, ाअत्मा, ाऄहक ां ार ाऄन्त: करण चतष्ठु य को प्रभाशवत कर स्वाभाशवक व्यवहार में पररवतिन कराया जाता था एवां ाअचारगत पररवतिन को ही ाऄशधगम की पररभािा के रूप में स्वीकार शकया जाता था “आचारों परमोंधमत:” । ाआस शिक्षा के द्वारा व्यशि की समस्त िशिय़ों का ससु ांगत शवकास होता था । ाअजकि के समान परीक्षा समाप्त होते ही पस्ु तक़ों से नाता तोड िेने और पढ़े हुए शविय़ों में से तीन चौथााइ को कुछ ही महीऩों में भि ु ा देने वािी शिक्षा प्रणािी ाईस समय न थी। Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
‘ाईस समय शिक्षा द्वारा
ऄतल ु कुमार & डॉ. भरत कुमार पडं ा (Pg. 12059-12065)
सांस्कृ शत का सांरक्षण एवां सांवधिन शकया जाता था । सांस्कृ शत पर बि देने के कारण शिक्षा का ाईद्देश्य के वि पढ़ना नहीं
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, बशकक
ाऄनभु व करना था, ज्ञान को ाअत्मसात करना था । शकसी शवद्याथी की योग्यता का प्रमाण पत्र 33 प्रशतित ाईत्तीणाांक़ों के ाअधार पर प्राप्त शकया हुाअ शकसी शवश्वशवद्यािय का प्रमाण पत्र नहीं, ाऄशपतु शवद्वत पररिद में शकया हुाअ िास्त्राथि था, शजसके शिये वह ाऄपने जीवन में भी तैयार रहता था ’। (ाऄशग्नहोत्री ाअर. पृ. 4) प्राचीन भारतीय शिक्षा - प्राचीन समय में गरुु कुि़ों में जो कुछ शिक्षा दी जाती थी वह पणू रू ि प से व्यवहाररक होती थी।‘गरुु कुि में सांयम तथा शवशधशवशहत जीवन जो ाऄभाव़ों से पणू ि था , ाईसमे त्याग की भावना की सृशि करता था । ाआस भावना के ाअने से मनष्ु य शवश्व को ाऄनासि भाव से देखता था ’ । (दबु े , डॉ एस. पृ. 5) शवद्याथी को स्वाविम्बन का पाठ पढ़ाया जाता था , शजससे वह ाऄपने ाअगामी जीवन में कहीं भी और कै सी भी पररशस्थशत में ाऄपने पैऱों पर खडा हो सकता था और शजससे ाईसमे सही शनणिय िेने की क्षमता तथा समत्वबशु ि का शवकास स्वयां हो जाता था । जीवन के प्रथमाधि में पणू ि ब्रह्मचयि का पािन कराके ाईसके िरीर को फौिाद की तरह सदृु ढ़ बना शदया जाता था।‘ब्रह्मचयि से चररत्र शवकास में बि शमिता है । सक ु रात ने भी िीि को ही ज्ञान माना है । भारतीय मनीशिय़ों ने ाआस सत्य का साक्षात्कार पहिे ही कर शिया था’ । (दबु े, डॉ एस. पृ. 4) गााँव़ों के बाहर या जगां ि के वातावरण में रहने से ाईसका स्वास््य और सहनिशि ाआतनी मजबतू हो जाती थी शक वह प्रायाः रोग और बीमाररय़ों के ाअक्रमण से सरु शक्षत रहता था। गरुु और गरुु कुि के ाअवश्यक कायों में ाईसे परू ा भाग िेना पडता था।‘ाईपशनिद काि से ही शिष्य़ों को गोचारण कमि मे प्रवृत्त शकया जाता था । महाभारत में ाईपमन्यु को गोचारण तथा ाअरुशणाईद्दािक को खेत़ों की देखरे ख के शिये ाअचायि धौम्य ने भेजा था ’ । (दबु े, डॉ एस. पृ. 12)राम और कृ ष्ण जैसे रघवु ांिी और यदवु ांिी छात्ऱों को भी गरुु के शिए जांगि से िकशडयााँ ाआकट्ठी करके िानी पडती थीं , गाय़ों को चराना , ाईनकी देखभािकरना शवद्याशथिय़ों की शजम्मेदारी थी । यह काफी बडा काम था , क्य़ोंशक ाईस समय एक-एक ऋशि के यहााँ हजाऱों गायें रहती थीं और समय-समय पर ाईन्हें हजाऱों गायें राजाओ ां और श्री माऩों से दान में शमि जाती थीं। गरुु की ाऄशधक से ाऄशधक सेवा करना और ाईनकी ाअज्ञा का ाऄक्षरिाः पािन करना ही शवद्याथी का परम कत्तिव्य माना जाता था और गरुु भी ाईन्हें ाऄपनी सांतान की तरह मान कर ाईनके ककयाण की सदैव चेिा शकया करते थे। ‘ वैशदक काि में ाअचायि को शिष्य का मानस शपता माना गया है । आचायत उपनयमानों ब्रह्मचाररणाम कृणतु े गभतमन्त:। तं राशिशसतस्त्र उदरे शवमशतत तं जातं द्र्श्टुमशभसयंशन्त देवा: ।। (ाऄथविवेद 1/1/5) ाऄथाित् ाअचायि ाईपनयन करता हुाअ ब्रह्मचारी को गभि में धारण करता है । वह तीन राशत्र पयिन्त ाईसे ाईदर में रखता है । जब वह नया जन्म ग्रहण करता है तो देवगण ाईसे देखने के शिये एकत्र होते हैं’ । (दबु े , डॉ एस. पृ. 22)शिष्य़ों को सविथा शवकास, मोक्ष के शिये प्रेररत करना था । ाआसके शिये परा और ाऄपरा शिक्षा की व्यवस्था गरुु कुि़ों में थी । परा के ाऄतां गित ाअध्यात्म शविय ाअते थे , शजनके द्वारा ब्रह्माण्ड तथा पारिौशककता की शिक्षा दी जाती थी जबशक ाऄपरा के ाऄतां गित िौशककता से सांबशन्धत शविय होते थे ।‘शिक्षा के ाअदिों, शसिाांत़ों तथा तथा शवशभन्न पक्ष़ों की चचाि का जैसा ररवाज ाअजकि है वैसा कोाइ व्यवशस्थत प्रयास प्राचीन भारत में सांभवत: नहीं शकया गया है । ाऄध्ययन की ाअधशु नक प्रणािी पशिम की देंन है और स्वयां पशिम में भी सत्रहवीं सदी से पवू ि ाआस प्रकार का प्रयास प्राय: नहीं शकया गया था। ाऄत: वैशदक Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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शिक्षा पर ाआकट्ठी और व्यवशस्थत सामग्री कहीं नहीं शमिती, वेद, ाईपशनिद, धमिसत्रू , स्मृशत, सभु ाशित सांग्रह, ब्राह्मण ग्रांथ, महाकाव्य ाअशद साशहत्य में तथा जनसामान्य में प्रचशित सशू िय़ों में ाआस शविय पर बहुत सामग्री शमिती है’ । (ाऄशग्नहोत्री ाअर. पृ. 2) वततमान शिक्षा प्रणाली- ाअधशु नक शिक्षा प्रणािी शवद्यािय , स्कूि या महाशवद्यािय के चहारदीवारी तक सीशमत हो गयी है। शजसमे ाऄध्यापक शकसी पवू ि शनशित पाठयक्रम के ाऄनसु ार कक्षा में ाअता है और ाईसे पढ़ा कर चिा जाता है।ाऄध्यापक पाठ्यचयाि को परू ा करना ही ाऄपना कतिव्य समझते है और ाईसके बाद शवद्याथी क्या कर रहें हैं ?ाआससे ाऄध्यापक को कोाइ मतिब नहीं है शजसका पररणाम यह होता है की ाऄध्यापक शवद्याशथिय़ों में नैशतक मकू य़ों का शवकास नहीं कर पाते है। जब कोाइ ाऄध्यापक ाईन्हें डाांट देता है तो वे ाआसे सहन नहीं कर पाते है शजसके पररणामस्वरूपस्कूि और कािेज़ों के िडकें प्रायाः ाऄपने शिक्षक़ों की हाँसी ाईडाते है, ाईनके शविय में ाऄपमानजनक बातें कहते है और कभी-कभी तो सचमचु ाईनको मारते पीटते दे खा गया हैं शजससे हमारी ाअाँखें िज्जा से झक ु जाती हैं और हम प्राथिना करते हैं शक भगवान ऐसी शिक्षा से हमें बचाये रखें। वास्तव में शिक्षा का सपां कि स्कूिी पठन-पाठन से ज्यादा नहीं हैऔर शजसे सशु िक्षा कहा जाता है वह तो दसू री ही चीज है। ाअज कि दशु नया की नज़र में शिक्षा का मख्ु य ि क्ष्य कोाइ ाऄच्छी सी नौकरी कर सकना ाऄथवा शकसी ाऄन्य बडे समझे जाने वािे पेिे के द्वारा जीशवकोपाजिन करना समझा जाता है। क्य़ोंशक ाआन सभी काम़ों में शिखना-पढ़ना ाऄशनवायि होता है ाआसशिए ाअजकि ाआन काम़ों में सफि होने वािे व्यशि ही शिशक्षत समझे जाते हैं।