Skip to main content

PARITANTRA-ADHYAYANTAM SAMAJ KARY PRARUP KE AAYAM KI GANDHI DRUSHTI

Page 1

Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language, Online ISSN 2348-3083, SJ IMPACT FACTOR 2021: 7.278, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFEREED JOURNAL, AUG-SEPT, 2021, VOL-9/47 पारितंत्र - अध् यात्म समाज कायय प्रारूप के आयाम की गांधी दृष्टि ष्टमष्टिलेश कुमाि1, Ph. D. & छष्टिनाि यादि2 1

Mkt1980@gmail.com

2

Chhabinathyadav1987@gmail.com

Paper Received On: 25 SEPT 2021 Peer Reviewed On: 30 SEPT 2021 Published On: 1 OCT 2021 Abstract भारतीय सं स्कृतत में अध् यात् म अहम स् थान रखता है । यह धमम, मूल्य, योग एवं तनयम के रूप में भारतीय समाज के तवतवध जीवन पक्ों में अनु स्यूत हुआ है । इसने प्रकृतत एवं मानव समाज के बीच सं तुलन कायम तकया है। प्रकृतत के संरक्ण एवं सं वर्द्म न को लेकर भारतीय आध् यात्मिकता को तब और बल तमला जब पूरे पृथ्वी का पाररतं त्र तबगड़ गया और अनेक प्रकार के पयाम वरणीय समस् याएँ जन्म ले ने लगी। इन समस् याओं का वै ज्ञातनक हल खोजने का प्रयास वै तिक स् तर पर तकया गया और जारी है । अंतत: इस सत् य के तरफ तवद्वानों का ध् यान गया तक पाररतं त्र असं तुलन के समस् या का कारण मानव मन में है । मानव का वह मन जो पहले अपने आप-पास के जीव-जंतु, पेड़-पौधे , मैदान एवं पहाड़ के प्रतत भावनात् मक रूप से जु ड़ा तथा आहलातदत होता था आज पूरी तरह से उसके प्रतत व् यावसातयक हो चुका है । प्रकृतत के प्रतत मानव के आध् यात्मिक मूल्य सर चुके है । समग्र अत्मित् व की अवधारणा खि हो गई है । आवश्यकता है तक वै तदक दशमन के प्रकृततवादी पक् का पुनर तवश्लेषण करके सह अत्मित् व के भावना का उत् थान एवं तवकास तकया जाए। सं पोषणीय तवकास की अवधारणा को दे खा जाए तो इससे सं बंतधत गां धी के तवचार भी प्रासं तगक होते हैं जो सह अत्मित् व के भावना के पक्धर थे। भारतीय धममशास् त्रों का मूल मानी जानेवाली श्रीमद भागवदगीता सं पूणम प्रकृतत का एक ही ब्रम्हा का तववतम रूप मानती है जो इस दशमन को प्रदान करती है तक प्रत् येक जीव इस ब्रम्हाण् ड की एक इकाई मात्र है । अत: इस ब्रम्हाण् ड की सत्ता के तलए सभी इकाईयों की सत्ता आवश्यक है । ऐसे में प्रकृतत के प्रतत अततरे क एवं भोक्तावादी भावना व् यत्मि, समाज एवं प्रकृतत तीनों के खुशहाली के तलए हातनकारक है । प्रमु ख ष्ट ं दु- पाररतं त्र, पाररतं त्र-मनोतवज्ञान, पाररतं त्र -आध्याि,पाररतं त्र-मनोवै ज्ञातनक असं तुलन,पाररतं त्र तवकास, पाररतं त्र -अध् यात् म की गां धी दृति, सं पोषणीय तवकास

Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com

पारितंत्र -आध्यात्म के ष्टिकास का ि् यािहारिक पक्ष सवमप्रथम पाररतंत्र मनोतवज्ञान की अवधारणा का प्रततपादन कैतलफोतनम या के प्रोफेसर तथयोडोर रोजै क ने 1969 ई. में . अपनी पुस्तक ‘द वायस ऑफ अथम’ में तकया। इस संकल् पना के अंतगमत माना जाता Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


डा. तमतथलेश कुमार & छतवनाथ यादव

(Pg. 11673-11680)

