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GIJUBHAI KA BAL SHIKSHA DARSHAN

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Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language, Online ISSN 2348-3083, SJ IMPACT FACTOR 2021: 7.278, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFEREED JOURNAL, DEC-JAN, 2022, VOL-10/49 गिजुभाई का बाल गिक्षा दिशन ब्रम्हा नं द गिश्र1 & गदवाकर ग ंह2, Ph. D.

शोध छात्र, शशक्षा शिभाग, बरकतउल्लाह शिश्वशिद्यालय, भोपाल, (म. प्र.)

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सह प्रोफेसर, क्राइस्ट कॉलेज, भोपाल, (म. प्र.)

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Paper Received On: 25 JAN 2022 Peer Reviewed On: 31 JAN 2022 Published On: 1 FEB 2022 Abstract प्रस्तु त शोध पत्र में शगजुभाई बधेका के शैशक्षक दशशन का शिस्तृ त िर्श न शकया गया है । उन्ो​ोंने आजीिन बच्ो​ों के मनोभािो​ों को समझने ि भयमुक्त िातािरर् में शशक्षा दे ने का समर्शन शकया। िे ितश मान शशक्षा प्रर्ाली से अत्योंत दु खी र्े। उनका अनुभि बहुत ही कटु र्ा, बचपन में शमली अनेक यातनाओों का उनके जीिन पर इतना अशधक प्रभाि पड़ा शक िह िकालत छोड़कर पूरी तरह से बाल शशक्षा में ही रम गए। उन्ो​ोंने अपने शशष्ो​ों से कहा शक “मेरे छात्रो​ों को मेरा आदे श है शक घोड़ो​ों के अस्तबल जैसी धू ल भरी इन शालाओों को जमीोंदोह कर दो। मार-पीट और भय शदखाने िाले कत्लखाने की नीोंि को बारूद से उड़ा दो, इन्ें ने स्तनाबू त कर दो”। इस प्रकार शगजुभाई बालको​ों की स्वतन्त्रता के प्रबल समर्शक र्े। उनका शिचार र्ा शक बालको​ों को स्वतों त्र छोड़कर ही उन्ें अच्छी तरह से शशशक्षत शकया जा सकता है । िह बच्ो​ों को शकसी भी प्रकार का दों ड दे ने के खखलाफ र्े और चाहते र्े शक सभी लोग बच्ो​ों से प्रेम पूिशक व्यिहार करें । शकसी को भी अपनी इच्छो​ों को बच्ो​ों पर लादने का कोई अशधकार नहीों है और यशद शफर भी ऐसा शकया गया तो उसके अत्यशधक घातक पररर्ाम आ सकते हैं । बच्ो​ों की प्रयोगशीलता एिों सामर्थ्श क्षमता में उनका दृढ़ शिश्वास र्ा, उनका मानना र्ा शक बच्ो​ों का अिलोकन करते -करते ही उन्ें आत्मािलोकन का अिसर शमला है । शगजुभाई का कहना र्ा शक “प्रशतपल मैं नन्ें बालको​ों में बसने िाली महान आत्मा के दशशन करता हूँ । यह दशशन मेरे भीतर एक प्रेरर्ा जगा रहा है शक बालको​ों के अशधकारो​ों की स्र्ापना करने के शलए ही मेरा जन्म हुआ है और यही काम करते -करते मैं शजऊूँ और यही काम करते -करते मेरी मृत्यु भी हो।” इस शोध पत्र में शगजुभाई की प्रमुख रचनाएों , बाल साशहत्य, बाल मनोशिज्ञान, बालको​ों के प्रशत माता–शपता के कतश व्य पर प्रकाश डाला गया है ।

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प्रस्तावना दे श के महान बाल शशक्षाशास्त्री शगजुभाई बधेका का जन्म 15 निोंबर 1885 को गुजरात राज्य के शचत्तल, सौराष्ट्र में हुआ र्ा। इनके शपता का नाम भगिान दास जी बधेका एिों माता का नाम काशीबा दे िी र्ा। शगजु भाई के माता- शपता अत्यशधक धाशमश क शिचार के र्े , शजसका स्पष्ट् प्रभाि शगजु भाई पर भी पड़ा। पाूँ च िर्श की आयु में ही शगजु भाई पाठशाला जाने लगे, िहाों उन्ो​ोंने दे खा शक सभी बच्ो​ों में मार-पीट, डाों ट- डपट एिों भय का साम्राज्य है । यह सब दे ख कर िह भी डर गए और इसी को याद करके बाद में िह अपने प्रार्शमक शिद्यालय के दृश्ो​ों को शब्ो​ों का रूप शदया। 1920 में इन्ो​ोंने बाल-मों शदर स्र्ाशपत कर बाल शशक्षा के क्षे त्र में कायश करना प्रारम्भ शकया और इस क्षे त्र में अने क नए-नए प्रयोग शकए। शगजु भाई पर माररया माों टेसरी का अत्यशधक प्रभाि पड़ा और इन्ो​ोंने Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