यह सत्य है शक ाआस जमाने में शवशभन्न प्रकार के शविय़ों की जानकारी प्राप्त करने की सबसे सरि और सशु वधाजनक मागि पस्ु तक़ों का पठन-पाठन ही बन गया है , पर यह ककपना करना शक शिशक्षत होने का के वि यही एक मागि है, ठीक नहीं है। यही सबसे बडा ाऄतां र प्राचीन और ाऄवािचीन शिक्षा प्रणािी में है। गुरुकुल शिक्षा की प्रणाली का मनोवैज्ञाशनक आधार गरुु ओ ां के गरुु कुि़ों में शिक्षा प्रदान करने के पीछे कुछ मनोवैज्ञाशनक ाअधार थे । गरुु कुि़ों से ाऄशभप्राय ाईनके ाईस ाअश्रम से है जहााँ वे रहते थे जहााँ शनवास करके ाईनके शिष्य ाईनसे पशवत्र शिक्षा पाते थे, ाऄथाित् गरुु कुि । ये गरुु साधू होते थे , ऋशि होते थे, ाअध्याशत्मक परुु ि होते थे ाआसीशिए तो वे ाअध्याशत्मक ाईन्नयन कर सकें शजससे मशस्तष्क और आत्मा को सस्ं कृत शकया जाता था । वास्तव में गुरुकुल खल ु ी हुयी प्रयोगिाला थे, जहााँ प्रकृशत के पनु ीत सपं कत में प्रयोग शकये जाते थे । (वी.सरन:पवू ोि , पृष्ठ 125 )गरुु कुि़ों के शिए ऐसे िाांत पयािवरण की ाअवश्यकता क्य़ों पडी? क्य़ोंशक मशस्तष्क और वाह्य शवचार वाह्य और भौशतक ाअकििण़ों की ओर ाऄशधक पिायन करते हैं शजससे ाऄिाांशत फै िती है। ाआस ाऄिाांशत और कोिाहि से बचने के शिए शचतवृशत्त शनरोध ाअवश्यक है । शिक्षा मशस्तष्क को शनयांशत्रत करने का एक साधन है। जब मशस्तष्क शनयांशत्रत हो जायेगा तो वह बाहर पिायन करने के स्थान पर नीचे की ओर जायेगा, गहरााइ में जायेगा और गहन शविय़ों पर शवचार करके स्थायी मकू य़ों की खोज करे गा।वृक्ष में जड़ का अशस्तत्व पशियों और टहशनयों से अशधक होता है, क्योंशक वह धरती के भीतर जाती है। ाऄत: शवद्याथी को जहााँ शिक्षा प्रदान करनी है वह स्थान प्राकृ शतक दृशि से मनोरम होना ही चाशहए, शजसमे शकसी प्रकार की कृ शत्रमता का वास न हो।गरुु कुि वऩों के प्राकृ शतक वातावरण में शस्थत होते थे । ाऄत: ाअश्रम़ों में फि-फूि प्राय: पयािप्त मात्र में सि ु भ थे। शजससे गरुु और शिष्य तपोमय जीवन व्यतीत करतें थे।कशववर टैगोर ने एक साथ ही हिि और शवस्मय प्रकट करते हुये वैशदक शिक्षा के ाआस Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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पक्ष का ाईकिेख शकया है की, “ ाआन वऩों में मानव समाज भी था और पयािप्त एकाांत भी । भीड - भाड यहााँ नहीं थी । ाआस एकाांत ने भारतीय समाज में जडत्व या ाऄकमिण्यता का भाव पैदा नहीं शकया , बशकक ाईसे गशत और प्राण प्रदान शकया । ाआन वऩों से प्रवाशहत सांस्कृ शत की धारा में समस्त भारत शनमशज्जत हो गया ” । (ाऄशग्नहोत्री ाअर. पृ. 