11674

है तक प्रकृतत मनु ष्य के तलए माता के समान है तजसके साथ व्यत्मि की भावना का तवकास पुत्र जै सा होता है । इस प्रतिया में मनु ष्य या मानव समाज के तवकास के साथ उसका भावनात्मक तवकास भी प्रकृतत के सापक् हो जाता है । भारत प्राकृततक रूप से संपन् न दे श रहा है । इसीतलए यहाँ अतहं सा मू लक धमम एवं संस्कृतत तवकतसत हुई। प्रकृतत की हर एक वस्तु को दै वत् व एवं पूणम चेतना का रूप दे तदया गया। प्रकृतत एवं संस्कृतत का साझा अत्मित्व मानवीय भावनाओं के तवकास अनु िम में आगे बढा। “सुरतक्त जीवन, प्राकृततक संसाधनों की संपन्नता, तचंता से मुत्मि,जीवन की तजम्मेदाररयों से तवरत्मि और िूर व्यावहाररक स्वाथम के अभाव ने ही भारत के उच्चतर जीवन को प्रोत्साहन प्रदान तकया तजसके पररणाम स्वरूप हमें इततहास के आरं भ काल से ही भारतीय मन में आत्मज्ञान के तलए एक प्रकार की तवकलता, तवद्या के प्रतत प्रेम और मत्मिष् क के अतधक स्वास्थ्य और युत्मि युक्त प्रवृतत्तयों के प्रतत लालसा तदखाई दे ती है ।” (राधाकृषणन ; 2017, पृ. 18)। ऋतष मु तनयों, संतों एवं कतवयों का ज्ञान दशम न एवं वाणी ने भारतीय मानस के प्राकृततक एवं सां स्कृततक पक् को एकात्मभाव प्रदान कर तदया। उसी ऋतष एवं मनीषी परं परा के मोहनदास करमचंद्र गां धी संवाहक थे । गां धी भारतीय संस्कृतत एवं परं परा के पुरजोर समथम न ही नहीं करते हैं बत्मि पूरी आत्मतनष् ठा के साथ जीते भी हैं । उनके शब्दों में ‘‘भारत ने ही जीवन के गंभीर समस्या पर तवचार तकया है और उसके हल खोजा है । न केवल इस जन् म के तलए बत्मि तमाम जन्मों के तलए रूपां तररत व सनातन जीवन बनाने के तलए तनतान् त आवश् यक है तो भी में भारत की ही ओर संकेत करू ँ गा (वा. खं ड-1, पृ. 182)। गां धी स्वीकारते हैं तक भारतीय समाज का पाररतंत्र-मनोवैज्ञातनक तवकास अद्वै तवादी पाररतंत्रअध्यात्म के स्वरूप का पयाम य है । स्पष् ट रूप में दे खा जाए तो ‘पाररतंत्र का तवचार तहं दु दशम न में गां धी के रूप में अखण्ड एवं व्यापक स्वरूप को प्राप्त कर तलया, मु ख्य रूप में उनका अतहं सा के प्रतत झुकाव सभी प्रकार के जीवन को सम्मान प्रदान करता था, साथ-साथ पयाम वरण के साथ सादगी पूणम जीवन व्यतीत करने को प्रोत्सातहत करता है (पेडरसन : 1998: पृ.274)। गां धी का पाररतंत्र-आध्याि प्रकृतत के प्रतत वापस जाओं पर आधाररत था। वे प्रकृतत के संपूणम जीवों एवं पदाथों में एक ही परमात्मा का दशम न करते हैं । गां धी का पाररतंत्र मनोतवज्ञान गीता के दशम न से प्रभातवत था। गां धी तवचार गीता के दशवें अध्याय के बीसवें श् लोक से पुष्ट होता है तक ‘हे अजुम न : मैं समस्त जीवों के हृदयों में त्मथथत परमात्मा हँ । मैं ही समस्त जीवों का आतद, मध्य तथा अंत हँ (अहमात्मा गुडाकेश सवमभूताशयत्मथथतत:। अहमातदश् च मध्यं च भू तानामं त एवं च।।) भारतीय दशम न का मुख्य पक् ‘जीवों एवं जीने दो’ पर खड़ा है । यह सह-अत्मित्व के तवचार का समथम न है । गां धी सह-अत्मित् व के तवचार को व्यत्मि, जीव-जं तु, वनस्पतत एवं भौततक पदाथों के संरक्ण एवं Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


