Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language, Online ISSN 2348-3083, SJ IMPACT FACTOR 2021: 7.278, www.srjis.com PEER REVIEWED & REFEREED JOURNAL, DEC-JAN, 2022, VOL-10/49 विविन्न युग ों में स्त्रिय ों की स्त्रथिवि हरी शोंकर यादि1 & नू िन कुमारी2, Ph. D.
शोधछात्र, शशक्षा शिभाग, बाबा भीमराि अंबेडकर शिश्वशिद्यालय, शबहार
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शरंशिपल, डॉ. जगन्नाथ शमश्रा महाशिद्यालय, बी.एड. चंदिारा, मु जफ्फरपुर
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Paper Received On: 25 JAN 2022 Peer Reviewed On: 31 JAN 2022 Published On: 1 FEB 2022 Abstract राचीन काल िे आधु शनक काल याशन िर्त मान िमय र्क भारर् में स्त्रियों की स्त्रथथशर् पररिर्त नशील रही है । हमारा िमाज राचीन काल िे आज र्क पुरुष रधान ही रहा है । ऐिा नहीं है शक स्त्रियों का शोषण शिर्त पुरुष िगत ने ही शकया, पुरुष िे ज्यादा र्ो एक िी ने दू िरी िी पर या िी ने खुद अपने ऊपर अत्याचार शकया है । पुरुष की उदं डर्ा, उच्छं खलर्ा और अहम् के कारण या िी की अशशक्षा, शिनम्रर्ा और िी िु लभ उदारर्ा के कारण उिे रर्ाशिर्, अपमाशनर् और उपेशक्षर् होना पिा। पहले हम इशर्हाि में भारर्ीय स्त्रियों की स्त्रथथशर् पे नजर डाल लें शर्र िर्त मान स्त्रथथशर् का आं कलन करें गे । मु ख्य शब्द: िाशहत्य, यु ग, ममतस्पशी.
Scholarly Research Journal's is licensed Based on a work at www.srjis.com स्त्रियों ने ही रथम िभ्यर्ा की नींि डाली है और उन्ोंने ही जंगलों में मारे -मारे भटकर्े हुए पुरुषों को हाथ पकिकर अपने स्तर का जीिन रदान शकया र्था घर में बिाया”। भारर् में िैद्धास्त्रिक रूप िे स्त्रियों को उच्च दजात शदया गया है , शहन्दू आदशत के अनु िार स्त्रियााँ अधाां शगनी कही गयीं हैं । मार्छत्व का आदर भारर्ीय िमाज की शिशे षर्ा है । िंिार की ईश्वरीय शस्त्रि दु गात , काली, लक्ष्मी, िरस्वर्ी आशद नारी शस्त्रि, धन, ज्ञान का रर्ीक मानी गयी हैं र्भी र्ो अपने दे श को हम भारर् मार्ा कहकर अपनी श्रद्धा रकट करर्े हैं । (रायबनत ) िै वदक युग- िैशदक युग िभ्यर्ा और िंस्कछशर् की दृशि िे स्त्रियों की चरमोन्नर्ी का काल था, उिकी रशर्भा, र्पस्या और शिद्वर्ा िभी शिकािोन्मुख होने के िाथ ही पुरुषों को परास्त करने िाली थी। उि िमय स्त्रियों की स्त्रथथशर् उनके आत्मशिश्वाि, शशक्षा, िंपशि आशद के िम्बन्ध में पुरुषों के िमान थी। यज्ञों में भी उिे ििात शधकार राप्त था। िैशदक युग में लिशकयों की गशर्शीलर्ा पर कोई रोक नहीं थी और न ही मेल शमलाप पर। उि युग में मै त्रेयी, गागी और अनु िूया नामक शिदु षी स्त्रियााँ शािाथत में पारं गर् थीं। ‘यत्र नायतस्तु पूज्यर्े रमिे र्त्र दे िर्ा’ उस्त्रि िैशदक काल के शलए ित्य उस्त्रि थी। महाभारर् के कथनानु िार िह घर घर नहीं शजि घर में िुिंस्कछर्, िुशशशक्षर् पत्नी न हो। गछशहणी शिहीन घर जं गल के िमान माना जार्ा था और उिे पशर् की र्रह ही िमानाशधकार राप्त थे । िैशदक युग भारर्ीय िमाज का स्वणत युग था। उत्तर िै वदक युग- िैशदक युग में स्त्रियों की जो स्त्रथथशर् थी िह इि युग में कायम न रह िकी। उिकी शस्त्रि, रशर्भा ि स्वर्ंत्रर्ा के शिकाि पर रशर्बन्ध लगने लगे। धमत िूत्र में बाल-शििाह का शनदे श शदया गया शजििे स्त्रियों की Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language
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शशक्षा में बाधा पहुं ची और उनकी स्वर्ंत्रर्ा को र्थाकशथर् ज्ञाशनयों ने ऐिा कहकर उनकी शस्त्रि को शिशमर् कर शदया शक- “शपर्ा रक्षशर् कौमारे , भर्ात रक्षशर् यौिने । पुत्रश्च थथाशिरे भािे, न िी स्वार्ंत्रयमहत शर्।। िो घर की चारदीिारी में कैद हो गयीं, पढने -शलखने ि िेदों का ज्ञान अिंभि हो गया और उनके शलए धाशमत क िंस्कार में भाग ले ने की मनाही हो गयी। बहुपत्नी रथा का रचलन हो गया और िैशदक युग की र्ुलना में उिर ि दीघतकाल में उनकी स्त्रथथशर् शनम्न स्तर की होर्ी गयी। स्मृवि युग- इि युग में स्त्रियों की स्त्रथथशर् पहले िे ज्यादा बदर्र हो गयी, कारण यह था शक बाल-शििाह र्था बहुपत्नी रथा का रचलन और बढ़ गया। इि युग में शििाह की आयु घटाकर 12-13 िषत कर दी गयी। शििाह की आयु घटाने िे शशक्षा न के बराबर हो गयी, उनके िमस्त अशधकारों का हनन हो गया। उन्ें जो भी िम्मान इि युग में शमला िह शिर्त मार्ा के रूप में न शक पत्नी के रूप में । स्त्रियों का परम कर्तव्य पशर् जैिा भी हो उनकी िेिा करना था। शिधिा के पुनशितिाह पर भी कठोर रशर्बन्ध लगा शदया गया। मध्यकालीन युग- इि युग में मु ग़ल िाम्राज्य होने िे स्त्रियों की दशा और भी दयनीय हो गयी। मनीशषयों ने शहन्दू धमत की रक्षा, स्त्रियों के मार्छत्व और रि की शु द्धर्ा को बनाये रखने के शलए स्त्रियों के िम्बन्ध में शनयमों को कठोर बना शदया। ऊाँची जाशर् में शशक्षा िमाप्त हो गयी और पदात रथा का रचलन हो गया। शििाह की आयु घटकर 8-9 िषत हो गयी। शिधिाओं का पुनशितिाह पूरी र्रह िमाप्त हो गया और िर्ी-रथा चरम िीमा पर पहुाँ च गयी। इि युग में केिल स्त्रियों के िं पशि के िम्बन्ध में िुधार हुआ उन्ें भी शपर्ा की िंपशि में उिराशधकार शमलने लगा। आधु वनक युग- आधुशनक युग में स्त्रियों की दयनीय स्त्रथथशर् िमाज िुधारकों र्था िाशहत्यकारों ने ध्यान शदया और उनकी दशा िुधारने के रयाि शकये। स्त्रियों की दशा