5) परम्परागत शिक्षा प्रणाली की शविेषताएं ाईस समय कागज, किम और पस्ु तकें िेकर पढ़ने-शिखने का ाऄभ्यास करने के बजाय शवद्याथी का चररत्र गठन करना और जीवन सांग्रह में ाईसे ाऄपना और दसू ऱों का शहत कर सकने योग्य बनाना शिक्षा का मख्ु य ाईद्देश्य था। दसू रा ाईद्देश्य यह था शक मनष्ु य को के वि भौशतकता की तरफ दृशि रखने वािा न बनाकर वह ाईसके जीवन को ाअध्याशत्मकता की तरफ मोडती थी। क्य़ोंशक जो व्यशि दसू रे व्यशिय़ों को ाऄपने समान समझकर ाईनके शहत-ाऄनशहत का ध्यान न रखेगा वह समाज के शिए कभी श्रेष्ठ नागररक शसि न होगा। जो स्वाथी व्यशि भौशतक िाभ़ों को ही सब कुछ समझकर ाऄपनी बशु ि का ाईपयोग ाऄपने शिए ाऄशधक से ाऄशधक सामग्री प्राप्त करने और दसू ऱों को ाईससे वशां चत रखने में करता है वह प्राचीन ाअदिि की कसौटी पर शनस्सदां हे एक पढ़ा-शिखा मख ू ि है तथा ाईसे सशु िशक्षत कहना शिक्षा का ाऄपमान करना ही होगा।प्राचीन शिक्षा पिशत की एक बडी शविेिता सामाशजक समानता का प्रचार भी था।‘ धाशमिक भावना, चररत्र और व्यशित्व का शवकास करके शिक्षा सामाशजक कतिव्य़ों पर बि देती थी । तीन ऋण़ों (देवऋण, ऋशिऋण और शपतृऋण) की ककपना सामाशजक जीवन को भिीभााँशत सम्पन्न करने के शिये ही शकए गए थे । प्रत्येक व्यशि से ाअिा की जाती थी की वह ाअने वािी पीढ़ी को पढ़ाकर ब्रह्मचयि ाअश्रम के बाद गृहस्थ ाअश्रम में प्रशवि होकर पाररवाररक दाशयत्व़ों को परू ा करके समाज की सेवा करे । शवद्याथी में यह भावना भरी जाती थी की वह समाज के धन से (शभक्षावृशत्त से) शिक्षा प्राप्त कर रहा है। ाऄत: समाज का ाईस पर बहुत ऋण है ।(ाऄशग्नहोत्री ाअर. पृ. 4) गरुु कुि़ों में शवद्याशथिय़ों को हरदजे की सादगी से रहना पडता था । शजससे गरीब-ाऄमीर का ाऄन्तर शिक्षाकाि में तो समाप्त ही हो जाता था। ब्रह्मचयि के पािन के ाईद्देश्य से शवद्याशथिय़ों को सब प्रकार की तडक-भडक की पोिाक , तेि-फुिेि, सगु शन्धत ाईबटन तथा िृांगारसामग्री से दरू रहना पडता था। भोजन के शिए गााँव के शकसी गृहस्थ के यहााँ से शभक्षा मााँग कर िाना ब्रह्मचाररय़ों के शिए शनयम रखा गया था। ाआससे एक ओर जहााँ शवद्याथी के रृदय में नम्रता तथा शवनय का भाव ाईत्पन्न होता था वहीं दसू री ओर वह ाऄपने को समाज का ऋणी और ाईसका एक ाऄगां समझने िगता था और भशवष्य में समाज सेवा करना ाईसका कत्तिव्य हो जाता था। ाआस प्रकार के वातावरण में शनतान्त गरीब बािक भी ाईच्च शिक्षा भी सहजता से प्राप्त कर िेते थे । कृ ष्ण और सदु ामा तथा राजा द्रुपद तथा द्रोणाचायि का एक साथ शमत्र रूप में शिक्षा प्राप्त करना ाआसके प्रत्यक्ष ाईदाहरण हैं। वतिमान शिक्षा प्रणािी ाआस दृशि से बडी ही दशू ित हो गाइ है। कािेज़ों की शिक्षा तो ाआतनी खचीिी हो गाइ है और वहााँ के ज्यादातर छात्र ऐसे बने-ठने तथा फै िन के पतु िे रहते हैं शक शकसी गरीब घर के िडके का वहााँ पहुचाँ सकना ही ाऄसम्भव होता है। ाऄगर ऐसा कोाइ शवद्याथी शकसी की सहायता से ाऄथवा स्वयां ट्यि ू न ाअशद करके वहााँ पढ़ने के शिए पहुचाँ भी गया तो वह सदा ाऄपने ाअप को नीचा ही पाता है।