डा. तमतथलेश कुमार & छतवनाथ यादव

(Pg. 11673-11680)

11675

संवद्वम न तक स्वीकारते हैं । मानव-प्रकृतत का परस्पर संबंध ही मानव-प्रकृतत के तवकास का मौतलक तसर्द्ां त रहा के मनोतवज्ञान को दु तनया के अने क दे शों एवं दशम नों में जगह तमला है , भले ही उसका शात्मिक ढाचा तभन् नता पूणम रहा हो। सह-अत्मित्व की संकल् पना को जापान में ‘क्योसेई’, चीन में ‘तजयाकंग’, दतक्ण अफ्रीका में ‘अबन् टु’, एवं भारतीय दशम न में ‘वसुधैव कुटुं बकम’ कहा गया है (स्कोलीमोवस्की : 1990, पृ.98)। गां धी के पाररतंत्र -=आध्याि से संबंतधत तवचार चार आयामी तदखता है । ये चार आयाम पाररतंत्र, मानव, मानवीय मनोतवज्ञान एवं अध्यात्म है । तकसी भी दे श अथवा समाज के पाररतंत्र-आध्याि के ये चार प्रमुख तत्व आवश् यक हैं । इनमें संतुलन का होना पाररतंत्र -आध्याि के संतुलन को इं तगत करता है । इनमें खास बात यह है तक अध्यात्म का आयाम शे ष तीनों आयामों पाररतंत्र, मानव एवं मनोतवज्ञान से अतधक तवशद् एवं सावमभौतमक है । पारितंत्र -आध्यात्म असंतुलन पाररतंत्र के प्रतत तवश् व मानव समाज की भावना तनरं तर तवचलन के तरफ बढ रही है। प्रकृतत एवं व्यत्मि के बीच माता एवं तपता का संबंध आज सेवक एवं स्वामी का बन गया है । प्रकृतत के प्रतत यह तनदम यता मनुष्य के ही नाश का कारण बन रही है। गां धी प्रकृतत के प्रतत इस तनदम यता के पीछे तकनीकी एवं आधुतनक सभ् यता के पागलपन को कारण मानते हैं । ‘आज मनु ष्य पूरी तरह तकनीकी का दास बन गया है । दासता मनुष्य के मनु ष्यता को खत्म कर दी है तजसके कारण मानव की सृजनशीलता एवं अध्यात्मिक उन् नतत अवरूर्द् हो गई है (पॉल : 1990, पृ.16-33)। तवकास का तात्पयम वस्तुओं एवं उपभोग की ज् यादाती नही है । यही सोच ने प्रकृतत के प्रतत मनु ष्य के व्यवहार को आसुरी बना तदया है । गां धी पयाम वरण के प्रतत समाज के तवचतलत भाव के तलए राजनीतत को तजम्मेदार मानते हैं ‘राजनीतत से धमम को पृथक करके राज् य तकस प्रकार नै ततकतापूणम एवं संतुतलत तनणमय ले सकता है ; सत्य के प्रतत मे री भत्मि ने मु झे राजनीतत के क्े त्र में ला खड़ा तकया है और मैं तबना तकसी तहचक के तकंतु परम तवनम्रता के साथ कहना चाहता हँ तक जो लोग यह कहते है तक धमम की राजनीतत से कोई वास्ता नहीं है , वे धमम का अथम नहीं जानते’ (आत्मकथा, पृ; 320-371) । युर्द् का मनोतवज्ञान प्राकृततक पाररतंत्र एवं सामातजक पाररतंत्र के तलए बड़ा खतरा है । इस खतरे के पीछे आसूरी सभ् यता खड़ी है जो पूरी दु तनया के मानतसकता को प्रकृतत तवरोधी बना तदया है। युर्द् का तवज्ञान तवशु र्द् तानाशाही की ओर जब तक अतहं सा का तवज्ञान शुर्द् लोकतंत्र के तरफ ले जाता है । (हररजन, 15 अक्टू बर, 1936; पृ. 290)।

Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


डा. तमतथलेश कुमार & छतवनाथ यादव

(Pg. 11673-11680)

