Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2021 = 7.380, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFEREED JOURNAL, MAR-APR, 2022, VOL- 9/70
भारत में माध्यममक मिक्षा प्रणाली एक मिश्लेषण मनोज कुमार स िंह अस स्टें ट प्रोफे र (बी.एड.), राठ महासिद्यालय, पैठानी, पौड़ी गढ़िाल, उत्तराखण्ड
Paper Received On: 25 APR 2022 Peer Reviewed On: 30 APR 2022 Published On: 1 MAY 2022 Abstract प्रस्तु त ले ख भारत में माध्यसमक सिक्षा प्रणाली पर सकये गए िोध पर आधाररत है । यह ले ख माध्यसमक सिक्षा प्रणाली पर सिक्षा आयोगोिं द्वारा सिये गये ुझािोिं को ध्यान में रखते हुए उ की कायय प्रणाली तथा प्रणाली में ुधार को ले कर केंसित हैं । मुख्य म िं दु- माध्यसमक सिक्षा प्रणाली, अथय और सििेषताएिं ।
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प्रस्तािना- भारत िषय में माध्यसमक सिक्षा िे ि की सिक्षा का अत्यन्त ही महत्वपूणय स्तर है । यह िह स्तर है जो माध्यसमक सिक्षा ि उच्च सिक्षा के मध्य एक पुल का कायय करता है ि िोनोिं को जोड़ता है ामान्यत: इ स्तर पर पढ़ने िाले छात्र सकिोरािस्था के होते हैं । इ सलए इ अिस्था का महत्व और भी बढ़ जाता है । माध्यसमक सिक्षा ऐ ा केन्द्र सबन्िु है , जो प्राथसमक सिक्षा ि सिश्वसिद्यालयी सिक्षा के बीच म्बन्ध स्थासपत करता है ।
म्पूणय सिक्षा प्रणाली तथा मानि जीिन में माध्यसमक सिक्षा इतना महत्व होते हुए भी यह आज
तक अनेक िोषोिं े ग्रस त रही है । माध्यसमक सिक्षा के िोषोिं की ओर िंकेत करते हुए प्रो. के.जी. ै यिन सलखते हैं -
ारे
िं ार के िै क्षसणक क्षेत्रोिं में माध्यसमक सिक्षा के आम ढरे के प्रसत गहरा अ िंतोष रहा है
और िे काफी मय े यह अनुभि करते रहे हैं सक उ की आमूल पुनरय चना तत्काल आिश्यक है । यद्यसप प्राथसमक सिक्षा के क्षेत्र में बहुत े बहुमूल्य पररितयन हुए हैं और स्वयिं हमारे िे ि में बुसनयािी सिक्षण पद्धसत ने उ की
मस्याओिं के प्रसत एक सबल्कुल ही नया रिैया अपनाया है , पर माध्यसमक सिक्षा अभी कुछ
मय े पहले तक कुल समला- अब प्रश्न है सक माध्यसमक सिक्षा सक े कहते हैं ? अथाय त् इ का क्या अथय है ? इ का उत्तर हम कई प्रकार े िे
कते हैं । कर गसतहीन ि अपररिसतयत रही है ।
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मनोज कुमार स िंह
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माध्यममक मिक्षा का अर्थ - स्कूली सिक्षा को प्राय: तीन भागोिं में बााँ टा जाता है - प्री प्राइमरी सिक्षा, प्राइमरी सिक्षा ि ेकण्डरी सिक्षा। ये तीनो स्तर व्यक्ति की तीन अिस्थाओिं के ाथ िंबिंसधत है । प्री-प्राइमरी सिक्षा िैििकाल के ाथ िंबिंसधत है । प्राइमरी सिक्षा बचपन के ाथ िंबिंसधत है और ैकण्डरी सिक्षा के सकिोरािस्था के सिक्षा
की
ाथ
िंबिंसधत मानी जाती है । स्पष्ट है सक प्री-प्राइमरी ि प्राइमरी सिक्षा के पश्चात् सज
व्यिस्था
होती
है
उ े
ैकण्डरी
सिक्षा
कहते
है ।
ए .एन.मुखजी ने माध्यसमक सिक्षा को तीन भागोिं में सिभासजत सकया है 1.