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परम्परागत शिक्षा प्रणाली के प्रशत भ्ांशतयां एवं शनवारण कुछ व्यशि प्राचीन शिक्षा पिशत में यह दोि बतिाते हैं शक ाईसका क्षेत्र बहुत सांकुशचत था और ाईस समय के शवद्याशथिय़ों का दृशिकोण ाईतना व्यापक नहीं बना पाता था शजतना शक ाअजकि के शवद्याशथिय़ों का है । हम यह मान सकते हैं शक प्राचीन समय में शिक्षा का स्वरूप मख्ु यतया धाशमिक ही होता था और ाऄशधकााँि शवद्याथी पजू ा-पाठ , स्तुशत तथा कुछ कमिकाण्ड सम्बन्धी बात़ों के ाऄशतररि ाऄन्य शविय़ों का ज्ञान कदाशचत ही प्राप्त करते थे
। शकन्तु यहााँ हमें यह समझ िेना चाशहये की , “ सा शवद्या या
शवमुक्त्ये ” ाऄथाित् ज्ञान मशु ि का साधन था पढ़ाया जाने वािा सारा साशहत्य धाशमिक था शकन्तु तब धमि का ाऄथि के वि पजू ा पाठ नहीं था । तब धमि समग्र जीवन का पयािय था । (ाऄशग्नहोत्री ाअर. पृ. 5) यह भी सच है शक ाईस समय शिक्षा-सांस्थाओ ां में प्रवेि करने वािे शवद्याशथिय़ों की सांख्या समस्त ाअबादी के ाऄनपु ात से बहुत ाऄकप होती थी । ाईस समय की सामाशजक ाऄवस्था और व्यवस्था ही ाअजकि से सविथा शभन्न थी और ाईस समय का समाज मख्ु य रूप से कृ शि प्रधान था। खेती-बाडी का काम करने वाि़ों के शिए साशहत्य और शवज्ञान की शिक्षा तो ाअजकि भी सि ु भ नहीं है और गााँव़ों की
ज़्यादातर जनसख्ां या कृ शि की
वैज्ञाशनक खेती से शनरक्षर ही है। ाईस समय ाईद्योग धन्धे भी हाथ की कारीगरी के रूप में शकये जाते थे और ाईनका ाईद्देश्य शविेिताः शकसाऩों की ाअवश्यकता की वस्तएु ाँ बनाना ही था। बडे-बडे नगऱों की सख्ां या कम थी और वैदशे िक व्यापार बहुत सीशमत रूप में शकया जाता था। शफर ाईस समय शिक्षा का ाईद्देश्य के वि शकताबी शिक्षा ग्रहण करके कोाइ ाईपाशध प्राप्त कर िेना नहीं था
, वरन्
प्रत्येक बािक को ाईसकी जीवन की ाअवश्यकताओ ां के ाऄनरू ु प शिक्षा दी जाती थी। जैसे ब्राह्मण के पत्रु को कमिकाण्ड की शिक्षा, क्षशत्रय पत्रु को िस्त्र-सांचािन तथा राजनीशत की शिक्षा, वैश्य को शवशवध प्रकार के ाईद्योग धन्ध़ों तथा व्यापार की शिक्षा ाअशद। िद्रू ़ों का एक बडा भाग मेहनत मजदरू ी के साधारण काम़ों में िगा रहता होगा। ऐसी ाऄवस्था में पढ़ने-शिखने का प्रचार कम रहा हो या ाईच्च शिक्षा प्राप्त व्यशि शगने -चनु े ही देखने में ाअते ह़ों तो कोाइ ाअियि नहींपर यह ख्याि करना शक धाशमिक शक्रया-किाप के शसवाय देि में शकसी ाऄन्य शविय की शिक्षा का प्रचार ही न था , ाऄज्ञान का द्योतक है। डॉ. राधाकुमदु मख ु जी के अनस ु ार , “ शिक्षा के वि सैिाांशतक और ाऄकादशमक नहीं थी वरन् वह शकसी न शकसी शिकप से सम्बि थी
’ । (ाऄशग्नहोत्री ाअर. पृ. 5)
