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SWAMI VIVEKANAND KE SAMAJIK AUR SHAIKSHIK VICHARDHARA KI VERTMAN PRASANGIKTA KA EK SAMALOCHNATMAK AD

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Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies, Online ISSN 2278-8808, SJIF 2021 = 7.380, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFEREED JOURNAL, NOV-DEC, 2022, VOL- 10/74

स्वामी वि​िे कानं द के सामाविक और शैविक विचारधारा की िर्त मान प्रासं विकर्ा का एक समालोचनात्मक अध्ययन सोमा पाल (सहायक प्राध्यापिका) श्री रामकृष्ण शारदा आश्रम, पशक्षक प्रपशक्षण महापिद्यालय, रपि​िंद्र िथ,

हजारीबाग,झारखिंड 825301

Paper Received On: 25 DECEMBER 2022 Peer Reviewed On: 31 DECEMBER 2022 Published On: 01 JANUARY 2023 Abstract स्वामी पि​िे कानिंद भारतीय पशक्षा दशशन और ज्ञान चेतना के िह नक्षत्र हैं जो ना केिल भारत िर बल्कि िूरी दु पनया में अिने अद् भु त ज्ञान की िृष्ठभू पम से िररपचत कराया उन्ोिंने भारत की गौराल्कित िरिं िरा को कायम करते हुए समय-समय िर अिने ज्ञानात्मक पिचारधारा को सिं िूणश पिश्व के सामने लाने का प्रयास पकया, और उनके पिचारोिं से ना केिल सनातन सिं स्कृपत बल्कि सिं िूणश पिश्व में भारतीय सिं स्कृपत का एक नया प्रचार प्रसार अिने स्तर से करने का कायश पकया l स्वामी पि​िे कानिंद जी ने भारतीय दशशन को जीि​िं त एि​िं व्यिहाररक बनाने के पलए हर स्तर िर अिने पि​िे क और सकारात्मक पिचारधारा को आगे लाने का प्रयास पकया l आज के दौर में जब सिं िूणश पिश्व भू मिंडलीकरण,उदारीकरण, पहिं सा और अशािं त जैसे िातािरण में चल रहा है l समाज में कटू ता, आपहिं सा,धापमशक,कट्टरिाद, क्षे त्रिाद, सिं प्रदायिाद,भाषािाद इत्यापद तरह के पि​िादोिं से चल रहा है l ऐसी ल्कथथपत में हमें भारतीय सिं स्कृपत के एक ऐसे मनीषी का पचिंतन मनन िर बल दे ना होगा, जो शायद इस अराजकता के दौर में भी शािं पत की बात करता हो, और ऐसे में स्वामी पि​िे कानिंद जैसा दू सरा कोई दाशशपनक व्यल्कित्व जो धमश अध्यात्म पशक्षा समाज तथा व्यल्कित्व के समस्त िहलुओिं को अिने में समेट कर एक सिं िूणश समाज की िररकल्पना करता हो l उसके पिचारधारा में आत्म पचिंतन, िे द, गीता तथा धमश पकसी के जीिन का आधार मानते हुए उसके महत्व को स्पष्ट पकया गया हो तथा सिं िूणश जनमानस को इसका अनुसरण करने के पलए िै चाररक प्रेरणा का कारण बनता हो ऐसे सिश भोपमक व्यल्कित्व को इस शोध ित्र में व्याख्यापित करने का प्रयास पकया जा सकता है मु ख्य शब्द: अराजकता, िै चाररक, सिं स्कृपत, िै चाररक सिं स्कृपत, सिंस्कृपत, सािश भौपमक, व्यल्कित्व भूमिंडलीकरण व्यािहाररक, अध्यात्म,

Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com भारत में भू मिंडलीकरण के इस दौर में यह बदलाि जबपक सिंिूणश पिश्व पनजीकरण, उदारीकरण, पहिं सा तथा अशािं पत क्षे त्रिाद, सिंप्रदायिाद तथा धमश की िराकाष्ठा से जू झ रहा है l कट्टरिाद िैमनस्य का बोलबाला हो ऐसे में भारतीय सिंस्कृपत में पकसी आध्याल्कत्मक पिचारधारा के िोशक के रूि में अिनी िहचान बनाने िाले पकसी एक व्यल्कि का चुनाि करना िडे गा पजसने िूरी पजिं दगी अिने पिचारोिं धमश की पसल्कियोिं तथा एक पिकासात्मक स्वरूि को आगे ले जाने का कायश करने िाले व्यल्कित्व का चयन करना ही होगा l भारत में समय-समय िर अने क दाशश पनक तथा सामापजक पिचार को ने अिने पिचारोिं केबल िर सिंिूणश समाज में एक निीन चेतना का सिंचार करने का कायश पकया l पजसमें रामकृष्ण िरमहिं स, स्वामी दयानिं द सरस्वती जैसे मनीपषयोिं ने एक सुधारात्मक युग का सूत्रिात पकया l इसी िरिं िरा को आगे बढाते हुए स्वामी पि​िेकानिं द का नाम भी एक युग दृष्टा के रूि में जाना जाता है l इन्ोिंने समय और िररल्कथथपतयोिं को समझते हुए भारत में नि पनमाश ण तथा राष्टरीय चेतना जागृत करने का एक प्रयास पकया इसमें उन्ोिंने भारतीय दशशन को जीि​िंत और व्यािहाररक रूि में प्रचाररत करने के साथ-साथ सामापजक सुधार की चेतना को भी आगे बढाने का पनश्चय पकया l िह युग अिंग्रेजी शासन का था एक तरह से भारतीय मानपसक चेतना को दबाकर रखा गया था l स्वामी पि​िेकानिं द जी ने अिने नि Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Interdisciplinary Studies


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