स्थर्मत के रुप में - माध्यसमक सिक्षा िह सिक्षा है तो प्राथसमक सिक्षा के बाि आती है ।
2.
प्रकार के रुप में - माध्यसमक सिक्षा िह है सज का
िंबिंध सनसश्चत ि बौक्तद्धक िस्तुओिं के
सिभाजीकरण े है । इ के तीन रुप होते हैं -(1) भ्रसमत नाम, (2) मानिीयता तथा (3) उिार सिक्षा 3.
स्तर के रुप में- माध्यसमक सिक्षा िह सिक्षा है सज े हम बौक्तद्धकता की क ौटी कह क्योिंसक सक ी पर सिश्वसिद्यालयी सिक्षा आसित है ।
कते हैं ।
ामान्य रुप े माध्यसमक सिक्षा िह सिक्षा है
सज में कक्षा 6 े 12 तक की सिक्षा की व्यिस्था होती है। कुछ राज्ोिं में कक्षा 11 ि 12 को हायर ैकण्डरी भी कहा जाता है , परन्तु कुछ भी कहा जाय िह माध्यसमक सिक्षा के ही भाग हैं । कोठारी सिक्षा आयोग की दृसष्ट े माध्यसमक सिक्षा का अथय िषों में व्यि सकया है । कोठारी सिक्षा आयोग के अनु ार 7,8 िषय तक की प्राइमरी सिक्षा होती है और उ के बाि 4 या 5 िषय की माध्यसमक सिक्षा होती है । 4.
माध्यममक मिक्षा प्रणाली का अर्थ - माध्यसमक सिक्षा िे ि के िैसक्षक पैटनय में एक बहुत ही
रणनीसतक स्थान रखती है । यह प्राथसमक सिक्षा और उच्च सिक्षा के बीच की कड़ी है । प्राथसमक सिक्षा का उद्दे श्य जीसित रहने के सलए न्यूनतम आिश्यकताएिं प्रिान करना है , जबसक माध्यसमक सिक्षा एक व्यक्ति को जसटल
माज का पूणय
िस्य बनने में
क्षम बनाती है । स्वतिंत्रता के बाि हमारे िे ि ने माध्यसमक
सिक्षा के क्षेत्र में एक महान उल्लेखनीय पररितयन हास ल सकया। भारत रकार ने स्वतिंत्रता प्राक्ति के तुरिंत बाि माध्यसमक सिक्षा प्रणाली की
मीक्षा के सलए कई
समसतयोिं और आयोगोिं की सनयुक्ति की । सिसभन्न
समसतयोिं ने माध्यसमक सिक्षा में मात्रात्मक और गुणात्मक िोनोिं तरह े स फाररि की। तारा हस्त
ुधार के सलए कुछ ुझािोिं की
समसत ने 1948 में गैर-उद्दे श्यीय सिद्यालयोिं को हतोत्सासहत सकए सबना
बहुउद्दे िीय प्रकार के माध्यसमक सिद्यालयोिं का ुझाि सिया। डॉ. ए . राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सनयुि सिश्वसिद्यालय सिक्षा आयोग 1948-49 ने सटप्पणी की सक "हमारी माध्यसमक सिक्षा हमारी िैसक्षक मिीनरी की
ब े कमजोर कड़ी है और इ में तत्काल ुधार की आिश्यकता है ।" भारत की माध्यसमक सिक्षा
के पुनसनयमाय ण में मील का पत्थर माध्यसमक सिक्षा आयोग की ररपोटय 1952-53 है । Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language
मनोज कुमार स िंह
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माध्यसमक सिक्षा में मौजूिा िोषोिं की मीक्षा करने और माध्यसमक सिक्षा में ु धार के िंबिंध में कुछ ुझाि िे ने के सलए डॉ. ए. लक्ष्मणस्वामी मुिसलयार की अध्यक्षता में भारत
रकार द्वारा 23 स तिंबर 1952 को
आयोग का गठन सकया गया था।