छान्दोग्य उपशनषदश में एक स्थान पर सनत्कुमार के पछ ू ने पर नारद ऋशि ने कहा था- ‚हे भगवान मैंने ऋग्वेद , यजवु ेद, सामवेद, ाऄथविवेद, ाआशतहास, परु ाण, वेद़ों के ाऄथि शवधायक ग्रन्थ , शपतृशवद्या, राशिशवद्या, देवशवद्या, शनशध शवद्या , पाकोवाक्य शवद्या , एकायनशवद्या, देवशवद्या, ब्रह्मशवद्या, भतू शवद्या, क्षत्रशवद्या, नक्षत्र शवद्या, सपि देव जन शवद्याओ ां का ाऄध्ययन शकया है ” ।हमारे प्राचीन साशहत्य में चौदह शवद्याओ ां और चौंसठ किाओ ां का शजक्र जगह-जगह पाया जाता है। ाआन शवद्याओ ां और किाओ ां में जीवन की ाऄनेक ाअवश्यक और ाईसे ससु भ्य तथा ससु ांस्कृ त बनाने की बात़ों का समावेि हो जाता है। ाऄस्त्र-िस्त्र सांचािन , सांगीत, वैद्यक, ज्योशति, शचत्रकारी, मशू ति बनाना, गृह शनमािण , वस्त्र-किा, ाअभिू ण और सगु शन्धत पदाथों का बनाना ाअशद शकतने ही शविय़ों में ाईस समय के भारत वाशसय़ों ने ाऄपवू ि ाईन्नशत की थी। ये सब कायि शबना समशु चत शिक्षा के यथोशचत रूप में शकये जा सकें यह सांभव नहीं। यद्यशप काि प्रभाव से प्राचीन शचह्ऩों का हजाऱों विि तक कायम रह सकना ाऄसांभव है
, तो भी दो , ढााइ हजार विि परु ानी
ाऄजांता, एिोरा ाअशद गफ ु ाओ ां में जो ाऄद्भुत मशू तिय़ों और शचत्रकारी के नमनू े शमिते हैं और प्राचीन समय की जो दस-पााँच Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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महाशविाि ाआमारतें ाऄभी दशक्षण और ाईत्तर भारत में पााइ जाती हैं ाईनसे यह प्रकट होता है शक ाईस समय तक हमारे देि में ाआन शवद्याओ ां का शवकास ाईच्च कोशट तक पहुचाँ गया था। ाआस प्रकार का शवकास तभी सांभव हो सकता है जब शक देि में ाऄच्छी शिक्षा सांस्थाएाँ हजार पााँच सौ विि तक शस्थत रह कर कायि कर चक ु ीं ह़ों या शिक्षा देने की कोाइ और शनयशमत व्यवस्था शनरन्तर प्रचशित रह चक ु ी हो। वततमान शवद्यालयी शिक्षा प्रणाली एवं उसके शवपक्ष में तकत ाअज शिक्षा का बहुत ाऄशधक शवस्तार या घर-घर में ाईसका फै ि जाना यह एक दृशि से ाऄच्छा भी है और दसू री दृशि से ाआसमें बहुत सी कशमयाां भी हैं। ाअजकि तो हमको शिक्षा और शवद्या के साविजशनक प्रचार का , खास कर स्कूि़ों और कािेज़ों में पढ़कर शनकिने वािे शवद्याशथिय़ों की ाऄगशणत सेना का पररणाम बेकारी और ाऄनीशत की वृशि ही शदखिााइ पड रहा है। यह सच है शक ाअजकि शिक्षा प्राप्त व्यशिय़ों की सांख्या प्रशतविि बढ़ती जाती है, पर साथ ही यह शिक्षा ाऄशधकााँि में खोखिी है। ाईसके द्वारा मनष्ु य कायिक्षम और सयु ोग्य बनने की बजाय चािाक और शदखावट पसदां बन रहे हैं। साथ ही परीक्षा पास कर िेने को शवद्या और शिक्षा की कसौटी बना देने से शकसी भी कायि को सम्पन्न करने की वास्तशवक योग्यता का ह्रास हो रहा है। ाआस समय चाऱों तरफ शदखिााइ पडने वािी भीिण बेकारी की समस्या का वास्तशवक कारण यही है शक शवद्याशथिय़ों को के वि शकताबी शिक्षा देकर ाईनमें शिशक्षत होने का ाऄशभमान तो ाईत्पन्न कर शदया जाता है , पर शकसी िोकोपयोगी कायि को पररश्रम , सच्चााइ और बशु िमत्तापवू िक करने का साम्यि ाईनके ाऄदां र पैदा नहीं की जाती है। शनष्कषत:-वतिमान वैज्ञाशनक यगु में ऋशिय़ों के