की र्रर् िमाज का ध्यान आकशषत र् करने के शलए ममत स्पशी पंस्त्रियााँ - अबला जीिन हाय र्ेरी यही कहानी। आाँ चल में है दू ध और आाँ खों में पानी, शलखी गयी है । (मै शथलीशरण) कशि ने स्त्रियों की महिा का बोध िमाज को अपनी इन पंस्त्रियों िे करायानारी र्ुम केिल श्रद्धा हो , शिश्वाि रजर् नग, पग र्ल में । शपयूष स्रोर् िी बहा करो, जीिन के िुन्दर िमर्ल में ।। िाशहत्यकारों ने िी की ममर्ा, िात्सल्य, रािर के शनमात ण में योगदान दे ने िाले गुणों के महत्व को िमाज को िमझाया और उनकी महिा के रशर् जागरूक शकया। (जय शं कर रिाद) अने क िमाज िुधारकों ने उनकी दशा िुधारने के शलए िकारात्मक रयाि शकया। स्वामी दयानं द ने िीशशक्षा पर बल शदया, बाल-शििाह के शिरूद्ध आिाज उठाई। राजा राम मोहन राय ने िर्ी-रथा बंद कराने के शलए िंघषत शकया। पररणामस्वरूप िन 1921 में बाल शििाह शनरोधक अशधशनयम द्वारा बाल शििाह का कानू नी रूप िे अंर् कर शदया गया, अब कोई भी मार्ा-शपर्ा लिकी का शििाह 18 िषत की आयु िे पहले नहीं कर िकर्ा। 1961 के दहे ज़ शिरोधी अशधशनयम द्वारा दहे ज़ लेना ि दे ना अपराध घोशषर् कर शदया गया मगर व्यािहाररक रूप िे कोई शिशे ष िुधार नहीं हो पाया। स्विोंत्रिा प्रास्त्रि के बाद िी की स्त्रथिवि- स्वर्ंत्रर्ा रास्त्रप्त के बाद िी की दशा में बदलाि आया। भारर्ीय िंशिधान के अनु िार उिे पुरुष के िमकक्ष अशधकार राप्त हुए। िी शशक्षा पर बल दे ने के शलए स्त्रियों के शलए शनिःशुल्क शशक्षा एिं छात्रिछशर् की व्यिथथा हुई। पररणामर्िः जल, थल ि िायु कोई भी क्षेत्र िी िे अछूर्ा नहीं रहा। Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language
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1915 के शिशेष शििाह अशधशनयम ने स्त्रियों को धाशमत क ि अन्य िभी रकार के रशर्बंधों िे मु ि होकर शििाह करने का अशधकार शदया, अब बहुपत्नी शििाह गैर कानू नी माना गया। स्त्रियों को भी शििाह शिच्े द का पूरा अशधकार शमला और शिधिा शििाह भी कानू नी रूप िे मान्य हुआ। पत्नी पशर् की दािी नहीं शमत्र मानी जाने लगी। उपयुति िारी बार्ें इशर्हाि की शकर्ाबों या बीर्े िमय की बार्ें हैं और िर्तमान िमय में शकर्नी िही है और शकर्नी गलर् ये इि बार् पर शनभत र है शक हम व्यिहाररक रूप िे स्त्रियों के अशधकारों और िम्मान की रक्षा की महिा को िमझें। शिर्त क़ानू न की शकर्ाबों और कानू न के रक्षक के हाथों की कठपुर्ली ही न बनकर रह जाएाँ । िितमान युग- िर्तमान युग या आज के िमय की बार् करें र्ो इिमें कोई दो राय नहीं शक स्त्रियों की स्त्रथथशर् पहले िे अच्ी है , लगभग िभी दे शों में िी ने पुनिः अपनी शस्त्रि का लोहा मनिाया है । हम कह िकर्े हैं शक आज का युग िी-जागरण का युग है । भारर् के ििोच्च पद (रािरपशर्) को भी िी ने िुशोशभर् शकया। ज्ञान, शिज्ञानं, शचशकत्सा, शािन कायत और यहााँ र्क शक िैशनक बनकर दे श की रक्षा के शलए मोचों पर जाने का भी िाहि करने लगी है । िी अपराशजर्ा है और उिकी जीर् में पुरुषों का योगदान ठीक िैिे ही है जै िे एक पुरुष की जीर् में िी का हाथ होर्ा है । उिकी स्त्रथथशर् को िशि बनाने में शपर्ा, भाई, पशर् और पुत्र का हर कदम पर िाथ शमला। स्त्रियों को कानू न का भी िाथ शमला है मगर अभी भी पूरे दे श में स्त्रियों में िो जागरूकर्ा नहीं आई है शक िो कानू न िे शमले अशधकारों िे अपने िाथ हो रहे अत्याचार, अन्याय और रर्ािना के स्त्रखलार् आिाज उठाये। ज्यादार्र स्त्रियााँ अपने पररिार और िमाज के स्त्रखलार् कदम उठाने का िाहि ही नहीं जु टा पार्ीं। आज भी स्त्रियों का एक बिा िगत अपने कानू नी अशधकारों िे भी अनशभज्ञ है और जो िगत आिाज उठाने की शहम्मर् करर्ा है उन्ें भी बहरे और अंधे कानू न िे उशचर् न्याय नहीं शमल पार्ा। (शिंह, 2001) िबिे बिा ििाल उिके आत्मिम्मान की िुरक्षा का है , आज भी िी हर जगह अिुरशक्षर् है । शजि पुरुष ने अपनी मााँ , बहन, बेटी और पत्नी को आत्मशनभत र बनने में िाथ शदया क्या िो उिे िमाज में िम्मान िे जीने का भरोिा दे पाया? िुबह घर िे काम पर शनकलने िाली स्त्रियााँ शाम को िुरशक्षर् घर कैिे लौटें , िबको ये डर िर्ार्ा रहर्ा है । क्या कानू न, पुशलि और हमारा िमाज अपनी शजम्मेदारी शनभा पाया? क्या ऐिे िमाज को हम अच्ा कहें गे जहााँ िी को अपनी इज्जर् की भीख मं गनी पिे ? क्या ररश्ते दारों का िाथ होना िुरक्षा की गारं टी दे िकर्ा है ? क्या पुरुष पश्चमी िभ्यर्ा नहीं अपनार्े? क्या आजादी शिर्त पुरुषों को शमली है ? क्या स्वर्न्त्र भारर् में भी स्त्रियााँ परर्ंत्र बनी रहें ? िच र्ो ये है शक िर्तमान िमय में स्त्रियों के आत्मशिश्वाि और आत्मबल को हमारे िमाज ने र्ोडा है , हमारा शशशक्षर् िमाज आज भी स्त्रियों को िम्मान दे ने के िम्बन्ध में अशशशक्षर् ही रह गया है । ये कहर्े हुए और भी दु िःख होर्ा है शक िी स्वयं भी इि स्त्रस्तशथ के शलए दोषी हैं? िो अपनी ही िंर्ान िे शलं ग के आधार पर शु रू िे ही भे द-भाि करर्ी आई हैं । (गुप्ता, 2009) बेटे और बेटी को एक जै िा िंस्कार नहीं दे पाई। अशधकर्र स्त्रियों ने बेटों को प्यार और आजादी ज्यादा दी उिी का पररणाम है आज के िमाज में स्त्रियों के शलए अिुरशक्षर् िार्ािरण। हमे शा िे यही माना गया है शक स्त्रियााँ शारीररक रूप िे पुरुषों िे कमजोर हैं पर मे रा मन ये नहीं मानर्ा जो िी िछजन की शस्त्रि रखर्ी है िो कमजोर कैिे हो िकर्ी है ज्यादार्र हादिे का शशकार होने की िजह उनका डर Copyright © 2022, Scholarly Research Journal for Humanity Science & English Language
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और दहशर् िे कमजोर पि जाना ही होर्ा है । आज िबिे जरुरी है शक हमारा िमाज अपनी िोंच को बदले जहााँ कानू न शिर्त पन्नों में धरे रह जार्े हैं या र्ो िमय पर िाथ नहीं दे र्े, उशचर् न्याय नहीं दे र्े या िमय पर न्याय नहीं दे र्े र्ो हम अपने आप का भरोिा करें स्वयं न्याय करें । (उपाध्याय, 2015) अगर स्वयं के घर में भी अपराधी या दु राचारी है र्ो उिे बचाएं या छु पायें नहीं बस्त्रल्क कानू न के हिाले करें । अपने पाि-पिोि और िमाज में शकिी को भी न्याय की जरुरर् हो अन्याय के शिरुद्ध खिे हो न्याय का िाथ दें । अपराधी को पनाह नहीं शमले गी, उिे िजा शमले गी र्भी अपराशधयों के मन में दहशर् पैदा होगी। िजा भी िरे आम शदया जाये शजििे कोई भी जु मत करने की जु रतर् न करे । अपने घर के बेटे और बेशटयों को िही शशक्षा और िंस्कार दें शिशेष र्ौर पर बेटों को स्त्रियों का िम्मान करना शिखाएं उन्ें कभी भी ऐिी कोई शशक्षा न दे शक िह बेटा है र्ो जै िे चाहे जी िकर्ा है । बेटा और बेटी दोनों को स्वर्ंत्रर्ा और स्वछं दर्ा का अंर्र अच्ी र्रह िमझाएं । उन्ें प्यार दें पर अनु शािन में भी रखें ररश्तों की गररमा के िाथ ही उनिे ऐिा िबंध रखें शक िो अपनी हर छोटी-बिी बार् िाझा करे । उशचर् शशक्षा, प्यार और शिश्वाि की कमी ही शकिी को गलर् राह पर ले जार्ी है । सोंदित सूची शत्रपाठी एि॰ (2017)मध्यकालीन िाशहत्य के िामाशजक िरोकार ित्यरेमी पी॰ (2016) दशलर् िाशहत्य और िामाशजक न्याय उपाध्याय पी॰ (2015) भारर्ीय िमाज में उदीयमान रिछ शियााँ , शारदा पुस्तक भिन, रयागराज एि॰ िी॰ इ॰ आर॰ टी॰ (2014). िर्र्् एिं व्यापक मूल्यां कन शनदे शशका भाग-1. रायपुरिः राज्य शैशक्षक अनुिंधान एिं रशशक्षण पररषद् , पछष्ठ िं .- 84। एि॰ गु प्ता एिं जे॰ िी॰ अग्रिाल (2014). भारर् में रारं शभक शशक्षा (स्वर्न्त्रर्ा िे पूित एिं पश्चार्् ), रकाशक शशपरा पस्त्रिकेशन्स, नई शदल्ली, पछष्ठ िं .- 109। गु प्ता एि॰पी॰ (2009) भारर्ीय शशक्षा का इशर्हाि शिकाि एिं िमस्याएाँ , रयागराज रुहे ला, ित्यपाल (2007). भारर्ीय शशक्षा का िमाजशाि, राजथथान शहन्दी ग्रं थ अकादमी, जयपुर, पछष्ठ िं .-123। कणत , एि॰ (2001) शशक्षा का इशर्हाि एिं शिकाि, िं जय िाशहत्य रकाशन, रयागराज एण्डरिन, आर॰ एल॰ ि बे नराफ्ट, टी॰ ए॰ (1962). स्टे शटस्त्रस्टकल शथयरी आर् ररिचत, मैकग्रा शहल बु क कम्पनी, न्यूयाकत। एल्कोर्, आर॰ एल॰ (1959). द शडजाइन ऑर् िोशल ररिचत, हाल्ट राइनहटत एण्ड शिस्टन, न्यूयाकत।
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