माध्यममक मिक्षा के उद्दे श्य स्वतिंत्रता प्राक्ति के बाि माध्यसमक सिक्षा के उद्दे श्योिं के िंबिंध में सिसभन्न समसतयोिं ने अपने बहुमूल्य ुझाि सिए हैं । माध्यममक मिक्षा आयोग (1952-53) के अनुसार माध्यममक मिक्षा के उद्दे श्य 1. सिक्षाथी के बीच िाां गीण सिका लाना। 2. िे ि के युिा िगय को अच्छे नागररक बनने के सलए प्रसिसक्षत करना जो िे ि के ामासजक और आसथयक सिका में प्रभािी ढिं ग े अपनी भूसमका सनभाने में क्षम होिंगे। 3. छात्रोिं के ामासजक गुणोिं, बौक्तद्धक सिका और व्यािहाररक कौिल को बढ़ािा िे ना। 4. छात्रोिं के चररत्र को प्रसिसक्षत करना तासक िे उभरती
ामासजक व्यिस्था में नागररकोिं के रूप में
रचनात्मक रूप े भाग ले कें। 5. छात्रोिं की व्यािहाररक और व्याि ासयक िक्षता में ुधार करना। 6. िस्तुसनष्ठ रूप े
ोचने के सलए िैज्ञासनक दृसष्टकोण सिकस त करना।
7. अपने ासथयोिं के ाथ ामिंजस्य और कुिलता े जीने के सलए आिश्यक गुणोिं को सिकस त करना। 8. कलात्मक और
ािं स्कृसतक रुसचयोिं का सिका
करना जो सिद्यासथययोिं के िाां गीण व्यक्तित्व के आत्म-
असभव्यक्ति और सिका के सलए आिश्यक हैं । भारतीय मिक्षा आयोग (1964-66) के अनुसार माध्यममक मिक्षा के उद्दे श्य1. मुख्य उद्दे श्य "हमारे लोगोिं के जीिन स्तर को ऊपर उठाकर राष्टरीय पुनसनयमाय ण" है । 2. सिक्षा एक आधुसनक लोकतािं सत्रक और माजिािी माज की जरूरतोिं को पूरा करने के सलए है । 3. यह उत्पािकता को बढ़ािा िे गा। 4. यह ामासजक और राष्टरीय एकता को मजबूत करे गा। 5. यह जीिन के एक तरीके के रूप में अपनाने के सलए लोकतिंत्र को मजबूत करे गा। 6. यह आधुसनकीकरण की गसत को तेज करे गा। 7. यह छात्रोिं को स्कूल, घर, काययिाला, फामय और कारखाने आसि में उत्पािक कायों में भाग लेने में क्षम बनाएगा। 8. इ
े छात्रोिं में ामासजक, नैसतक और आध्याक्तत्मक मूल्योिं का सिका होगा।
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भारतीय सिक्षा आयोग की स फाररिोिं के अनु ार, िे ि के आसथयक और ािं स्कृसतक सिका के सलए सिक्षा का पुनसनयमाय ण सकया गया था। सिक्षा को सिद्यासथययोिं की िास्तसिक जीिन क्तस्थसतयोिं े जोड़कर माध्यसमक सिक्षा के गुणात्मक सिका को महत्व सिया गया। एनपीई, 1986 और िंिोसधत एनपीई, 1992 ने ामान्य रूप
े सिक्षा के उद्दे श्योिं और उद्दे श्योिं के बारे में चचाय की है , सजनमें
े कुछ माध्यसमक सिक्षा के सलए
प्रा िंसगक हैं । 1. माध्यसमक सिक्षा असनिायय रूप े
िाां गीण सिका , भौसतक और आध्याक्तत्मक के सलए है ।
2. यह अथयव्यिस्था के सिसभन्न स्तरोिं के सलए जनिक्ति सिकस त करता है , अिंततः आत्मसनभयरता को बढ़ािा िे ता है । 3. यह सिक्षासथययोिं के बीच अच्छी नागररकता की भािना सिकस त करता है । 4. यह छात्रोिं के बीच लोकतािं सत्रक मूल्योिं, असधकारोिं और कतयव्योिं को एक लोकतािं सत्रक व्यिस्था में सिकस त करे गा। 5. यह "एक पररिार के रूप में पूरी िु सनया" को मजबूत करे गा और युिा पीसढ़योिं को अिंतराय ष्टरीय हयोग और िािं सतपूणय ह-अक्तस्तत्व के सलए प्रेररत करे गा। 6. इ े न केिल पहुिं च में, बक्तल्क
फलता की क्तस्थसतयोिं में भी
भी के सलए िैसक्षक अि र की
मानता
प्रिान करनी चासहए। 7. यह बच्चोिं में िैज्ञासनक स्वभाि और मन की स्वतिंत्रता को सिकस त करे गा। 8.
ीखने के न्यूनतम स्तर (एमएलएल) सनधाय ररत सकए जाएिं गे और छात्रोिं में लोगोिं की सिसिध
ािं स्कृसतक
और ामासजक प्रणासलयोिं की मझ को बढ़ािा िे ने के सलए आिश्यक किम उठाए जाएिं गे। 9. यह छात्रोिं के बीच िारीररक सिक्षा के माध्यम े िारीररक स्वास्थ्य को सिकस त करने में क्षम बनाता है । इनके अलािा, माध्यसमक सिक्षा एक राष्टरीय पाठ्यचयाय के ढािं चे पर आधाररत होनी चासहए सज में अन्य घटकोिं के ाथ एक ामान्य कोर िासमल हो जो लचीले होिं। कॉमन कोर में भारत के स्वतिंत्रता आिं िोलन का इसतहा , पहचान के सलए आिश्यक अन्य
िंिैधासनक िासयत्व और प्रकृसत और राष्टरीय
ामग्री िासमल होगी। व्याि ासयक िक्षता को बढ़ािा िे ना माध्यसमक
सिक्षा का एक असभन्न अतीत होना चासहए। मिश्लेषण एििं सुझि- आरएमए ए का लक्षय प्रतयेक घर े उसचत िू री पर एक माधयसमक स्कूल उपलबध कराकर पािं च िषय में नामािं कन िर माधयसमक स्तर पर 90 प्रसतित तथा उचचतर माधयसमक स्तर पर 75 प्रसतित तक बढ़ाने का है । इ का लक्षय
भी माधयसमक स्कूलोिं को सनधाय ररत मानकोिं के अनुरूप बनाते
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हुए मसहला-पुरूष भेिभाि, ामासजक-आसथयक और सन:िकतता-बाधाओिं को समटाते हुए और 2017 तक माधयसमक स्तर तक की सिक्षा की वयापक ुलभता की वयिस्था कराते हुए माधयसमक सिक्षा की गुणितता में ुधार करना भी है । लाखोिं बच्चोिं को प्रारक्तिक सिक्षा िे ने के सलए रकार द्वारा स्थासपत राष्टरीय माध्यसमक सिक्षा असभयान (RSMA) काफी हि तक
फल रहा है एििं इ ने पूरे िे ि में माध्यसमक सिक्षा के
आधारभूत ढािं चे को िक्तििाली बनाने की आिश्यकता उत्पन्न की । मानि िं ाधन सिका
मिंत्रालय के
अनु ार- “ िय सिक्षा असभयान फलतापूियक लागू होने े बड़ी िंख्या में छात्र उच्च प्राथसमक कक्षाओिं में उत्तीणय हो रहे हैं तथा माध्यसमक सिक्षा के सलए ज़बरिस्त मािं ग उत्पन्न कर रहे हैं ।”
माज में सिक्षा का
महत्व उतना ही है सजतना जीिन जीने के सलए पानी का होना। सिक्षा के उपयोग तो अनेक हैं परिं तु उ े ही और नई सििा िे ने की आिश्यकता है । सिक्षा इ पररिेि े पररसचत हो
प्रकार की होनी चासहए सक एक व्यक्ति अपने
के। सिक्षा हम भी के उज्ज्वल भसिष्य के सलए एक अहम भूसमका सनभाती है ।
हम अपने जीिन में सिक्षा के इ
ाधन का उपयोग करके आप फलता के मागय में आगे बढ़ कते है ।