शनजी गरुु कुि़ों की स्थापना हो सकना ाऄसांभव है । ाऄब एक िांगोटी या धोती पहने , माँडू मडु ाये भोजन के शिए शभक्षावृशत्त को ाऄगां ीकार करने वािे शवद्याथी की ककपना करना भी हास्योत्पादक ही मानी जायेगी। ाऄब शिक्षा की व्यवस्था को देि की सरकार ने ाऄपने हाथ़ों में िे शिया है और ाऄन्य शकसी के पास ाआतने साधन होने ाऄसांभव हैं शक वह ाआतनी बडी जनसांख्या के शिए शिक्षा की समशु चत व्यवस्था कर सके । ाआसशिए वतिमान स्कूि़ों तथा कािेज़ों का सविथा ाईच्छे द हो सकना तो सांभव नहीं पर ाईनका रूपाांतर होना ाऄत्यन्त ाअवश्यक है और ाईनमें प्राचीन शिक्षा पिशत की ाईपयोगी बात़ों का समावेि करने से बहुत ाऄशधक िाभ ाईठाया जा सकता है।ाआस तरह दोऩों पहिुओ ां पर शवचार करने से हम ाआस नतीजे पर पहुचाँ ते हैं शक प्राचीन शिक्षा पिशत तथा देिकाि की वतिमान बदिी हुाइ पररशस्थशत में ठीक ाईसी तरह नहीं िागू की जा सकती है शकन्तु ाईसमे कुछ पररवतिन करके ाईससे िागू शकया जाय तो हमारी वतिमान शिक्षा पिशत और िाभकारी हो सकती है । ाआस दृशि से सब से पहिी बात तो हम यही समझते हैं शक शिक्षा पिशत में कोरी जानकारी की ाऄपेक्षा गणु ़ों का महत्व ाऄशधक होना चाशहए। प्राचीन काि के शवद्याशथिय़ों के पास चाहे ाअजकि के स्कूिी िडके -िडशकय़ों की तरह पस्ु तक़ों और काशपय़ों के ढेर नहीं िगे रहते थे और न ाईनमें से प्रत्येक को भगू ोि और ाआशतहास से िेकर शवज्ञान के ाअशवष्काऱों तक की पाठ्य पस्ु तकें पढ़नी पडती थीं, पर ाईस समय जो कुछ शसखिाया जाता था वह जीवन भर के शिए ाईपयोगी होता था और ाईसे ऐसा पक्का कर शदया जाता था शक मनष्ु य ाईसे कभी भि ू नहीं सकता था। हम नहीं समझते शक दशु नया भर की बात़ों की जबानी जानकारी प्राप्त कर िेने की चेिा करना, पर व्यवहाररक कायि के नाम पर िन्ू य होना कहााँ की बशु िमत्ता है। Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies
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दसू री बात है वतिमान समय की परीक्षाओ ां और शडशग्रयााँ शदये जाने की प्रणािी। सांभव है ाअरम्भ में ाआससे कुछ िाभ हुाअ हो पर ाअजकि तो ाआसका स्वरूप ाऄत्यन्त शवकृ त तथा भ्रि हो गया। छि
, कपट, बेाइमानी, ररश्वत ाअशद शकसी भी साधन से
परीक्षोत्तीणि होने का प्रमाणपत्र प्राप्त कर िेना ही ाआस समय ाऄशधकााँि शवद्याशथिय़ों का िक्ष्य शदखिााइ पडता है।
“ ज्ञानं तृतीयं
मनुजस्य नेिं ” ाऄथाित् ज्ञान मनष्ु य की तीसरी ाअाँख है । ‘हमारे वतिमान समाज में ज्ञान के जो कें द्र कहे जाते हैं वे शडग्री के रूप में तीसरी ाअाँख का थोक शवतरण कर रहे हैं , पर क्या शवडम्बना है शक ाईसमे रोिनी ही नहीं है ’ । (ाऄशग्नहोत्री ाअर. प्रस्तावना) ाआससे शिक्षा का मकू य घटता जा रहा है और बी. ए., एम. ए. पास व्यशि चपरासी तक की नौकरी करते शदखिााइ पडते हैं। ाआस प्रकार की झठू ी सनद़ों के बजाय प्राचीन काि के छात्र शिक्षा समाप्त कर िेने पर कोाइ महत्व का कायि करके शदखिाते थे और ाईसके द्वारा ाऄपनी योग्यता का प्रमाण देते थे। वैशदक और पौराशणक काि में गरुु दशक्षणा की प्रणािी एक सीमा तक ाआस ाईद्देश्य की पशू ति करने वािी थी। शवश्वाशमत्र ने ाऄपने शिष्य गािव से ाअठ सौ श्यामकणि घोड़ों की मााँग की थीऔर द्रोणाचायि ने ाऄजिनु को राजा द्रुपद को पकड िाने का ाअदेि शदया था। ाऄब समय ाअ गया हैशक परीक्षाओ ां की मौजदू ा प्रणािी को बन्द कर शदया जाय