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माों टेसरी शशक्षा पद्धशत का गहन अध्ययन शकया और पूर्शतः आत्मसात करने के बाद उनके शसद्धाों तो​ों को भारतीय पररिेश ि सोंदभों में अशधकाशधक प्रभािी बनाया। भािनगर की ‘दशक्षर्ामू शतश बाल-मों शदर’ शगजु भाई की साधना स्र्ली एिों शै क्षशर्क प्रयोगशाला र्ी। यहीों पर 1916 से 1936 के बीच िे बाल-शशक्षा के शिशिध आयामो​ों पर शचोंतनमनन एिों प्रयोग करते रहे । गिजुभाई की रचनाएँ शगजु भाई बधेका ने बहुत ही अल्प समय में एक ऐसे शै शक्षक समाज का शनमाश र् कर शदया शक लोग उनके द्वारा शदये गए शिचारधारा को अपनाए शबना नहीों रह सकते। शगजु भाई ने अपना सम्पू र्श जीिन बाल शशक्षा के शलए समशपशत कर शदया। िह शशक्षा से सोंबोंशधत जो भी प्रयोग अपने बच्ो​ों पर करते उसे शलशपबद्ध भी शकया करते र्े। इसी प्रकार से िह धीरे -धीरे शशक्षा सोंबोंधी साशहत्यो​ों का ले खन शकया। िह एक प्रयोगिीर शशक्षक होने के सार्-सार् बाल साशहत्य के प्रर्ेता भी र्े । उन्ो​ोंने गुजराती भार्ा में अनेक बाल साशहत्य शलखकर सम्पूर्श गुजरात के बच्ो​ों को स्वाध्याय के शलए प्रेररत शकया। शगजु भाई के बाल-शशक्षर् सोंबोंधी शिचार उनकी प्रमुख पुस्तको​ों ‘शदिास्वप्न’,‘माों टेसरी पद्धशत’, ‘कर्ाकहानी’,‘प्रार्शमक शिद्यालय में भार्ा शशक्षा’,‘ऐसे हो​ों शशक्षक’, प्रार्शमक शिद्यालय में व्यािसाशयक शशक्षा’,‘शशक्षको​ों से’,‘माता-शपता की मार्ापच्ी’,‘माता-शपता से’,‘माूँ -बाप बनना कशठन है ’,‘माता-शपता के प्रश्न’,‘बाल-शशक्षर् जै सा मैं ने समझा’,‘चलते-शफरते शशक्षा’ आशद अने क रचनाओों को शलशपबद्ध शकया। शगजु भाई ने अपने इन रचनाओों के द्वारा माता-शपता के कतशव्य, बच्ो​ों की मशहमा, माता-शपता के दाशयत्व, उनकी शचोंता, उनके प्रश्न तर्ा उनके अनु भिो​ों पर शिस्तृ त प्रकाश डाला। अपनी ले खनी के द्वारा इस महापुरुर् ने सभी के कतशव्यो​ों को भी शिभाशजत शकया और बच्ो​ों ि उनके अशभभािको​ों के मनोशिज्ञान को समझ कर सभी के शलए सुझाि भी बताने का प्रयत्न गकया। शगजु भाई के शै शक्षक शिचारो​ों पर सिाश शधक प्रभाि माररया माों टेसरी की माों टेसरी पद्धशत का पड़ा। शगजुभाई ने अने क पुस्तको​ों का ले खन शकया और अपनी ले खनी से समाज को नई शिचारधारा से पररचय कराया। इनकी एक पुस्तक ‘प्रार्शमक शिद्यालय में भार्ा शशक्षा’ है शजसमें बालको​ों के शशक्षर् शिशधयो​ों जै से- िाचन पद्धशत, अनु करर् पद्धशत, स्मरर् पद्धशत, खे ल पद्धशत, प्रदशश न पद्धशत जै सी अने क शिशधयो​ों का िर्शन शकया गया है । ‘बालशशक्षर् जै सा मैंने समझा’ नामक पुस्तक में शगजु भाई में माों टेसरी पद्धशत के प्रभाि को स्पष्ट् रूप से दे खा ि अनु भि शकया जा सकता है । ‘शशक्षको​ों से’ ि ‘ऐसे हो​ों शशक्षक’ जै सी पुस्तको​ों से शशक्षको​ों के एक शिराट रूप को शदखाने और उनके दाशयत्व को शिशभन्न रूपो​ों में समझाने का प्रयास शकया गया है । गिजुभाई व बाल

ागहत्य

समाज में समय-समय पर अने क महापुरुर्ो​ों ने जन्म शलया और अपने जीिन में समाजोपयोगी कायश करके अपनी अलग पहचान बनायी। लोक जीिन में ऐसे महापुरुर्ो​ों द्वारा बताई गयी अने क बातो​ों, शिश्वासो​ों, परम्पराओों ि अनु भिो​ों ने शजन कहाशनयो​ों ि गीतो​ों को जन्म शदया िह सभी लोगो​ों को उनकी रुशच, आयु के अनु सार आनों द और ज्ञान प्रदान करते रहते हैं । समाज में इस प्रकार के शिश्वासो​ों, परम्पराओों ि अनु भिो​ों का जब भी Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


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बदलाि हुआ हमे शा एक नई रचना का जन्म हुआ। इस तरह कहाशनयो​ों ि गीतो​ों का बहुत शिशालकाय भोंडार तैयार होता रहा। बाल साशहत्य के क्षेत्र में शगजु भाई का महत्वपूर्श योगदान है । उन्ो​ोंने अपने ले खन से समाज के सभी िगों को शशक्षा की दृशष्ट् से प्रेररत करने का प्रयास शकया। िह अपनी बाल रचनाओों में बच्ो​ों की रुशच ि क्षमता का शिशे र् ध्यान रख, उनकी आयु ि उनके शिकास के अनु कूल बाल साशहत्य का ले खन शकया। उनके लेखन करने के पूिश बाल साशहत्य में पुरानी शैली का बोल-बाला र्ा शजससे बच्े पूरी तरह ऊब चुके र्े । शगजु भाई ने पुरातन शैली का पररत्याग कर निीन ले खन शै ली को जन्म शदया। उनका मत र्ा शक बच्ो​ों के शलए इस प्रकार के साशहत्य होने चाशहए जो बोशझल न हो​ों बखि ऐसे साशहत्य हो​ों शजनको पढ़कर बच्े स्वयों शनष्कर्श शनकाल सकें। कशिता और कहानी में इतनी शखक्त होनी चाशहए शक िह बाल मन पर स्वतः प्रभाि डाले । शगजु भाई ने इस प्रकार बच्ो​ों के मनोशिज्ञान को समझ कर उनकी रुशच ि प्रिृशत्त के अनु सार बाल साशहत्य की रचना की। बाल

ागहत्य िें बाल िनोगवज्ञान मनोशिज्ञान को समझे शबना शकसी भी साशहत्य की कल्पना भी नहीों की जा सकती। इस बात को शगजु भाई

बहुत अच्छी तरह समझते र्े । इसीशलए उन्ो​ोंने बाल साशहत्य के ले खन से पहले बच्ो​ों को बहुत करीब से समझने का प्रयास शकया और जब भी उन्ें समय शमलता िह बच्ो​ों के बीच में रहते। बच्ो​ों के मन में उठने िाले प्रश्नो​ों को नजदीक से समझ कर उसे अपने शब्ो​ों में शलशपबद्ध करने में शगजु भाई को महारर् हाशसल र्ी। बालक एक कच्े घड़े के समान होता है शजसे कुम्हार शकसी भी प्रकार का आकार दे सकता है ले शकन जब घड़ा एक बार पक जाए तो उसके रूप को पररिशतशत नहीों शकया जा सकता है। उसी प्रकार बालक भी जब बड़ा हो जाता है तो उसके स्वभाि ि आदतो​ों को पररिशतशत नहीों शकया जा सकता। जब तक बच्ा छोटा है हम उसे अच्छे सोंस्कार दे कर अच्छा इों सान बना सकते हैं या शफर बुरे सोंस्कार दे कर बुरा इों सान बना सकते हैं । अतः बच्ो​ों के शनमश ल-शनश्चल स्वभाि, उनकी रुशच, आदत, प्रिृशत्तयो​ों, अपेक्षाओों एिों पररिेश की पृष्ठभू शम को शबना समझे हम शकसी भी शदशा में मोड़ सकते हैं । उसके शलए केिल हमें बच्ो के मनोभािो​ों को समझ कर उनके सार् बच्ा बन जाना पड़े गा। तभी बच्ो​ों को हम समझ पाएों गे और उनके अोंदर अच्छे गुर्ो​ों को प्रशिष्ट् कर पाएों गे। बच्े ही दे श का भशिष् होते हैं । अतः बड़ो​ों को बच्ो​ों के करीब आकर उन्ें समझना बहुत जरूरी है इसीशलए बाल साशहत्य का लेखन करने के शलए बच्ो​ों के मनोभाि को नजदीक से समझना एक बहुत ही महत्वपूर्श अोंग है । बाल साशहत्य के अोंदर कशिता, कहानी के सार्-सार् बाल उपन्यास, बाल एकाों की, नाटक, बाल जीिनी, यात्रा िृताों त आशद अने क शिधाएूँ आती हैं । बाल साशहत्य की इन शिधाओों द्वारा हम बच्ो​ों के अोंदर नै शतक मूल्य, दे श प्रेम, प्रकृशत प्रेम, पिों त्योहारो​ों के प्रशत रुशच ि राष्ट्रीय एकता जै से गुर्ो​ों को समृ द्ध शकया जा सकता है । अतः इन सभी गुर्ो​ों के सकारात्मक शिकास के शलए एिों बालक को नागररक बनने की शदशा में अग्रसर होने के शलए औपचाररक ि अनौपचाररक रूप से बाल मनोशिज्ञान को ध्यान में रखकर बाल साशहत्य की रचना करना अशत आिश्क होता है । Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


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ंबंध िें गिजुभाई के गवचार

मानि शिकास की सभी अिस्र्ाओों में बाल्यािस्र्ा का प्रमुख स्र्ान है । बाल्यािस्र्ा में व्यखक्त के सभी प्रकार के अच्छे -बुरे गुर्ो​ों की नीोंि पड़ जाती है । शजस प्रकार एक बीज में पूर्श िृक्ष समाशहत होता है उसी प्रकार बालक में भी सम्पू र्श मनु ष् समाशहत होता है और बाल्यािस्र्ा से ही मनुष् की समस्त अिस्र्ाओों के शिकास का क्रम आगे बढ़ता है। शगजु भाई ने बालको​ों की इस महत्ता को समझा ि उन्ें अने को​ों रूपो​ों में दे खा और समय–समय पर अपने साशहत्य में स्र्ान शदया। बच्ो​ों के शलए शगजु भाई के मन में बहुत ही अशधक प्रेम, आदर ि सम्मान र्ा जो साशहत्य में अने को​ों जगह स्पष्ट् रूप से नजर आता है। जै से- बालक प्रभु की अनमोल दे न है , बालक प्रकृशत की सुोंदर से सुोंदर कृशत, मानि कुल का शिश्राम, प्रेम का पैगोंबर तर्ा समशष्ट् की प्रगशत का एक अगला कदम है , यशद परमात्मा ने कोई शनदोर् िस्तु उत्पन्न की है तो िह बालक ही है , शजसके सार् रहकर हम शनदोर्ता का अनु भि करते हैं , बालक जब खखलखखला कर हूँ सता है तो उसके मुोंह से नन्ें -नन्ें फूल झड़ते रहते हैं जो सारे दु खो​ों को शिलीन कर दे ते हैं , जाड़ो​ों की रात में जब बालक माूँ की गोद में शचपक कर सोता है तो उसकी मीठी अनु भूशत जो माूँ को होती है , िह अशद्वतीय है , बालक माूँ के प्रेम के कारर् शजों दा रहता है या माूँ बालक के शमठास के कारर् शजों दा रहती है । बच्ा भगिान का ही एक रूप माना जाता है इसशलए बच्ो​ों की पूजा भी की जाती है । शगजु भाई ने इस बात को अच्छी तरह समझा ि अपने जीिन में उतारने का भरपूर प्रयास भी शकया। यह बात शगजु भाई के उपरोक्त कर्नो​ों से स्पष्ट् होती है । शगजुभाई बच्ो​ों को बहुत ही आदर ि सम्मान से दे खते र्े । उनके मन में बच्ो​ों के प्रशत अपार श्रद्धा र्ी और समय-समय पर िह इस बात को सभी से शकसी न शकसी रूप में साझा भी करते र्े। बालकों के प्रगि िािा –गि​िा के किशव्य माूँ ही बच्े की प्रर्म शशशक्षका होती है और जब बच्ा जन्म लेता है तभी से उसका ध्यान रखती है । माताशपता ही बच्े को सिशप्रर्म समाज से पररशचत कराने का प्रयास करते हैं । शगजु भाई बच्ो​ों के समग्र शिकास के शलए माता- शपता की भू शमका को अत्योंत महत्वपूर्श मानते र्े । उनका मानना र्ा शक बच्े शदखने में छोटे जरूर होते हैं ले शकन उनकी आत्मा महान होती है । माता-शपता को बच्ो​ों का सम्मान करना चाशहए, उन्ें छोटी-छोटी बातो​ों के शलए अनािश्क रूप से रोका या टोका नहीों जाना चाशहए। उनका कहना र्ा शक – “सच्ा प्रेम न तो बालको​ों को गहने पहनाने में है , न उनको अच्छी चीजें खखलाने -शपलाने में है और न ही कीमती कपड़े पहनाने में ही है। सच्ा प्रेम तो इस बात में है शक हम उनको उनकी रुशच के काम करने दें और इन कामो​ों के शलए जरूरी अनु कूलताएों खड़ी कर दें ।” शगजु भाई के अनु सार माता-शपता के कतशव्य बहुत ही व्यापक, गोंभीर ि सोंिेदनशील हैं शक उस पर बड़े बड़े ग्रोंर् शलखे जा सकते हैं । िह माता-शपता के शलए कहते हैं शकआज का बालक कल का आदमी है , बालको​ों के मन में भी अने को​ों प्रकार के शिचार पनपते हैं और िह शबना भशिष् की शचोंता शकए अपने शिचारो​ों को साकार करने की कोशशश करता है । माता-शपता को चाशहये शक िह बच्ो​ों के मनोभाि को समझें और उसको शकसी भी प्रकार की सजा दे ने से बचें। माता-शपता को कभी भी बच्ो​ों में Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language


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प्रशतस्पधाश की भािना को नहीों शिकशसत करना चाशहए। इससे बच्े अपने मू ल स्वभाि को खो दे ते हैं और हारने का डर ि जीतने की लालसा उनके मन में हमे शा बनी रहती है। बच्े में शकसी भी प्रकार की प्रिृशत्त को जन्म दे ने के शलए माता-शपता को घर ि समाज में िैसा ही आचरर् करना चाशहए जै सा िह बच्े से अपेक्षा करते हैं । बच्ा धीरे धीरे स्वतः अपने माता-शपता को दे खकर अपने अोंदर उसी प्रकार के व्यिहार करने लगता है । इसी प्रकार से अनु करर् द्वारा धीरे -धीरे बच्ो​ों में नै शतक गुर्ो​ों का शिकास हो जाता है । गिजुभाई का बाल-दिशन शगजु भाई को बच्ो​ों से अत्यशधक लगाि र्ा उन्ो​ोंने बच्ो​ों के शलए शकसी भी प्रकार के शसद्धाों त का प्रशतपादन नहीों शकया। िे बच्ो​ों को दे खकर प्रफुखल्लत हो उठते र्े उनके मन में बच्ो​ों के शलए बहुत ही आदर ि सम्मान र्ा। िह बच्ो​ों की आूँ खो​ों में ही दे खकर उनके सपने पढ़ ले ते र्े। शगजुभाई का बाल दशश न उस शशशु से प्रारम्भ होता है जो पाठशाला में आने से पूिश घर में पलता है और शजसको माता-शपता स्नेह तो बहुत करते हैं ले शकन शिशभन्न प्रकार के डर के कारर् उसे स्वतोंत्र नहीों छोड़ते हैं । घर से ही बच्ो​ों को स्वतोंत्रता नहीों शमलती तो उनके मन में धीरे -धीरे नकारात्मकता की भािना जगह बना ले ती है । जब िह स्कूल जाते हैं तो उनके अोंदर आत्मशिश्वास की कमी दे खी जाती है और िह शकसी भी प्रकार का शनर्शय करने में अपने आप को सहज नहीों पाते हैं , आत्मशनभश रता की जगह िह अपने घर, पररिार पर ही शनभश र रहते हैं । उनके मन में हमे शा सोंदेह ि डर बना रहता है शजससे उनका शारीररक ि मानशसक शिकास बहुत ही धीरे -धीरे होता है । ंदभश

ूची

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