11676

पारितंत्र संपोषणीय ष्टिकास एिं सिोदय गां धी जॉन रत्मिन के पुस्तक ‘अनटु तदस लॉस्ट’ से अत्यातधक प्रभातवत थे । तजसका उन्होंने ‘सवोदय’ के नाम से अनु वाद तकया था। गां धी सवोदय का अथम तकसी खास जातत, धमम , समु दाय का तवकास न होकर संपूणम मानवता एवं उसके जीवन से जु ड़े चराचर जगता का तवकास मानते है । गां धी तसफम आतथम क रूप से अंततम व्यत्मि के तवकास को सवोदय नहीं कहते थे बत्मि सामातजक, आतथम क, शारीररक एवं आध्यात्मिक रूप से तवकास को असली सवोदय स्वीकारते थे । गां धी के सवोदय में जाततय भे दभाव, धातमम क वैमनस्यता एवं तहं सा का कोई स्थान नही है । अतहं सा, प्रेम एवं सह अत्मित्व गां धी के पाररतंत्र दशम न (इकोसोफी) का मू ल केंद्र रहा है । सबसे प्रेम एवं अतहं सा पूणम व्यवहार करना ही मनुष्य का कतमव्य एवं सवोदय का आधार है । अपने शत्रु ओं से प्रेम करने , कोट की जरूरत पर अपना चोगा दे दे ने, बाए गाल पर तमाचा मारने पर दातहना गाल सामने कर दे ने तक तशक्ा तजस तवभूतत ने दी, तजसने यहदी और गैर-यहदी के भे द को उखाड़ फेका वह ऐसी वृतत्त को कैसे बरदाश् त करे गा, जो आदमी को इतना अहं कारी बनाती है तक वह अपने सहजीव के स्पशम से भी अपने -आपको नापाक हुआ माने (गां . वा. खं ड-1, पृ. 168)। पाररतंत्र के अंतगमत प्राकृततक सामातजक, राजनै ततक एवं आध्यात्मिक सभी पक्ों का समावेश होता है । गांधी की शाकाहाि दृष्टि एिं पारितंत्र अतहं सा की गां धीवादी दृति जो शाकाहार एवं सुकमम से जु ड़ी हुई है। यह पूरी तरह संपूणम जीवों को आध्यात्मिक दृति से जुड़ी हुई मानती है , सभी जीवों में तदव्यता का दशमन करती है । प्रत्येक व्यत्मि इस भाव का अनु भव करते है तक ‘जीवंत पृथ्वी का अतधकार है तक वहाँ जीवन कायम रहे , और यह अतधकार प्राथतमक रूप से संपोषणीय तवकास का तकम प्रदान करता है (कोठारी :1990, पृ. 32) जगत के जीतवत एवं आजीतवत वस्तुओं में एक ही परमात्मा का दशम न करना अथवा खु द के आत्मा का तववतमरूप स्वीकारना अध्यात्म के तरफ मनोवैज्ञातनक रूप में बढना है । योग बाह्य पदाथों (सम् भूतत) में एक ही सूक्​्म आत्म (असम् भूतत) का दशमन प्रदान करता है । जो लोग खु द को योग के द्वारा साधते हैं वे सभी में खु द की आत्मा का दशम न करते हैं , सवमत्र वे समान तत्व का दशम न करते हैं (गां धी : 1926, पृ.23, तसंह : 2013, पृ. 243)। प्रकृतत के प्रतत सोच में बदलाव से अपने जीवन में भी बदलाव होता है । ‘जब हम पृथ्वी की दे खरे ख करते हैं तो हम खु द ही अपनी दे ख रे ख करते हैं (रोस्टन : 1983 पृ. 181) । गां धी का पाररतंत्र- मनोतवज्ञान प्रकृतत के आध्यात्मिक रूप में तवश् वास करता है तो प्रकृतत के तवध्वंस से बचने एवं उसके संवद्वम न के तलए आध्यात्म एवं धमम महत्वपूणम स्थान दे ता है । हमारे अत्मित्व के संघषम की यात्रा यतद धातमम क रही है तो इलाज भी धातमम क तरीके से संभव होगा। जबतक हमने इसे हाँ या नहीं तक सीतमत कर तदया है। आवश् यकता हमें पुन: तवचार करने की है तक तकस प्रकार हम अपने प्रकृतत एवं भाग्य का अनु संक्ण कर सकते हैं (व्हाइट : 1967, Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


डा. तमतथलेश कुमार & छतवनाथ यादव

(Pg. 11673-11680)

11677

पृ.1207)। गां धी मां साहार को इसतलए भी तनतषर्द् मानते थे तक इसका प्रभाव शारीररक स्तर के साथ-साथ वैचाररक एवं भावनात्मक स्तर पर भी पड़ता है। गांधी का पारितंत्र अध् यात्म एिं स्िष्टिकास गां धी के तवचार व्यत्मि एवं समति के मध्य अंतर को खत्म करते हुए व्यत्मि में समति एवं समति में व्यत्मि के चेतना को बढाने वाले थे । गां धी के संपूणम तत्व दशम न जै से अतहं सा, सत्य, शाकाहार या सुकमम अत्मखल तवश् व को एक वृहद पाररतंत्र स्वीकारते हुए उसमें तदव्य जीवन या तवश् वात्मा के भाव को प्रक्े तपत करते हैं । गां धी के दृति में तवश् व पाररतंत्र की सभी घटनाएं चाहे जै तवक हो या अजै तवक अपने आप में समान महत्व रखती हैं और सभी घटनाएं तवश् व पाररतंत्र के तवकास एवं संचालन में अहम भू तमका तनभाती हैं । इसतलए तकसी व्यत्मि को ब्रम्हाण्ड के तकसी भी चीज को अचेतन एवं तुक्​्य समझकर उसके साथ बुरा या तहं सा पूणम व्यवहार नहीं करना चातहए। गां धी कहते है तक ‘‘जो कोई भी अतहं सा में तवश् वास करता है वह ऐसा व्यवसाय चुनता है तजसमें कम से कम तहं सा होने की संभावना हो (तसंह :2007, पृ. 136)। गां धी के दृति में जो व्यत्मि अतहं सा का व्यवहार करता है वही सच्चे अथम में मनुष्य बनने की शतम को पूरा करता है। गां धी एक प्रयोग धमी व्यत्मि थे उन् होंने अतहं सा की संकल् पना को अपने जीवन में पूरी तरह उतारा। उनकी अतहं सा की अवधारणा जै न धमम , भारतीय भौतगक पर्द्तत एवं ईसाइ धमम से प्रभातवत थी। अतहं सा ईश् वर या परम आनं द तक पहुँ चने का साधन है तजसे आध्यात्मिक अनु शासन एवं उन् नतत के द्वारा ही पाया जा सकता है । भौततक एवं सामातजक दोनों पाररतंत्र के तवकास एवं अनु रंक्ण के तलए अतहं सा परमशस्त्र है । गां धी सामातजक व्यवस्था को धमम से संचातलत करने की बात करते थे । उनकी दृति में धमम का अथम या सुकमम यातन सच्चा कमम ही समाज में असली खु शहाली ला सकता है । यह सच्चा कमम समाज का हर व्यत्मि तब करे गा, जब वह सत्य अतहं सा, अस्तेय, अपररग्रह एवं ब्रम् हचयम का पालन करे गा। इस तरह से गां धी अपने पाररतंत्र अध्यात्मकी अवधारणा में ‘आत्म-साक्ात्कार’ आचरण की शु र्द्ता, आध्यात्मिक जीवन के प्रतत तनष् ठा तथा सामातजक व्यवस्था पर जोर दे ते हैं (हैं ग :2006, पृ. 47). गां धी की अध्यात्मिक दृति पाररतंत्र के पररप्रेक् में वैज्ञातनक थी। भौततक वस्तुओं के प्रतत लालच भावना को कम करके ही संपोषणीय तवकास को एक तरफ पाया जा सकता है तो दू सरी तरफ आत्म साक्ात्कार तकया जा सकता है । गां धी मानवीय मू ल्यों को आत्म साक्ात्कार में अहम स्थान दे ते हैं । ये मानवीय मू ल्य व्यत्मि जीवन के केंद्र होते हैं । इनका तवकास पाररतंत्र, समाज, अथम व्यवस्था एवं अध्यात्म के आपसी अंततिया के प्रततफल स्वरूप होता है । गां धी ने कहा तक ‘‘मैं कतई तवश् वास नही कर सकता तक व्यत्मि बाह्य चीजों से परे शान रहते हुए अध्यात्म की ऊँचाईयों को प्राप्त कर सके। मैं अद्वै त में तवश् वास करता हँ , मैं मनु ष्य की आवश् यकता एकता में तवश् वास करता हँ और यह चीज सभी पदाथों एवं जीवों के जीवन में लागू होती है। Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


डा. तमतथलेश कुमार & छतवनाथ यादव

(Pg. 11673-11680)

11678

इसतलए मैं तवश् वास करता हँ तक यतद एक व्यत्मि अध्यात्म को प्राप्त करता है तो वह पूरा संसार को प्राप्त करता है और यतद एक व्यत्मि इसमें असफल होता है तो पूरे संसार के संदभम में असफल होता है (यंग इं तडया, 4.12.1924 : 398)। ऐसे में व्यत्मि के तलए आवश् यक हो जाता है तक वह आत्म-साक्ात्कार के तलए आध्यात्मिक जीवन जीते हुए अथम व्यवस्था, समाज एवं पाररतंत्र में संतुलन बनाए। पारितंत्र आध्यात्म संतुलन एिं स्िदे शी गां धी पाश् चात्य सभ् यता का तवरोध एवं स्वदे शी का समथमन करते हैं । उनकी दृति स्वदे शी को ले कर पूरी तरह व्यापक थी। मात्र राजनैततक आजादी का रूप स्वदे शी वे नहीं मानते थे । उनके दृति में राष् टर एवं समाज का आतथम क, सामातजक, आध्यात्मिक, शै तक्क एवं स्वास्थ्य से संबंतधत पक् भी स्वदे शी होना चातहए। जो इस बात का पररचायक है तक तवतशष् ट पाररतंत्र की संभावना मनुष्य को जो प्राप्त हुई है उसके मयाम दाओं को वगैर तोड़े अपना तवकास करना चातहए। गां धी स्वदे शी को ‘‘कानूनों का कानू न कहते है ’’ (नवजीवन:2007, पृ.35)। यह सावमभौतमक तनयम है जो अपने आप सहज रूप में कायम करता है । इस तनयम के द्वारा प्रकृतत एवं पाररतंत्र का वास्ततवक रूप संरतक्त होता है । गां धी स्वदे शी को प्रकृतत जतनत अध्यात्मिकता बताते है जो मानवीय चेतना की शु त्मर्द् एवं तवकास का आधार है । वे स्वदे शी को श्रीमद् भागवद गीता के दृति से भी जायज ठहराते हुए कहते है तक ‘‘यही उतचत है तक अपने धमम का पालन करते हुए मरे । दु सरे के धमम का अनु सरण करना खतरे से भरा हुआ है ।’’(नवजीवन :2007, पृ. 36)। स्वदे शी का पालन करने वाला सच्चा व्यत्मि होता है जो जीवन के आं तररक एवं बाह्य दोनों पाररतंत्र का संतुलन कायम करने में सक्म बन पाता है । गां धी स्वदे शी को पररभातषत करते हुए कहते है तक ‘‘हमारी आत्मा सदै व हमें अपने तात्कातलक भोग करने की प्रकृतत को दू रस्थ संसाधनों के प्रयोग के संदभम में रोकती है ’’ (प्रभु & रॉय ; 1996, पृ. 4-10)। गां धी बड़े पैमाने पर बढ रहे औद्योतगकरण का तवरोध तकया। उनका मानना था तक यह औद्योतगक व्यवस्था प्राकृततक एवं मानवीय दोनों प्रकार के शोषण को बढावा दे ती है । वे वृहद उद्योगों के जगह लघु कुतटर उद्योगों के तहमायती थे । कुतटर उद्योग असली मायने में संपोषणीय तवकास का मागम प्रशस्त कर सकते हैं । इसतलए गां धी स्थानीय उत्पादन, उपभोग एवं तवयोजन को प्रोत्साहन दे ते थे। आतथम क असमानता के बारे में गां धी का दृतिकोण मध्यममागी था। वे मानते थे तक समान आतथम क तवतरण आतथम क आजादी नहीं है । बत्मि हर व्यत्मि को पयाम प्त भोजन, कपड़ा एवं मकान की व्यवस्था होनी चातहए। आतथम क असमानता को समान करने में गां धी अतहंसा को प्रमु ख माध्यम मानते हैं । गां धी का तवचार था तक यूरोपीय सभ् यता के साम्राज् यवादी दानवीय चंगुल से यतद तवश् व को बचना है तो स्वदे शी ही एक मात्र रास्ता है । गां धी तशक्ा के संदभम में भी स्वेदशी का पालन करने की बात करते थे । उनके दृति में तशक्ा का उद्दे श्य एवं प्रकृतत खु द के Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


डा. तमतथलेश कुमार & छतवनाथ यादव

(Pg. 11673-11680)

11679

तमट्टी से उपजी संस्कृतत एवं संभावना के अनु सार होना चातहए। तशक्ा ऐसी हो तक व्यत्मि अपने प्राकृततक एवं सामातजक दोनों प्रकार के पाररतंत्र से समन्वय बैठा सके। ‘‘तशक्ा प्रेम का भाव तवकतसत करे । जहाँ प्रेम है वही जीवन है , घृणा तो तवध्वंश को जन्म दे ती है ’’ (यंग इं तडया, 5 मई, 1920)। पारितंत्र मनोष्टिज्ञान असंतुलन एिं गांधीिादी समाधान प्रारूप दु तनया में वैतिक तापन, तनवमनीकरण, सूखा भू स्खलन, एवं जलप्रदू षण मानवीय मत्मिष् क के प्रदू षण का ही प्रततफल है । यह मानव के पाररतंत्र के प्रतत तवचतलत भावना एवं व्यवहार का पररणाम है । बेतहाशा मानवीय लोभ प्रकृतत के प्रतत बढने के कारण पृथ्वी की तवतवधता खत्म होती जा रही है । इस संदभम में गां धी ने पूरी आस्था के साथ मानवीय नै ततक आचरण को श्रेष्ठ माना एवं तवश् वास जताया तक पाररतंत्र संकट का तनदान मानवीय नै ततक मूल्यों के तवकास के द्वारा ही तकया जा सकता है । इसके तलए लोभ को खत्म करना होगा। लोभ ही संपूणम बीमाररयों का प्रमु ख कारण है । वे तलखते हैं तक ‘‘तवश् व में सभी की जरूरत को पूरा करने के तलए पयाम प्त संसाधन है पर एक भी व्यत्मि के लोभ को पूरा करने के तलए पयाम प्त नहीं है ’’ (गां . वा. खण्ड1, पृ.150)। गां धी पाररतंत्र की रक्ा एवं वास्ततवक मानव तवकास के तलए ग्रामस्वराज् य की स्थापना का तवचार तदया। उनका मानना था तक प्रत्येक गां व को अपने -आप में आत्मतनभम र होना चातहए। गां व अपने आप में सूक्​्म अथम तंत्र का केंद्र होगा। वृहद अथम तंत्र की प्रणाली लागू नही होगी। इसी प्रकार की मानवीय दृतिकोण ही पाररतंत्र की सच्चे रूप में संरक्ण कर सकता है । उन् होंने अपने ग्राम स्वराज् यके प्रारूप में नीचे से ऊपर के तरफ तवकास की बात की थी। उनका मानना था तक प्रत्येक ग्राम को आत्मतनभमर होना होगा। यतद वे अपने आप में शत्मिशाली होगे तो वे शहर से मोलभाव करने में सक्म होगे। यह इसतलए आवश् यक है तक चीजे नीचे से ऊपर के तरफ चले यही अच्छा होगा’’ (तवतलमोररया: 2004, पृ.163)। इस तरह से अध्यात्म, नै ततकता एवं पाररतंत्र के मध्य गहरा संबंध है जो आत्मसाक्ात्कार में मदद कर सकता है । सािांश उपरोक्त तथ् यों के आधार पर स्पष् ट होता है तक गां धी के पाररतंत्र मनोवैज्ञातनक तवचार अध्यात्मिक नै ततकता से ओत-प्रोत थे । वे मानते थे तक मनुष्य को सोचना चातहए तक वह प्रकृतत का ही तहस्सा है इससे पृथक नहीं। पृथ्वी पर जो कुछ भी तवद्यमान है वह मानवीय जरूरतों को पूरा करने के तलए है मानवीय लोभ को पूरा करने के तलए नहीं। मनु ष्य को तसफम आपस में ही नहीं बत्मि अन् य जीतवत जीवों के प्रतत तकसी भी प्रकार का तहं सा नहीं करना चातहए। इस तरह दे खा जाए तो ‘‘गां धी अन् य गहन पाररतंत्रतवदों के तुलना में ज् यादा बड़े गहन पाररतंत्र तवद् लगते है ’’ (जै कोबसन : 2005, पृ. 1150)। आज के औद्योतगक, नगरीकृत, उपभोगतावादी कृततम समाज में गां धी इसतलए प्रासंतगक हो जाते हैं तक तजस प्रकार पयाम वरण संकट बढ रहा Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


डा. तमतथलेश कुमार & छतवनाथ यादव

(Pg. 11673-11680)

11680

है उससे तनपटने का बेहतर मागम गां धी दृति में ही तदख पड़ती है । सत्य एवं अतहं सा की गां धीवादी अवधारणा ही वह सावमभौतमक साधन है जो पाररतंत्र असंतुलन की दृति को बेहतर बना सकती है । संदर्य सूची M.K. Gandhi from yevada mandir (Ahmedabad : Navjivan, 2007) P. 35. R. K. Prabhu and V. R. Rao (ed) the mind of mahatma Gandhi (Ahmedabad : Navjivan, 1996) The Voice of the earth : A Exploration of Ecoprychology (2001) : Raszak Theodore Phanes Press. New York. M. K. Gandhi 1927, An Autobiography or the Story of my Experiments with truth. Ahmadabad : Navjivan Publishing House. M. K. Gandhi 1927, M. K. Gandhi Interprets the Bhagavad Gita. New Delhi : Orient-Vision. M. K. Gandhi 1928, Satygraha in South Africa. Ahmadabad : Navjivan Publishing House. M. K. Gandhi 1958-1984, The Collected Works of Mahatma Gandhi, 100 Vols. New Delhi : Publication Division, Ministry of Information and Broadcasting, Govt. of India. Referred in the essay as: W/MG. vol. p. M. K. Gandhi 1959, My Socialism (Compiled by R. K. Prabhu). Ahmadabad : Navjivan Publishing House. M. K. Gandhi 1990 (1909) Hind Swaraj and othe Writings. Ed. A. J. Parel. Combridge : Combridge University Press. Adams, Ian and Dyson, R. W. (eds.) 2003 Mohandas Gandhi in. Fifty major Political Thinkers, 196$199. Routledge key Guides scies. Landon & New York : Routledge. Bilimoria Purushottama 2004, mahatma Gandhi 1869-1948. In Joy A Palmer, ed. Fifty key Thinkers on the Environment, 160-167. London : Routledge. Dwivedi. O. P. 1990 Satyagraha for conservation : awakening the spirit of Hinduism. In J. R. Engel and J. G. Engel (eds.) Ethics of Environment and Development, 201-212. Tucson : University of Arizona Press. Jacobsen Knut A. 2005, Arne Naess. In Bron Taylor (ed.) The Encyclopedia of Religion and Nature 11491150. New York. Continuum Press. Khoshoo, Triloki Natha 1997, Gandhian Environmentalism : An Unfinished Task. IASSI Quarterly, 16 (1). July-Sept. Web : http://www.mkgandhi.org/articles_task.htm. Mathur, J. S. and Mathur A. S. (eds.) 1962. Economic Thought of Mahatma Gandhi Allahabad : Chaitanya Publishing House. Mc Daniet, Jay 2007. “Ecotheology and World Religions.” In Laurel Keams and Catherine Keller (eds.) Ecospirit : Religions and Philosophies for the Earth, 21-44 and notes 546-547. New York : Fordham University Press. Naess. Arne 1965. Gandhi and the Nuclear Age. Totowa. N. J. Bedminister Press. Naess. Arne 1989. Ecology, Community and Lifestyle : outline of on Ecosophy. (Trans. David Rothenberg). Combridge : Combridge University Press.

Copyright © 2021, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


Turn static files into dynamic content formats.

Create a flipbook
PARITANTRA-ADHYAYANTAM SAMAJ KARY PRARUP KE AAYAM KI GANDHI DRUSHTI by Scholarly Research Journal"s - Issuu