, और ाईसके
स्थान में ऐसे तरीके का प्रयोग शकया जाय शजससे शवद्याशथिय़ों की वास्तशवक योग्यता की जााँच हो सके और ाईनको तदनरू ु प काम़ों में ही शनयि ु शकया जा सके । सबसे बडी त्रशु ट वतिमान शिक्षा प्रणािी में यह है शक यह शवद्याशथिय़ों के चररत्र का शनमािण करने के बजाय ाईसका नाि कर देती है और नवयवु क़ों को जीवन के ाअरम्भ से ही काम , क्रोध, िोभ, मद, मत्सर ाअशद का दास बना देती है। ाआसी का पररणाम है शक जब बीस-पच्चीस विि की ाअयु में ाअजकि के शवद्याथी बी.ए. , एम. ए. की शडशग्रयााँिेकर जीवन-क्षेत्र में प्रवेि करते हैं तो वे प्रायाः शनबिि , शनस्तेज और ाऄनेक प्रकार की ाअशध-व्याशध के शिकार शदखिााइ पडते हैं। प्राचीन समय के छात्र चौबीस -पच्चीस विि तक ब्रह्मचयि का पािन करके और हर तरह के कठोर जीवन को सहन करके पणू ि िशि और ाईत्साह के साथ जीवन-सांग्राम में पदापिण करते थे और ाअत्म-शवश्वास के साथ प्रत्येक पररशस्थशत का सामना करने को प्रस्तुत रहते थे। यही दोऩों प्रणाशिय़ों का सविप्रधान ाऄन्तर है और ाईपरोि ाईद्देश्य को सम्मख ु रखकर ही हमको ाऄपनी शिक्षा-पिशत का पनु ाः शनमािण करनाचाशहये । सन्दभत ग्रथ ू ी ं सच ऄशग्नहोत्री, अर. (2006),अधशु नक भारतीय शशक्षा की समस्यायें और समाधान, राजस्थान शहदं ी ग्रन्थ ऄकादमीजयपरु शदनकर,अर. शसंह (2015),संस्कृ शत के चार ऄध्याय, लोकभारती प्रकाशन पहली मंशजल, दरबारी शबशकडंग, महात्मा गांधी मागा आलाहाबाद – 211001 दबु े, एस. ‘शरतेन्द’ ु , (2007),प्राचीन भारत में शशक्षा,शारदा पस्ु तक भिन, पशललशसा एिं शडस्रीलयटू सा 11, यशू निशसाटी रोड आलाहाबाद - 211002 । इ., श्रीधरन एिं बख्ल,ू भ. (2017),मकू यों की पनु ः स्थापना, सेज भाषा पशललके शन्स आशण्डया प्राआिेट शलशमटेड बी.1/ अइ -1 मोहन कोअपरे शटि आडं शस्रयल एररया मथरु ा रोड़, नयी शदकली- 110044 गुप्ता, एस.पी. तथा ऄकका गुप्ता (2015),भारतीय शशक्षा का आशतहास,शिकास एिं समस्याएं, आलाहाबाद:शारदा पस्ु तक भिन पशललशसा एंड शडस्रीलयटू रस 11,यशू निशसाटी रोड आलाहाबाद- 211002 गुप्ता एस.पी. तथा ऄकका गुप्ता (2008),भारतीय शशक्षा का सफरनामा , आलाहाबाद:शारदा पस्ु तक भिन पशललशसा एंड शडस्रीलयटू रस 11,यशू निशसाटी रोड आलाहाबाद-211002 लाल, अर.बी. (2013),भारतीय शशक्षा का शिकास एिं ईसकी समस्याएं,रस्तोगी पशललके शनस,मेरठ –शदकली पाण्डेय, अर.,(2013),प्राचीन भारत के शशक्षा मनीषी, शारदा पस्ु तक भिन,पशललशसा एिं शडस्रीलयटू सा 11, यशू निशसाटी रोड आलाहाबाद - 211002 www.wikipedia.com Copyright © 2017, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies