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VAISHNAV NATYA PARAMPARA KI PRUSHTHABHUMI ME ANKIYA NAT

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Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2021 = 7.380, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFEREED JOURNAL, MAY-JUNE, 2022, VOL- 10/71

वैष्णव नाट्य परम्परा की पृष्ठभूमि िें अंमकया नाट सुप्रीत मिश्र

शोधार्थी, प्रदशशनकारी कला विभाग, महात्मा गा​ाँ धी अन्तराश ष्ट्रीय वहिं दी विश्वविद्यालय ,िधाश , महाराष्ट्र Email: mishrasupreet@gmail.com

Paper Received On: 22 JUNE 2022 Peer Reviewed On: 27 JUNE 2022 Published On: 28 JUNE 2022 Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com

14िी िं शताब्दी के उत्तराधश में असम में श्रीमिंत शिंकरदे ि द्वारा शुरू वकये गए िैष्णि आिं दोलन ने सामाविक-सािं स्कृवतक पुनिाश गरण के युग की शुरुआत की| भारतीय इवतहास में भक्त्तत्त काल का महत्वपूणश स्र्थान रहा है । भक्त्तत्त काल को स्वणश युग माना िाता है । दविण भारत में शुरू हुआ भक्त्तत्त आिं दोलन, उत्तर भारत में व्यापक रूप से फैल गया। रामानिंद, कबीर, तु लसी, सूर,िल्लभाचायाश , गुरूनानक दे ि , सिंत नामदे ि, चैतन्य महाप्रभु आवद हजारोिं सिंतोिं ने भक्त्तत्त का प्रचार वकया | सिंत कबीर और रामानिंद से प्रभावित होकर श्रीमिंत शिंकरदे ि ने िैष्णि पिंत को पूिोत्तर भारत में पुक्त्ित ि पल्लवित वकया और उसे आगे बढाने का काम उनके वशष्य माधिदे ि एि​िं अन्य सिंत िैसे अनन्त कन्दली,दामोदर दे ि,नारायणदास ठाकुर, आताराम सरस्वती,रत्नाकर कन्दली, श्रीधर कन्दली, भट्टदे ि, चन्दसाई, मर्थुरादास बुढा आवद ने वकया । श्रीमिंत शिंकरदे ि ने असम में न वसफं िैष्णि धमश का प्रचार वकया बक्त्ि असम के विभन्न िन-िावतयोिं को एक सूत्र में बािं धकर उसे पुनिीवित वकया। शिंकरदे ि (1449-1568) का िन्म नगा​ाँ ि विले के बटद्रिा(बारदोिा​ाँ ) गा​ाँ ि में हुआ र्था। वपता का नाम कुसुिंबर भूञा​ाँ और मा​ाँ का नाम सत्यसिंध्या र्था। िन्म के तुरिंत बाद मा​ाँ का स्वगशिास हो गया। दू ध पीते बच्चे की दे खभाल उसकी दादी खेरसुती ने की र्थी । ‘ब माने बटद्रिा औ क माने कुसुिंबर गृहे मातृ नामे सत्यसिंध्या उदरत िक्त्न्मला आमार श्रीमन्त शिंकरदे ि हरर ऐ।’ Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


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