सिक्षा का उच्च स्तर लोगोिं की ामासजक और पाररिाररक म्मान तथा एक अलग पहचान बनाने में मिि करता है । सिक्षा का मय भी के सलए ामासजक और व्यक्तिगत रुप े बहुत महत्वपूणय मय होता है , यहीिं कारण है सक हमें सिक्षा हमारे जीिन में इतना महत्व रखती है । सिक्षा की मुख्य भू समका सिक्षा के स्तर को बेहतर बनाना है । सिद्यासिहीन पिु को ज्ञान का तृतीय नेत्र प्रिान कर सििेकिील बनाना, उ में अच्छे - बुरे की पहचान तत्पन्न करना, कायिे -कानून की
मझ प्रिान करना तथा जीिन में
िाां गीण
फलता
और म्पन्नता प्रिान करने के सलए िंस्कार और ुरुसच के अिंकुर उत्पन्न कर उ के व्यक्तित्व सनमाय ण में ही सिक्षा का महत्त्व है । अम्पूणाय नन्द जी के िब्ोिं में, 'मन और िरीर का तथा चररत्र के भािोिं के पररष्कार में ही सिक्षा का महत्त्व है । िरीर और आत्मा में असधक सिका
े असधक
ौन्दयय और
िासित
म्पूणय का
म्पन्न करने में ही सिक्षा का महत्त्व है । िे ि के ग्रामीण क्षेत्रोिं में सिक्षा का महत्व असधक िे खा गया
है । हम अपने असभभािकोिं और सिक्षक के प्रया ोिं के द्वारा अपने जीिन में अच्छे सिसक्षत व्यक्ति बनते हैं । िे िास्ति में हमारे िुभ सचिंतक हैं , सजन्ोिंने हमारे जीिन को
फलता की ओर ले जाने में मिि की।
आजकल, सिक्षा प्रणाली को ग्रामीण क्षेत्रोिं में बढ़ािा िे ने के सलए बहुत
ी
रकारी योजनाएिं चलायी जा
रही हैं तासक, भी की उपयु ि सिक्षा तक पहुाँ च िंभि हो। ग्रामीण क्षेत्रोिं में लोगोिं को सिक्षा के महत्व और लाभोिं को सिखाने के सलए टीिी और अखबारोिं में बहुत े सिज्ञापनोिं को सिखाया जाता है क्योिंसक सपछड़े ग्रामीण क्षेत्रोिं में लोग गरीबी और सिक्षा की ओर अधूरी जानकारी के कारण पढ़ाई करना नहीिं चाहते हैं और जो लोग करना चाहते है उनके पा
ुसिधा उपलब्ध नहीिं रहती की िे अच्छे
े अपनी सिक्षा पूणय कर
पाए। Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language
मनोज कुमार स िंह
16919
(Pg. 16914-16919)
सिंदभथ सूची असिहोत्री, रसिन्द्र (2008):आधुसनक भारतीय सिक्षा, मस्याएाँ और माधान, राजस्थान सहन्दी ग्रन्थ अकािमी,जयपुर अग्रिाल, जे . ी.(1971): भारतीय सिक्षा की ितयमान मस्याएाँ , आयय बुक सडपो करोल बाग, नई सिल्ली। उपाध्याय, प्रसतमा(2003): भारतीय सिक्षा में उिीयमान प्रसिसत्तयािं ,िारिा पुस्तक भिन, इलाहबाि । त्यागी, गुरु रन िा (2007): भारतीय सिक्षा का पररदृश्य,अग्रिाल पक्तिकेिन, आगरा
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